मिलन
अनेक कोमल अहसास
खो देते हैं अपना स्वरूप
या यूं कहें बदल लेते हैं
अपना स्वभाव स्वरूप ।
समानान्तर चलना
न बिछुड़ना न मिलना
सम्मोहन की निरन्तरता
आकर्षण की प्रबलता
रखता है बनाये ।
मेल बदल देता है स्वरूप
उभय का, क्षण में तल से
रूप नहीं रह जाता स्व का
आवेग,उन्माद बहुरुपिया
सोखता उभय व्यक्तित्व ।
जन्म एकल, मृत्यु एकल
समानान्तर अगल बगल
मध्य लिपटी बहुलता
है बदली पल दर पल
ज्यूं मिलन ! सर्वस्व विस्मृत ।
न मिलन न विलगन, निर्लिप्त !
ऊर्जा का समानान्तर अनुगमन
ब्रम्ह से ब्रम्ह तक निरन्तर
संरक्षित मूल तत्व अन्तस
कृष्णविवर सा उभयानन्द ।
उमेश कुमार श्रीवास्तव
नवजीवन विहार , सिंगरौली
दिनांक : २२.०१.२०२६