रविवार, 28 जून 2026

शेर

सोचता हूं हर बार 
दिल की बात जुबां पे न आये
कम्बख्त चेहरा , जुबां बन
कह देता हर राज - ए - दिल जमाने से ।


( केदारनाथ त्रासदी पर )
फटा दिल, शैलाब अश्कों का बहा
परवर दिगार !
 बेमुरौवत रहनुमाओं की सजा
 क्यूं दी तूने, अपने खिदमतगारों को ।


जिन्दगी तू ही बता, कैसे तुझे प्यार करूं
तेरी हर इक सुबह,उम्र कम कर देती है जो ।

मरहम न सही कोई जख्म ही दे दो
अहसास तो हो, कोई भूला नहीं हमको ।

जिन्दगी में रंग गुलज़ार से मांगा करो
ख़िज़ा में मस्त रहना, ख़ार से मांगा करो
गिड़गिड़ाया मत करो भिखारी की तरह
तुम जो मांगा करो, अधिकार से मांगा करो

मंगलवार, 23 जून 2026

किधर जा रहे हम

किधर जा रहे हम

आज हम, हमारा समाज व सरकारें
स्त्रियों को भी 
बनाने की होड़ में हैं, "पुरुष"
देश समाज व परिवार की
आय अर्जन का या यूं कहें
जी डी पी बढ़ाने का जरीया ।

प्रकृति ने स्त्री - पुरुष दो काया
माया से रची थी
शक्ति का पृथ्थकीकरण
प्रकृति के अनुरूप किया था
एक में जो  शक्तियां थी
वह दूसरे में भी थी
पर, न्यून
तभी वे युग्म बन होती थी पूर्ण
पर महिला सशक्तिकरण के 
इस दौर में
पुरुष ने अपने संकुचित स्त्रेण गुण
विसार दिये है
महिलाओं ने भी स्त्रैण गुण से
कर लिया है किनारा
दोनो हो चुके है
पूर्ण पुरुष
जिसमें संवेदना , धैर्य, क्षमा
स्नेह, ममत्व व व्यवस्थापन के गुण
पूर्णतया सो चुके हैं
या यूं कहे अनेक प्रजातियों की तरह
धरा से लुप्त हो चुके हैं ।
पुरुष के दुर्गुणों को 
सौम्य बनाता था जो
वह स्त्रैण रस की धारा
जो सूखी, सरस्वती सी
तो पुरुष मानव से दानव हो चुका है
उसी की प्रतिकृति बनी स्त्री
अनुगमन कर दानवी हो चुकी है ।

धरा के गुणों की पर्याय
स्त्रैण गुण की धनी नारी
नर में परिवर्तित होती
अपनी खो रही है परिभाषा
रूप, रस , स्पर्श, गंध समेट
मातृत्व की काया 
उदार दृढ़ता,उर्वरता, सहिष्णुता
की पवित्र प्रतिमूर्ति
मानव के पोषण से 
रही है मुख मोड़
ये कैसी चली है पुरुष बनने की होड़

मृदुता - कठोरता का योग
नारी में नर, नर में नारी का संयोग
खो रहा है
आज शक्तिपृथ्थक्करण
केन्द्रीकरण में खो रहा है
कठोरता से कठोरता का योग
विध्वन्स ही लायेगा
सरसता हारेगी
शुष्क पाषाण बन मानवता
बाजी हारेगा ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोक भवन , भोपाल
दिनांक : 29.06.2026





शनिवार, 20 जून 2026

नही मानता तुम सुन्दरतम
हो वसुधा के रत्न अनमोल
नही मानता निखिल ब्रम्ह ने
गढ़ा तुम्हे सब विधि से तोल

नही मानता श्रेष्ठ बुद्धि है
धी प्रज्ञा  जब साथ नही
पोषित अहं ले मानव तुम

शुक्रवार, 29 मई 2026

हो रहे फासले , बट रहा आदमी
क्या से क्या आज, हो रहा आदमी ।
ना रंगत रही, नूर भी ना रहा

रविवार, 24 मई 2026

जीवन पथ है

उद्देलित हो 
नाटकीय खबरों से
कभी कभी सोचता हूं 
जीवन क्या है ?

ऐश्वर्य, पद , प्रतिष्ठा
आरामतलब - जीवनचर्या
धनबल, जनबल, बाहुबल की सीमा
या पहुंच की बानगियां 
क्या करती हैं 
जीवन को रेखांकित ।

क्या इनसे शान्ति से 
तन्मयता पूर्वक भोगा जा सका है वह 
जिसे हम जीवन समझते हैं
या वे भोग लेती है प्राणियों के प्राण से सुमधुर, सुस्वादु रस
जिसे हम संवेदना, विवेक, धीरता 
और अपनत्व जानते हैं
सहअस्तित्व, प्रेम, समर्पण के नाशक
बीज तत्व अहं
के पोषक तत्वों से प्रेरित हो
जीने की कला को हम
शायद जीवन मानते हैं  ।

सनातनी एक कला है जीने की
धैर्यवान क्षमाशील बन
मन को संयत कर पग संधाने की
पराई को पराई मान
करना बुद्धि, ज्ञान, विद्या का समुचित प्रयोग
इन्द्रियों पर नियंत्रण 
अक्रोध पा अहं को भागने के लिये
यही सरल पथ है मानव तन पा
आत्मतत्व  जगाने का
आनन्द को आनन्द से आनन्दित
कर जाने का ।
निष्कर्ष आता समझ
इसी पथ-गमन का नाम जीवन है
शायद !

उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोकभवन , भोपाल
दिनांक : २५. ०५. २५

बुधवार, 20 मई 2026

करता था प्यार दिल से,वो दिमाग ले के आई
महताब सा चमन था वो आफताब ले के आई
सुकूं से जी रहा था, रुनझुन थी ख्वाहिशें
जमाने भर की वो तो दर्दे गुबार ले के आई ।
कलियों सा सहेजा मैने जो खार बन गई है
खुशबू की चाहतों में बद बयार ले के आई

अलहदा ठीक था मैं इकसार चला क्यूं होने
जी रहा हूं मैं , मरने के लिये
अमरत्व क्यूं पसंद हो जीने के लिये