आँखें
उठती कशक दिल में
करती बयां हैं आँखें
खुशी हो या गम
छलक जाती हैं आँखें ।
चंद कतरे अश्क के
खोल देते हैं राज
न जाने कौन सा हुनर
घोल जाती है आँखे ।
कुछ राज़ चाह कर भी
दिल, छिपा नही पाता
मुस्कुरा के पुतलियों से
जता जाती हैं आँखें ।
गम - ओ - गुस्सा हो
या इश्क की बेकरारी
रुमानियत से बंया सब
कर जाती हैं आँखे ।
जब जब मिली हैं आँखें
हर राज़ जान ली हैं
पलकों के पीछे ओट में
कब छिप सकी हैं आँखें ।
उमेश कुमार श्रीवास्तव
वन्दे भारत ट्रेन
भोपाल - मैहर यात्रा
दिनांक : २१. ०३ . २०२६