Meri Gajale Mere Geet (मेरी ग़ज़लें मेरे गीत)
मंगलवार, 24 मार्च 2026
[3/24, 5:29 PM] Umesh Kumar Shrivastava:
इश्क इक जुनून सूफियायी है
रूह से रूह तक बहा करती है।
उमेश
[3/24, 5:49 PM] Umesh Kumar Shrivastava:
गमे जुदाई में लिपटी तेरी शोख़ तब्बस्सुम
आ के देखे कोई इश्क कहां जिन्दा है ।
उमेश
मंगलवार, 17 मार्च 2026
आँखें
आँखें
उठती कशक दिल में
करती बयां हैं आँखें
खुशी हो या गम
छलक जाती हैं आँखें ।
चंद कतरे अश्क के
खोल देते हैं राज
न जाने कौन सा हुनर
घोल जाती है आँखे ।
कुछ राज़ चाह कर भी
दिल, छिपा नही पाता
मुस्कुरा के पुतलियों से
जता जाती हैं आँखें ।
गम - ओ - गुस्सा हो
या इश्क की बेकरारी
रुमानियत से बंया सब
कर जाती हैं आँखे ।
जब जब मिली हैं आँखें
हर राज़ जान ली हैं
पलकों के पीछे ओट में
कब छिप सकी हैं आँखें ।
उमेश कुमार श्रीवास्तव
वन्दे भारत ट्रेन
भोपाल - मैहर यात्रा
दिनांक : २१. ०३ . २०२६
सोमवार, 16 मार्च 2026
जलती हुई चिताओं सी
जल रही है दुनियाँ
सुलगती चर्बीयां
महकती हर दिशा क
बुधवार, 11 मार्च 2026
११ मार्च २०२६
तुम क्या शासन करागे मुझ पर
स्व पर शासन आता, तुम्हे कहां !
मनमानी मुझ पर थोप चलोगे
मन मेरा,माने, तब, उसे कहां ।
सोच तुम्हारी, ना रही हमारी
मानोगे तुम तो सबकी उसको
भेंड नही हम बुद्धि विवेक ले
मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026
वेदना
वेदना
नही कह सका अब तक
प्रणय वेदना हिय की
तुम कहां थी तत्पर
श्रवण करने को रागनी में खुद की ।
प्रखर ज्वाला हुई हिय की
घुमड़ बादल बहुत आये
बरसने को हो बेकल
नयन में आ घने छाये
था दृगों को भान इसका
न पायेंगे नेह वे तुम्हारा
जन्हु बन तभी तो गये वे
सोख जायेंगे नीर वो खारा
कभी मनीषा कभी प्रज्ञा
कभी तो मन का हर कोना
कहता रहा क्यूं उलझता
न होगा उसका, तेरा होना
पर मानता कैसे वह
सरस दिल जो मेरा ठहरा
दृगों की रागनी से वह
लगा बैठा सरगमी पहरा
साज सारे ही हारे बज कर
सिमट शून्य पर जा ठहरे
तुम बिखरी तारों सी जग पर
मैं पुच्छल सा गिरा जा रहा हूं।
न चीरा न पीड़ा न चेतना है
अनहद बढ़ चली है तड़पन
विमुखता तेरी सालती नित
नि:शब्द रोता है आंगन
नेह नीर न शीतल रहा अब
तपन है जलन है अगन है
न बोल पाने की जो है पीड़ा
नाम तेरा व मेरा वो रूदन है ।
ताल था हृदय, नीर निर्मल
शुष्क होता चला जा रहा है
धर धीर बैठा तट सरोवर
धुंध से कभी तो प्रकट होगी
उमेश कुमार श्रीवास्तव
रिवांचल एक्सप्रेस
भोपाल - रींवा यात्रा
दिनांक : २४.०२.२०२६
शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026
निर्मोही
निर्मोही
निर्मोही कौन है
कर लो तनिक विचार
करे जो चिन्तन अहिर्निश
या जो करे न तनिक विचार ।
मन तो मोही ही रहे,
निर्मोही चित जान ।
अवरोध ज्ञान विवेक है,
ना प्रकट करे, ना दे भान ।
निर्मोह दशा अति प्रेम की,
रसिक कलंक ना आय ।
चिन्तन कर ठिठक रहे,
तेंहि ब्रम्हरूप पैठाय ।
उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोक भवन , भोपाल
दिनांक : २०.०२.२६
सोमवार, 2 फ़रवरी 2026
२ फरवरी २०२६
करो आह्वान ज्योति का
अन्धकार व्याप्त है
अब ज्ञान की धार से
प्रकाश फैलता नही
तम घना घना सा है
ज्ञान से डोलता नही
भ्रमित तम कर रहा
ज्ञान के तेग को
खनक उसमें भर रहा
रोकता प्रकाश वेग को
सुना श्रृष्टि है बनी
नाद सिर्फ नाद से
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