शनिवार, 20 जून 2026

नही मानता तुम सुन्दरतम
हो वसुधा के रत्न अनमोल
नही मानता निखिल ब्रम्ह ने
गढ़ा तुम्हे सब विधि से तोल

नही मानता श्रेष्ठ बुद्धि है
धी प्रज्ञा  जब साथ नही
पोषित अहं

शुक्रवार, 29 मई 2026

हो रहे फासले , बट रहा आदमी
क्या से क्या आज कल हो रहा आदमी ।
ना रंगत रही, नूर भी ना रहा

रविवार, 24 मई 2026

जीवन पथ है

उद्देलित हो 
नाटकीय खबरों से
कभी कभी सोचता हूं 
जीवन क्या है ?

ऐश्वर्य, पद , प्रतिष्ठा
आरामतलब - जीवनचर्या
धनबल, जनबल, बाहुबल की सीमा
या पहुंच की बानगियां 
क्या करती हैं 
जीवन को रेखांकित ।

क्या इनसे शान्ति से 
तन्मयता पूर्वक भोगा जा सका है वह 
जिसे हम जीवन समझते हैं
या वे भोग लेती है प्राणियों के प्राण से सुमधुर, सुस्वादु रस
जिसे हम संवेदना, विवेक, धीरता 
और अपनत्व जानते हैं
सहअस्तित्व, प्रेम, समर्पण के नाशक
बीज तत्व अहं
के पोषक तत्वों से प्रेरित हो
जीने की कला को हम
शायद जीवन मानते हैं  ।

सनातनी एक कला है जीने की
धैर्यवान क्षमाशील बन
मन को संयत कर पग संधाने की
पराई को पराई मान
करना बुद्धि, ज्ञान, विद्या का समुचित प्रयोग
इन्द्रियों पर नियंत्रण 
अक्रोध पा अहं को भागने के लिये
यही सरल पथ है मानव तन पा
आत्मतत्व  जगाने का
आनन्द को आनन्द से आनन्दित
कर जाने का ।
निष्कर्ष आता समझ
इसी पथ-गमन का नाम जीवन है
शायद !

उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोकभवन , भोपाल
दिनांक : २५. ०५. २५

बुधवार, 20 मई 2026

करता था प्यार दिल से,वो दिमाग ले के आई
महताब सा चमन था वो आफताब ले के आई
सुकूं से जी रहा था, रुनझुन थी ख्वाहिशें
जमाने भर की वो तो दर्दे गुबार ले के आई ।
कलियों सा सहेजा मैने जो खार बन गई है
खुशबू की चाहतों में बद बयार ले के आई

अलहदा ठीक था मैं इकसार चला क्यूं होने
जी रहा हूं मैं , मरने के लिये
अमरत्व क्यूं पसंद हो जीने के लिये

गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

कुछ पल निकाल आ जाया करो
बस यूं ही जरा मुस्कुराया करो
दिल को सुंकूं मिल जाये मेरे
ऐसे करम कुछ,कर जाया करो

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

ये जिन्दगी

ये जिन्दगी

जिन्दगी बस चलती रहती है 
बदलती रहती है राहें हर क्षण   
जीते हैं हम उसे अपनी मान, पर
रहते हैं अनजान जिन्दगी से हम । 

हमारा फूलना-पिचकना हंसना-गाना
रोना-धोना, कलपना, जलना-जलाना
जीवन की राह के खरपतवार 
किसी पर फूल किसी पर कांटे
यह राहों पर, हमारी प्रकृति ने ही हैं बाटे
मानते है जिन्हे हम अपने 
मोहक या रुदाली सपने
आदि से अब तक, रोपे हैं राहों पर,
कर्मों से अपने

जिन्दगी तो बस चलती है
चल रही है
जीते लग रहे हैं हम
पर जी, जिन्दगी रही है 
बांध कर स्वयं के संग 
भोगाने को कर्म, 
जिसे बांध रखे हैं हम 
अपनी निधि मान अनन्त काल से ।

करते बीजरोपड़ नित
जीवन की राहों पर, 
कर्मों से अपने
जिसके अनुरूप ही सजेगी राह
लगेंगे पादप में पुष्प और फल
बस घिसटना है जीवन के संग
राहों पर कर्मानुसार 
आनन्द लेने या पीड़ा सहने को

तनिक धारा विचारों की मोड़ दो
इसे अपनी जिन्दगी मानना छोड़ दो
जिसकी भी हो उसे ही कर समर्पित
कर्म व उसके फलों को भी
उसी को सौंप दो
तब ,न घिसटोगे न खुशी या दर्द होगा
जियोगे जिन्दगी तुम जिन्दगी के संग हो
जिन्दगी का न तुम पर कोई बन्ध होगा ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव
भोपाल से जबलपुर यात्रा
इन्टर सिटी ट्रेन
दिनांक : १८. ४. २०२६