नाटकीय खबरों से
कभी कभी सोचता हूं
जीवन क्या है ?
ऐश्वर्य, पद , प्रतिष्ठा
आरामतलब - जीवनचर्या
धनबल, जनबल, बाहुबल की सीमा
या पहुंच की बानगियां
क्या करती हैं
जीवन को रेखांकित ।
क्या इनसे शान्ति से
तन्मयता पूर्वक भोगा जा सका है वह
जिसे हम जीवन समझते हैं
या वे भोग लेती है प्राणियों के प्राण से सुमधुर, सुस्वादु रस
जिसे हम संवेदना, विवेक, धीरता
और अपनत्व जानते हैं
सहअस्तित्व, प्रेम, समर्पण के नाशक
बीज तत्व अहं
के पोषक तत्वों से प्रेरित हो
जीने की कला को हम
शायद जीवन मानते हैं ।
सनातनी एक कला है जीने की
धैर्यवान क्षमाशील बन
मन को संयत कर पग संधाने की
पराई को पराई मान
करना बुद्धि, ज्ञान, विद्या का समुचित प्रयोग
इन्द्रियों पर नियंत्रण
अक्रोध पा अहं को भागने के लिये
यही सरल पथ है मानव तन पा
आत्मतत्व जगाने का
आनन्द को आनन्द से आनन्दित
कर जाने का ।
निष्कर्ष आता समझ
इसी पथ-गमन का नाम जीवन है
शायद !
उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोकभवन , भोपाल
दिनांक : २५. ०५. २५