प्रणय वेदना हिय की
श्रवण करने को तत्पर तुम
कहां थी रागनी में खुद की
प्रखर ज्वाला हुई हिय की
घुमड़ बादल बहुत आये
बरसने को हो बेकल
नयन में आ घने छाये
था दृगों को भान इसका
न पायेंगे नेह वे तुम्हारा
जन्हु बन तभी तो गये वे
सोख जायेंगे नीर वो खारा
कभी मनीषा कभी प्रज्ञा
कभी तो मन का हर कोना
कहता रहा क्यूं उलझता
न होगा उसका, तेरा होना
पर मानता कैसे वह
सरस दिल जो मेरा ठहरा
दृगों की रागनी से वह
लगा बैठा सरगमी पहरा
साज सारे ही हारे बज कर
सिमट शून्य पर जा ठहरे
तुम बिखरी तारों सी जग पर
मैं पुच्छल सा गिरा जा रहा हूं।
न चीरा न पीड़ा न चेतना है
अनहद बढ़ चली है तड़पन
विमुखता तेरी सालती नित
नि:शब्द रोता है आंगन
नेह नीर न शीतल रहा अब
तपन है जलन है अगन है
न बोल पाने की जो है पीड़ा
नाम तेरा व मेरा वो रूदन है ।
ताल था हृदय, नीर निर्मल
शुष्क होता चला जा रहा है
धर धीर बैठा तट सरोवर
धुंध से कभी तो प्रकट होगी
उमेश कुमार श्रीवास्तव
रिवांचल एक्सप्रेस
भोपाल - रींवा यात्रा
दिनांक : २४.०२.२०२६