मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

मानव मन

मन चाहता है 
अंको में भर लूं तुमको
मन चाहता है 
चुम्बन ललाट पर तेरे

मन चाहता है
संवारूं कुंतल तेरे
काली घटा के साये में
सुकून तलासते
निश्चिंत सो जाने को

आंखे चाहती
आंखों में झांकना तेरे
मीन बन बसना
मादक झील में तेरे
वे चाहती निरन्तर
निहारना तुझको
अक्स बना 
दिल में उतारने को

नासिका मचल जाती
गंध पा तेरे तन की
संजो लेती जिसे
यादों में भिगोने को
हाय ! तेरा रूप
कल्पनाओं से निकल
कब अनावृत होगा
सम्मुख आ मेरे

दिनांक ०६.१०.२६
लोक भवन , भोपाल


मंगलवार, 22 सितंबर 2026

रवि-रश्मि विज्ञान

रवि रश्मि में ज्ञान छिपा है
कर अनुसंधान रे मानव
विज्ञान इसी में रचा बसा है
जान सके तो जान ले मानव ।

हर कारक ब्रम्हाण्ड इसी में
जड़ चेतन लघु दीर्घ सभी
ज्ञान चक्षु तीक्ष्ण करो
बहिर्भाग ना टटोल रे मानव ।

प्राण इसी में ज्ञान इसी मे
माया का विज्ञान इसी में
ब्रम्ह इसी में भगवान इसी में 
नाद इसी में मान ले मानव ।

नीर इसी में पवमान इसी में
धरणी की पहचान इसी में
पितृ लोक का ज्ञान इसी में
नव सृजन यही, पहचान ले मानव ।

सप्त लोक का ज्ञान इसी में
सप्तवर्ण को भेद जो ले
काल जगत सिमटा इसमें
भेद सके तो पहचान ले मानव ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोक भवन , भोपाल
दिनांक : २३.०९.२६


गुरुवार, 30 जुलाई 2026

गज़ल : गुज़रेगी जब यार के कूंचे से

गज़ल

गुज़रेगी जब यार के कूंचे से तू ऐ सबा 
नामावर बन ज़ख्मे-निहा कर देना उनसे बयाँ ।

कह देना उनसे कि अश्क भी अब सूखते 
विस्मिल दिल से आरजूएँ हो चुकी कब की फ़ना ।

याद तो करता बहोत पर सब्र ही जाता रहा
कब तलक तेगे जुनू से मैं बचाता आसियाँ ।

इस कफ़स में आज तो जां भी है मचलने लगी
छोटे पड़ने लगे अब ये ज़मीं ये आसमाँ ।

उस दिले-मगरूर से आख़िर में कहना तू जा
मिट रहा फुर्कत में तेरी, नशेमन का हर निशां ।

नामावर : सन्देश वाहक,पत्र वाहक
जख्म - ए - निहां : छिपे घाव ( दिल के )
फुर्क़त : प्रियजन से अलग होने की पीड़ा, वियोग
...उमेश श्रीवास्तव...25.11.1989

सोमवार, 27 जुलाई 2026

कर्म गति

घनघोर घटायें छाई थी 
पर एक बून्द ना आई थी
रुष्ठ हुए यूं जलद आज
ना तनिक दया दिखाई थी ।

अषाढ़ गया रीता - रीता
आंखें सब कुम्हलाई थी
फसलों की  कोमल पौधें
नीर बिना अकुलाई थी ।

वन, कानन,नग धानी चुनरी
पीत गात बन छाई थी
ताल तलैय्या सरिता पोखर
तट छोड़ सिमटी सकुचाई थी ।

धरनी प्यास लिये अपनी
सावन पर आस लगाये थी
पर विह्वल सन्तति उसकी 
करुण पुकार लगाये थी  ।

करुणाकर की भीगी आंखें 
रौद्र रूप धर आई थी
अश्रुनीर नग शिखर गिरीं
प्राणों पर विपदा आई थी ।

सूखी धरती सूखे तन मन
रीते बादल रीते चिन्तन 
गति कर्मों की व्यक्त हो रही
क्या मानवता पछताई थी ?

उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोकभवन भोपाल .
दिनांक : 29.07.2026


गुरुवार, 9 जुलाई 2026

हे कृष्ण मुरारी राधे श्याम

हे कृष्ण मुरारी राधे श्याम -२
सुर संधान, सुर संधान

दे तान वेणु पर मधुर मधुर 
सप्त सुरों की गूंज मधुर
जगति छंद उतरे धृ पर
हो भोर सुवासित जगे प्राण ।

हे कृष्ण मुरारी राधे श्याम -२
सुर संधान, सुर संधान


टूट गये सुर से सब नाते
सरगम के सुर ना हैं भाते
खनक भरी सब के कानों में
सिसक रहा सबका है बिहान ।

सुर संधान, सुर संधान
हे कृष्ण मुरारी राधे श्याम -२
सुर संधान, सुर संधान

राह अटपटी भाग रहे सब
ना, सम्बन्धो में राग रहे अब
जगति है चिन्तित जन व्याकुल हैं
मांग रहे सब इससे त्राण
.
सुर संधान, सुर संधान
हे कृष्ण मुरारी राधे श्याम -२
सुर संधान, सुर संधान

हो चले आज सब रक्त पिपासू
तम पोषक, शोषक अविनासी
स्वच्छन्द विचरते घातक चहुंदिश
विचलित है हर साधु प्राण ।

सुर संधान, सुर संधान
हे कृष्ण मुरारी राधे श्याम -२
सुर संधान, सुर संधान

वेणु,  सुदर्शन  संग ले आजा 
भयभीत धरा को धैर्य बंधा जा
विश्वास सभी का डोल गया
है  टूट रही मानव पहचान  ।


सुर संधान, सुर संधान
हे कृष्ण मुरारी राधे श्याम -२
सुर संधान, सुर संधान


उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोकभवन , भोपाल
दिनांक : ०९.०७.२०२६

रविवार, 5 जुलाई 2026

गधे हैं

इधर भी गधे हैं , उधर भी गधे हैं
जहां भी नज़र हो उधर ही गधे हैं ।

कुछ राही गधे हैं ,कुछ माही गधे हैं
मुकुट कुछ हैं पहने वो शाही गधे हैं ।

कुछ गम्भीर दिखते शालीनता ओढ़े
वो विरादरी में अपनी ज्ञानी गधे हैं ।

प्रवचन कर रहे जो, मजमा लगाये
वो राज , योगी, फ़सादाई गधे हैं ।

कई तो पढ़े हैं  किताबें  अनेको
गौर से देखने पर बस किताबी गधे हैं ।

कुछ देशी भेष में कुछ विदेशी रंग में हैं
मगर रेंकने पर सब सियासी गधे हैं ।

वो गरमी के गधे हम बरसाती गधे हैं
इनमें भी अनेको करामाती गधे हैं ।

चलो ढूढ़ लें,  विरादर को अपने
सभी तो यहां पर,बस गधे ही गधे हैं ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोकभवन, भोपाल.
दिनांक : 06.07.2026


रविवार, 28 जून 2026

शेर

सोचता हूं हर बार 
दिल की बात जुबां पे न आये
कम्बख्त चेहरा , जुबां बन
कह देता हर राज - ए - दिल जमाने से ।


( केदारनाथ त्रासदी पर )
फटा दिल, शैलाब अश्कों का बहा
परवर दिगार !
 बेमुरौवत रहनुमाओं की सजा
 क्यूं दी तूने, अपने खिदमतगारों को ।


जिन्दगी तू ही बता, कैसे तुझे प्यार करूं
तेरी हर इक सुबह,उम्र कम कर देती है जो ।

मरहम न सही कोई जख्म ही दे दो
अहसास तो हो, कोई भूला नहीं हमको ।

जिन्दगी में रंग गुलज़ार से मांगा करो
ख़िज़ा में मस्त रहना, ख़ार से मांगा करो
गिड़गिड़ाया मत करो भिखारी की तरह
तुम जो मांगा करो, अधिकार से मांगा करो