रविवार, 26 जून 2022

प्रेम सुधा

प्रेम सुधा

यदि किसी हृदय में 
स्पन्दित होता है, प्रेम ,
ना जाने क्यूं ,
हृदय मेरा
अनायास ही , 
गीत प्रेम का गा उठता है ၊
और बनाने पुष्प ,
हर मुकुल ह्रदय को,
एकाकी ही,भ्रमर सदृष्य
गुंजित हो उठता है

घृणा ,क्रोध की
छल , कपट की
लोभ , मोह की
जो अनगिनत तरंगे
चहुदिश छाई
उन घोर तमस की 
बदली से,
तड़ित सदृष्य
प्रेम रश्मि मोहित कर देती
और ह्रदय मेरा
दीपस्तम्भ सा
उसे भेजता सन्देश 
समधरा पर
आने को
प्रमुदित हो,
"जीवन मधुमय प्रेम पुष्प"
यह बतला 
तम के कंटक दलदल से
ना घबराने को ၊

संघर्ष सदा है जीवन
पर आनन्द वहीं है
संघर्षहीन पथ 
रस स्वाद औ गंधहीन
बस भोग देह ,वह 
जीवन आनन्द नही है ၊

प्रेम सुधा से सान 
ईश ने यह गेह रची है
जगा उसे 
खुद जाग ,प्रेममय कर,
हर क्रिया ,कर्म को
अमर नही तू , तू भी जायेगा ही
पर,संघर्षों से जीवन के,
यूं हार मान कर,
अपने ही हाथों ,
अपने,अद्‌भुत जीवन को
ना मिटा इसे ၊

उमेश कुमार श्रीवास्तव
इन्दौर
दिनांक 27.06.2020

मंगलवार, 7 जून 2022

रूहे इश्क न कभी मरता न फ़ना होता है
जिश्म - ए - इश्क, पैदाइसी फ़ना होता है ।



गुरुवार, 12 मई 2022

मां

मातृ दिवस पर इस वसुधा पर की सभी माताओं को मेरी ओर से आदरान्जली :-

अनन्त मंगल घोषकारी    
*माँ* ध्वनि अपरमपार है ,
'ब्रम्ह' भौतिक लोक की ,
हर प्राण की आधार है  ၊

गढ़ती अनेको रूप जिससे
ये चराचर चल रहा
रहते अगढ़ पशु ,माँ पाठ बिन
मानव प्रगति जो कर रहा ၊

माँ आप में हैं देव तीनों
तृदेवियां भी आप में
ब्रम्हाण्ड की हर शक्तियां
माँ शब्द में ही व्याप्त हैं ၊

उमेश कुमार श्रीवास्तव

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2022

दर्द इक कशक

दर्द इक कशक

क्यूँ दर्द उन्हे ही मिलता है, जो सजदे में रहते हैं
क्यूँ  आती खुशियाँ  हिस्से उनके, जो गम बाँटते फिरते हैं

क्यूँ  परेशान वो रहता है, जो सब की सोच रहा होता
क्यूँ  मज़े वही है करता,जो निज हित की सोच रहा होता

क्यूँ अक्ल हार जाती आ कर,धन की गरिमा के आगे
क्यूँ सिमट रही है सज्जनता , दुर्जन मजमे के आगे

क्यूँ  कामयाबी का मतलब, कुछ अलग दिखाई पड़ता है
क्यूँ ईमानदारी का मतलब , बेवकूफ़ निकाला जाता है

क्यूँ दुनिया इतनी बदल रही कि घर सराय सा लगता है
क्यूँ खुद का वजूद भी अब खुद को, अबूझ बेगाना लगता है

रिस्ते नाते सब बदल गए ना कोई किसी का सगा रहा
हम पहुँच गये हैं किस युग में ? क्या कोई मुझे बता रहा ?

उमेश कुमार श्रीवास्तव(०१.०४.२०१६)

सोमवार, 28 मार्च 2022

बसन्त का छोर

बसन्त का छोर

नव पल्लव ज्यूं शोभित हैं
हर तरु की हर डाली पर
शुष्क धरा पर,शिशु टेसू
बिछा रहे ज्यूं मतवाली फर

नव मुकुन्द ज्यूं पुष्पित है
भ्रमर डोलते ज्यूं उन पर
शुष्क तृणों से भरी डगर पर
मृग डोले ज्यूं इधर उधर

आम्र तरु पर लटक रहे ज्यूं
कैरी गुच्छे गदराये से
महुए के फूलों से ज्यूं उठती
महक नशीली मतवाली सी

प्रात वायु की शीतलता में
ज्यूं प्रखर हो रहा अनल इधर
अरूण रक्तिमा में ही झलके
ज्यूं अंशुमालि का तेज प्रखर

जल धाराओं के चहुंदिश गुंजित 
ज्यूं पशु, पक्षी ,कीटों के शोर
हरित चुनरिया विहीन खेत
ज्यूं दिखा रहे बस इसी ओर

कूंच कर रहा ऋतुराज बसन्त
आता ग्रीष्म ऋतु का अब जोर


उमेशकुमारश्रीवास्तव ,जबलपुर , दिनांक २९.०३.१७

आकाक्षाओं के पद तले

आकाक्षाओं के पद तले

नित संघर्ष
स्वमं से
द्धन्द, मल्ल
उन्माद की
सीमा तले

जीवन !
जीवन
चलता चले
तल्ख धूप हो
या चांदनी हो चढ़ी
हम खड़े
ताड़ से , 
और
अखाड़े में पड़ी है 
उम्र ,
कदमों तले

तलासते खुशियां
गुम हो गये
खोजने लगे 
अब
स्वमं को 
सभी
सम्भवतया
स्वंम मैं भी

कई दिन हुए
खुद से मिले
औरों की आदत
यूं पड़ गई

आज जो हम मिले
चौंक ही हम गये
जो गैरोँ सा उसे
बस देखते ही रहे
किताबों में वो कहीं
पढ़ा सा लगा
वो अनजान था
कुछ परेशां लगा

कुछ इसारे किये
मगर मौन ही
इधर द्वन्द था
ना समझने का ही

हिकारत भरी 
नजर डाल कर
विदा कर दिया
अजनबी सा उसे

है फुरसत कहां
भूत से मैं मिलूं
आज से भी मिलूं
जब वक्त ,ये ही नहीं

दूर की सोच है
इक महल स्वप्न का
चाहतों के किले 
हैं घेरे मुझे
जिनके लिये
बस जी रहा हूं

आकाक्षाओं का घेरा 
संकुचित क्यूं करू
भोगना है मुझे
सुख की हर बून्द को

सुख के लिये
द्वन्द जी रहा हूं
चिन्तन बिना
कल जी रहा हूं
हूं खोया स्वमं को
आज की दौड़ में
ये जाने बिना
तम विवर में जीने के
पल जी रहा हूं ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव , जबलपुर, दि० २९.०३.१७

मंगलवार, 15 मार्च 2022

परिवर्तन

बून्द बून्द जीवन जल पीता
हर जीवन घट रीता रीता
तरल सरल निर्मल निर्झरता
त्याग चला ये जीवन मीता ।

सूख गये सब ही अब सोते
अपने सब अपनत्व हैं खोते
ह्रदय झरोखे सब के ही रीते
स्निग्ध भाव सब ही का बीता ।

मीत वृत्त खंडित हो जर्जर
अस्त व्यस्त रिस्तों के पंजर
दूर हुए सब अपनों के साये
दिये बुझे,है तम की अब गीता।

गिद्ध गये ,सब बने गिद्ध हैं
नोच खसोट में, सभी सिद्ध हैं
इनका किसी से भेद कहां है
इनका ही अब रूधिर सभी का ।

बदल गई सब परिभाषाएं
परवान चढ़ी हैं अभिलाषाएं
कहां रूकेंगी,क्या कोई जानें
विलख रहा है प्राण सभी का ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव
महाकाल एक्सप्रेस ट्रेन
वाराणसी से झांसी यात्रा
दिनांक १५.०३.२०२२