गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

कुछ पल निकाल आ जाया करो
बस यूं ही जरा मुस्कुराया करो
दिल को सुंकूं मिल जाये मेरे
ऐसे करम कुछ,कर जाया करो

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

ये जिन्दगी

ये जिन्दगी

जिन्दगी बस चलती रहती है 
बदलती रहती है राहें हर क्षण   
जीते हैं हम उसे अपनी मान, पर
रहते हैं अनजान जिन्दगी से हम । 

हमारा फूलना-पिचकना हंसना-गाना
रोना-धोना, कलपना, जलना-जलाना
जीवन की राह के खरपतवार 
किसी पर फूल किसी पर कांटे
यह राहों पर, हमारी प्रकृति ने ही हैं बाटे
मानते है जिन्हे हम अपने 
मोहक या रुदाली सपने
आदि से अब तक, रोपे हैं राहों पर,
कर्मों से अपने

जिन्दगी तो बस चलती है
चल रही है
जीते लग रहे हैं हम
पर जी, जिन्दगी रही है 
बांध कर स्वयं के संग 
भोगाने को कर्म, 
जिसे बांध रखे हैं हम 
अपनी निधि मान अनन्त काल से ।

करते बीजरोपड़ नित
जीवन की राहों पर, 
कर्मों से अपने
जिसके अनुरूप ही सजेगी राह
लगेंगे पादप में पुष्प और फल
बस घिसटना है जीवन के संग
राहों पर कर्मानुसार 
आनन्द लेने या पीड़ा सहने को

तनिक धारा विचारों की मोड़ दो
इसे अपनी जिन्दगी मानना छोड़ दो
जिसकी भी हो उसे ही कर समर्पित
कर्म व उसके फलों को भी
उसी को सौंप दो
तब ,न घिसटोगे न खुशी या दर्द होगा
जियोगे जिन्दगी तुम जिन्दगी के संग हो
जिन्दगी का न तुम पर कोई बन्ध होगा ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव
भोपाल से जबलपुर यात्रा
इन्टर सिटी ट्रेन
दिनांक : १८. ४. २०२६

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026

बस यूं ही

बस यूं ही 

थी धूप खिली
कुछ छांव लिये
बगिया में पात
कुछ झरे पड़े
कुछ फूल खिले
कुछ मुरझाये
कुछ कलिकां
गुमसुम सी इतराये
कुछ भ्रमर उड़े
कुछ तितली भी
मन ही मन मुस्काए
पल गदराये कुछ इतराये
आ पास मेरे यूं सहलाये
यास कहूं अनायास कहूं
बस खींच इन्हे, दिखलाए

उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोक भवन भोपाल
दिनांक : १०. ४. २०२६