गुरुवार, 27 मार्च 2025

*साख से गिर कर*

*साख से गिर कर*

साख से गिर कर बिखर गये जो 
उन पत्तों का कहना क्या
पीत बदन जो पड़े बावले 
उन पत्तों का कहना क्या

कल तक जिन के अंग रहे थे
सुख दुख जिन के संग सहे थे
वे विदेह बन जायें तो फिर
उन शाखों को कहना क्या

कई कई अंधड़ थे देखे
कई मेघ भी आये झूमे 
जेठ दुपहरी जिन संग झेली
वे सब अब हो गये पराये
दूर उन्ही से यूं पड़े एकाकी 
इन पत्तों का कहना क्या

शिखर से टूटा अब कदमों में
सखा वृक्ष की शाखाओं का
आज एकाकी मात्र पात जो
सूखे सिमटे पीत गात के
उन पत्तों का कहना क्या

पिछला पल ही जीवन था
वह भी जीता हर पल था
नही जानता अगला पल क्या
समय भागता पल पल था
समय की धारा से अनजाने
झ्न पत्तों को कहना क्या

शरद,शिशिर,हेमन्त भी देखे
बसन्त राग संग झूमा भी था
ना जाने कितने पुष्पों को
अपने अधरो से चूमा भी था
पद तल विखरे निःसहाय पड़े जो
इन पत्तों का कहना क्या 

शेष बची कुछ चंद घड़ी हैं
कदमों में भी ना आश्रय होगा
पवन लहर पर सवार हो
दूर दृगों के पार  जो होंगे
शाख से टूटे  विलग हुए
इन भग्न ह्रदय पत्तों का क्या

प्रकृति नियम ये सदा रहा
जो जुड़ा रहा वह फूला फला
एकाकी बन जो रहा अहंपोषित
वो पर चरणों का दास रहा
परिपक्व हुआ, हूं श्रेष्ठ जना
ज्यूं भाव जगा ,वो विलग हुआ
ज्यूं विलग पड़ा पीतांग बना
इन पीत बदन पत्तों का क्या

उमेश कुमार श्रीवास्तव ,जबलपुर दि० २७.०३.१७

सोमवार, 3 मार्च 2025

कैसे कह दूं श्याम तुझे ना चाहूं मैं

कैसे कह दूं श्याम 
तुझे ना चाहूं मैं

श्याम घनेरी छांव तेरी 
बलि जाऊं मैं

लख छवि तोरी, हो विभोर 
नित गाऊं मैं

ओढ़े पीत गात तुम मोरा 
सबही को भरमाऊं मैं

ताक रहे ले नयन बावरे
कैसे हिय बचाऊं मैं

वंशी धुन अन्तस में उतरी
कैसे राग मिलाऊ मैं 

हो कहते तुम हुए पराये
संग हर पल राश रचाऊ मैं

जाओ कान्हा तुम झूठे हो
कैसे प्रीत निभाऊ मैं

उमेश कुमार श्रीवास्तव
०३ ०३ २०२५ / २.३२ रात्रि 
भोपाल एक्सप्रेस

शिव स्तुति

हे कृपालु दयालु अभय शंकर
किरात उमापति हे विषधर
मझधार घिरा विमूढ़ खड़ा
अमोघ अभय कर हे हर हर


चंचल विवेक, मति मूढ़ मेरी
हर राह मेरी बिखरी  बिखरी
अभिराम मेरे हे ध्यानधरा
जाऊं कहां, अब तू ही बता

भटक रहा तम पंक लिये
नाम तेरा बस संग लिये
हे विश्वरूप हे विरुपाक्ष
दो गंगधार हूं पवित्र साफ

हे शूलपाणि हे खटवांगी
हे रुद्र मेरे भव उग्र मेरे
हे भक्तवत्सल अम्बिकानाथ
कर कल्याण मेरा हे भूतनाथ

चरण शरण दो हे शम्भू मेरे
ध्यान धरा अर्पण है तुझे
भीम मेरे पशु हूं मैं तो
भव पातक हर सच नाम करें ।

उमेश
दिनांक : ०३.०३.२०२५
शताब्दी ट्रेन, भोपाल से ग्वालियर यात्रा


बुधवार, 26 फ़रवरी 2025

चाह

चाह

चाहता हूं
शून्यता, नही निर्जीवता ।
सजीवता, बस स्पन्दन ही नही ।
ढूढता हूं एकान्तता 
निर्जनता नहीं
सरसता बस तरलता नही

मैं चाहता हूं
वाटिका
पुष्प गुच्छो से आपूर्ण ही नहीं
कलरवों से गुंजित
भंवरों, तितलियों के संग

हूं चाहता मानव समूह
उत्साह उमंगों से परिपूर्ण
नकारात्मकता से दूर
सकारात्मक बन्धुत्व की
भावनाओं के सागर में
तिरती

पर यह व्योम
अन्ध कृष्ण विवर सा 
दॄष्टि किरणे जिसमें
विलुप्त
भटकती आत्मा जिसमें
देती दिशा निर्देश
अनदेखा कर जिसे मन
स्वार्थ चिन्तन में 
मग्न

लगता नहीं कि,
ढूढ पाऊंगा कभी उस व्योम को
जो चिन्ताओं को भी 
समाहित कर शान्त कर दे
नयनों के परे के उझास में

उमेश कुमार श्रीवास्तव
२६ फरवरी २०१७

पात्रता

पात्रता

अंजुलियो में धूप भर 
बैठा रहा
साथ देगी ज्यूं जिन्दगी भर
पर फिसलती ही गई
वो सांझ तक
आ गई चुपके से घनेरी रात अब

रिक्त देखूं अजुलियों को
मैं अचंभित
शुष्क मरू मृदा सी
कब तक ठहरती वो
गदेलियों पर

मैं रहा ठहरा 
तलैया जल बना
ओस की बून्दो से आपूर्त होता
और सरिता राशि पर विहंसता
दूर होती जाती जो 
उद्गम छोड़ कर

डूब कर आकण्ठ तम में
छटपटाहट ये कैसी
धूप की ? 
क्या काम इसका ? 
रवि दे रहा था प्रचूर 
तब ले सका ना
अनन्त झोली लिये तू

फिर घनेरी रात में 
करना विलाप 
रश्मिरथी को
यूं कोसना 
शोभा न अब 
दे रहा
बहते समय के नद
में खड़े
गुजरे समय की बाट में
जड़ बने
मुझको जड़ की ही उपमा
दे रहा है

उमेश कुमार श्रीवास्तव
दिनांक : २६ फरवरी २०१७

बुधवार, 19 फ़रवरी 2025

खुद को ढूढ़ा बहोत, फिजाओं में
मिली न कोई खबर , हवाओं में
सर्द रातों में , जल उठी रूह मेरी
ताब इतनी थी , मेरे नालों  में

खड़कते पत्ते कहीं जो राहों पर
लगता जैसे अब मेरा दीदार हुआ
खौफजदा ताकूं सूनी राहों को
इल्म हो क्यूंकर जो दीदार हुआ

उम्र गुजरी बेज़ार रहते
वक्त फ़ना होने का, अब तलबगार हुआ
ऐ ख़ुदा ! मेरा नाखुदा बन
कस्ती डूबती जब मझधार हुआ


पीत पात रुखे हैं गात