सोमवार, 5 जनवरी 2026

छुपा लूं आ तुझे पलकों में यूं
कि तुझे गुमनाम सा कर दूं
भले ही मै ना देख पाऊं तुझे
पर किसी को भी ना देखने दूं ।

दृग सहारे हिय में उतारूं तुझे
है गुहा जो नेह की
हिय के झरते नेह में भिगो कर
मरमरी गेह तेरी मैं संवारूं 

बुधवार, 31 दिसंबर 2025

नव वर्ष पर

ग्रेगोरियन कैलेण्डर के वर्ष २०२५ की विदाई की व  नव वर्ष २०२६
के आगमन की  सभी को अनन्त शुभकामनाएं 
💐💐💐🙏🙏💐💐💐

जो जाने को आतुर बैठा
उसे रोक सका क्या कोई 
मोक्ष मिले यूं ऐसा जिसको
उसे टोक सका क्या कोई ।

बिदा करो सब प्रफुलित मन से
फल जो चाहे दिये रहा वो
कर्म नदी की राह रहा वह
विदा ले रहा आज है जो ।

छोड़ चला है वह अपनी थाती
नव आगन्तुक नये वर्ष को
विगत हुआ आगत कल जो था
आगत स्वागत सब कर लो ।

नये वर्ष की नई दिशाएं 
चहुंदिश जाती राहें है
गत आगत की संगम राहे
चलो हमें पुकारे हैं ।

नई रश्मि से, ले नई उमंगे
आगे कदम बढ़ायेंगे
इस पड़ाव से मंजिल तक
हम उज्ज्वल भविष्य बनायेंगे । 

उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोक भवन , भोपाल
दिनांक ३१. १२.२५


सोमवार, 29 दिसंबर 2025

नूतन अभिनन्दन "नए वर्ष"

सभी मित्रो को नववर्ष की मंगलमय शुभकामनाएं 
नूतन अभिनन्दन "नए वर्ष" 

वही रश्मि औ वही किरण है 
वही धरा औ वही गगन है 
वही  पवन है नीर वही  है 
वही कुंज  है वही लताएँ 

पर्वत सरिता तड़ाग वही हैं 
 वन आभा श्रृंगार वही है 
प्राण वायु औ गंध वही है 
भौरो  की गुंजार वही है 

क्या बदला है कुछ,नव प्रकाश में 
ना ढूंढो उसको बाह्य जगत में 
वहाँ मिलेगा कुछ ना तुमको 
डूबो तनिक अन्तःमन में 

क्या कुछ बदला है मन के भीतर ?
जब आये थे इस धरती पर 
क्या वैसा अंतस लिए हुए हो ?
या कुछ बन कर ,कुछ तने हुए हो !

अहंकार , मदभरी लालसा 
वैरी नहीं जगत की  हैं यें  
यही जन्म के बाद जगी है 
जो वैरी जग को ,तेरा कर दी है 

यदि विगत दिवस की सभी कलाएँ 
फिर फिर दोहराते जाओगे 
नए वर्ष की नई किरण से 
उमंग नई  क्या तुम पाओगे 

जब तक अन्तस  अंधकूप है 
कहाँ कही नव वर्ष है 
अंधकूप को उज्जवल कर दो 
क्षण प्रतिक्षण फिर नववर्ष है 

हर दिन हर क्षण, जो गुजर रहा है 
कर लो गणना वह वर्ष नया है 
हम बदलेंगे  युग बदलेगा 
परिवर्तन ही वर्ष नया है 

गुजर रहे हर इक पल से 
क्या हमने कुछ पाया है 
जो क्षण दे नई चेतना 
वह नया वर्ष ले आया है  

मान रहे नव वर्ष इसे तो 
बाह्य जगत से तोड़ो भ्रम 
अपने भीतर झांको देखो 
किस ओर  उझास कहाँ है तम 

अपनी कमियां ढूढो खुद ही 
औरो को बतलादो उसको 
बस यही तरीका है जिससे 
हटा सकोगे खुद को उससे 

सांझ सबेरे एक समय पर 
स्वयं  करो निरपेक्ष मनन 
क्या करना था क्या कर डाला 
जिस बिन भी चलता जीवन 

कल उसको ना दोहराऊंगा 
जिस बिन भी मैं जी पाऊंगा 
आत्म शान्ति जो दे जाए मुझको 
बस वही कार्य मैं दोहराऊंगा 

 राह यही  नव संकल्पो की 
लाएगी वह  अदभुत हर्ष 
तन मन कि हर  जोड़ी जिसको 
झूम कहेगी नया वर्ष 

आओ हम सब मिलजुल कर  
स्वागत द्वार सजाएं आज 
संकल्पित उत्साहित ध्वनि से 
नए वर्ष को लाएं आज 

   उमेश कुमार श्रीवास्तव

प्रेम

प्रेम तुम बस प्रेम हो
जल से सरल
अयस से कठोर भी
माखन से मृदु स्निग्ध भी
पवन से सुवासित
तन मन को
भरते निरन्तर
सुवास से
सच प्रेम तुम अनुपमेय हो 
क्यों कि तुम
बस प्रेम हो ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोक भवन , भोपाल
दिनांक : २९.१२.२५


यह एक सरल, भावपूर्ण और सघन अनुभूति से भरी कविता है। इसमें प्रेम को किसी एक परिभाषा में बाँधने के बजाय तत्त्वों और संवेदनाओं के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है, जो इसे गहराई देता है।
✨ काव्य–विश्लेषण
1. भाव पक्ष (भावनात्मक गहराई)
“जल से सरल / अयस से कठोर भी” —
प्रेम की द्वैध प्रकृति बहुत सुंदर ढंग से उभरती है। प्रेम केवल कोमल नहीं, आवश्यकता पड़ने पर दृढ़ भी होता है।
“माखन से मृदु स्निग्ध” —
यह उपमा प्रेम की आत्मीयता और अपनत्व को अत्यंत कोमल रूप में व्यक्त करती है।
“पवन से सुवासित” —
प्रेम का अदृश्य होते हुए भी सर्वव्यापी होना यहाँ प्रभावशाली है।
2. शिल्प और भाषा
भाषा सहज, संस्कृतनिष्ठ होते हुए भी बोझिल नहीं है।
मुक्तछंद का प्रयोग भाव के प्रवाह को रोकता नहीं, बल्कि आगे बढ़ाता है।
“तन मन को / भरते निरन्तर / सुवास से” — यहाँ लयात्मक ठहराव पाठक को भीतर तक छूता है।
3. केन्द्रीय पंक्ति (Climax)
“सच प्रेम तुम अनुपमेय हो
क्यों कि तुम
बस प्रेम हो।”
यह कविता का सबसे सशक्त क्षण है। यहाँ प्रेम को किसी तुलना से ऊपर रखकर स्वयं में पूर्ण सत्ता के रूप में स्थापित किया गया है।
🌸 समग्र प्रभाव
कविता आडंबर रहित, पर अर्थपूर्ण है।
यह प्रेम को भावुकता नहीं, बल्कि जीवन-तत्त्व के रूप में देखती है।
पाठक के मन में शांति और स्वीकार का भाव छोड़ जाती है।
संक्षिप्त आलोचनात्मक टिप्पणी
कविता “प्रेम तुम बस प्रेम हो” प्रेम को किसी एक भाव या स्थिति में सीमित नहीं करती, बल्कि उसे बहुआयामी जीवन-तत्त्व के रूप में प्रस्तुत करती है। जल, अयस, माखन और पवन जैसी उपमाएँ प्रेम की कोमलता, कठोरता, स्निग्धता और सर्वव्यापकता को प्रभावी ढंग से उद्घाटित करती हैं।
कवि की दृष्टि यहाँ भावुकता से आगे बढ़कर संतुलित दर्शन की ओर जाती है—प्रेम केवल मधुर अनुभूति नहीं, आवश्यकता पड़ने पर दृढ़ शक्ति भी है। भाषा सरल, संस्कृतनिष्ठ और प्रवाहपूर्ण है, जो भावों को बोझिल बनाए बिना गहराई प्रदान करती है।
अंतिम पंक्तियाँ—
“क्यों कि तुम / बस प्रेम हो”
कविता का सार-संक्षेप हैं, जहाँ प्रेम किसी उपमा या तुलना से परे स्वयं में पूर्ण और अनुपमेय सत्ता बनकर उभरता है।
समग्रतः यह रचना संक्षिप्त होते हुए भी अर्थगर्भित, और प्रेम की अनुभूति को सहज, सुकोमल तथा दार्शनिक ऊँचाई तक ले जाने वाली कविता है।

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2025

प्रेरणा

मैं बनाता हूं तुम्हे, तुम ना बिगाड़ो
यथार्थ की धरा पर अहसास को
भावना से दूर कर यूं ना उतारो
मैं बनाता हूं तुम्हे, तुम ना बिगाड़ो ।

रूपकों से रिस रही रस धार तुम 
गूंजती जो छन्द मे अनुस्वार तुम
हूं तृषा, बदरी मेरी बरखा की तुम
मुझको भी कोई नाम दे, अब तो पुकारो।
मैं बनाता हूं तुम्हे, तुम ना बिगाड़ो ।

दिख रही हो सामने पर दूर हो
कुछ तो कहो क्यूं आज यूं मजबूर हो
थे चले हम साथ, तुम सब जानती
संग चलने, सहचर मेरे, फिर से पुकारो
मैं बनाता हूं तुम्हे, तुम ना बिगाड़ो ।

टूटा नही, बिखरा नही,दरका नही
बात इतनी  कि अभी हरखा नही
हरितमा की चाह में पीत होता जा रहा
आतप मेरी, रश्मि अपनी, मुझपे भी डालो
मैं बनाता हूं तुम्हे, तुम ना बिगाड़ो ।

शव रहा हूं, शक्ति मेरी हर युग रही तुम
आश में विश्वास भर, जगती रही तुम
बन युगल,उल्लास भर,अवनि जो सजाई
रसमई, अब इस धरा को, यूं ना उजाड़ो
मैं बनाता हूं तुम्हे, तुम ना बिगाड़ो ।

प्रेम का तन्तु, विशुद्ध अध्यात्म जग में
तुमने दिया था मुझे, यह ब्रम्ह चिन्तन
चिन्तन यही जब बन गया सार जीवन
मरुभूमि सा अस्तित्व मेरा ना बिगाड़ो
मैं बनाता हूं तुम्हे, तुम ना बिगाड़ो ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव
भोपाल से निजामुद्दीन यात्रा
भोपाल एक्सप्रेस
दिनांक : १९.१२.२५





धरा है जीवन, जल है जीवन
वन जीवन है , पवन है जीवन
प्राण जगत में श्रेष्ठ है मानव, पर,
श्रोत सभी का रवि है जीवन ।

पर जीवन क्या है ? क्या है जीना ?

बुधवार, 17 दिसंबर 2025

नाद

रश्मियों का नाद, मैने सुना है
सन्नाटे की आवाज, मैने सुना है
गुनगुनाती सुनी हैं दश दिशायें
ब्रम्ह स्वर विलक्षण, भी सुना है

पर्वतों, कंदराओं और घाटियो की
सरगमी ध्वनि साज जो गुन सको
तड़ित सा मुस्कुरा तुम कह सकोगे
मदन स्वर बांसुरी का मैने सुना है

झूमते तरु,शाख गाती मल्हार जब
पल्लवों से टपकती जब अल्हड़ बूंदें,
जो साध लो संगीत इनके, हृदय पट पर 
कह दो अलौकिक संगीत मैने सुना है

तितलियों से बात करते मृग स्वरों को
झूमते चिग्घाड़ते गज - नग स्वरों को
सरिता हृदय सहलाती, पवन जिस स्वर
पुष्प - भृंग संवाद सा उनको सुना है ।

हर नाद मेरी नाद में यूं घुल गई है
ॐकार की नाद सा अब हो चला हूं
अनहद तो नही ! उस सा बनने हूं लगा
आत्म ध्वनि,स्वर, नाद को जब से सुना है ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोक भवन , भोपाल
दिनांक : १८ .१२.२०२५