गज़ल
ठहर, कर ले, खैरमकदम
क्यूं बेज़ार हुआ जाता कि,
किस्से नही सुने जमाने नें ।
जमाना कहां कब पूछता ?
दर्द से, क्या हाल है !
सदा,खुशियों के साथ ही
उसकी रही है दोस्ती ।
प्यार को प्यार से पूछता
बस दर्द है
प्यार तो व्यापार करता
प्यार में तू बस ज़र्द है ।
रूठने को बस रूठ ले
ना मनायेगा कोई
फेहरस्त खताओं की थमा
सजा मुकर्रर हो चली
चल चलें ऐ दिल वहीं
हों जहां बस तल्खियां
दोस्ती उनसे ही कर, जो
जीने की आदत हो गई
दिल बता पाता नही
क्यूं रंज पाले जिन्दगी
चमन सहरा बन रहा
यू नज़र किसकी है लगी ।
उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोक भवन , भोपाल
दिनांक : ०७.०५.२०२६
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