थी धूप खिली
कुछ छांव लिये
बगिया में पात
कुछ झरे पड़े
कुछ फूल खिले
कुछ मुरझाये
कुछ कलिकां
गुमसुम सी इतराये
कुछ भ्रमर उड़े
कुछ तितली भी
मन ही मन मुस्काए
पल गदराये कुछ इतराये
आ पास मेरे यूं सहलाये
यास कहूं अनायास कहूं
खींच इन्हे, तुम्हे दिखलाए
उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोक भवन भोपाल
दिनांक : १०. ४. २०२६
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