शनिवार, 25 जनवरी 2020

मैं बयार सा बहना चाहूं

मैं बयार सा बहना चाहूं

मैं बयार सा बहना चाहूं
प्रमुदित कुसुम दल हिय में
मकरंद बना बस रहना चाहूं
मैं बयार सा बहना चाहूं ၊

हर प्रसून का हिय हिलोरता
प्रेम सुधा से गागर भरता
प्रकृति प्रबन्ध का पालन करता
गरल सभी के हरना चाहूं ,
मैं बयार सा बहना चाहूं ၊

अलकों संग खेलूं, अंको में भर,
कपोल चूम लूं ,अधरों को धर
कुच प्रदेश पर भाल धरूं जब
उर प्रदेश में रमना चाहूं ,
मैं बयार सा बहना चाहूं ၊

बन्द नयन के द्वार जो कर ले
भाव जगत में गोते ले कर
स्मृतियों में, बन, मधुर रागिनी
अनन्त काल तक बजना चाहूं
मैं बयार सा बहना चाहूं ၊

अस्तित्व समर्पित करूं उसे जो
तन मन से सम्पूर्ण करे , 
प्रेमतृप्त उस अन्तस्तल में
सदा तरल बन रहना चाहूं
मैं बयार सा बहना चाहूं ၊

उमेश ,दिनांक २६.०१.२० , जबलपुर-इंदौर यात्रा , ओव्हर नाइट एक्स. देवास


प्रेम, प्रकृति और आत्म-विलय की काव्यात्मक यात्रा
(कविता: “मैं बयार सा बहना चाहूं” – उमेश कुमार श्रीवास्तव)
कविता “मैं बयार सा बहना चाहूं” आधुनिक हिंदी कविता में प्रेम को प्रकृति, संवेदना और आध्यात्मिक समर्पण के त्रिवेणी-संगम के रूप में प्रस्तुत करती है। कवि का ‘मैं’ यहाँ किसी व्यक्तिगत अहं का प्रतीक नहीं, बल्कि एक ऐसी चेतना है जो बयार बनकर सर्वत्र फैल जाना चाहती है—स्पर्श में भी, अनुभूति में भी और स्मृति में भी।
कविता का केंद्रीय बिंब ‘बयार’ अत्यंत सार्थक है। यह बयार कहीं कुसुम-दल में मकरंद बनकर ठहरती है, कहीं प्रसून के हृदय को हिलोरती है, तो कहीं गरल को हरने वाली कल्याणकारी शक्ति बन जाती है। इस प्रकार प्रेम को केवल निजी अनुभूति न रखकर कवि उसे सार्वभौमिक, पोषक और शोधनकारी तत्व के रूप में प्रतिष्ठित करता है।
कविता के मध्य खंडों में शृंगार-बोध अत्यंत संयत, सौम्य और संस्कारित है। कपोल, अधर, उर प्रदेश जैसे शब्द स्थूल देहाभिव्यक्ति नहीं बनते, बल्कि प्रेम की कोमल निकटता और भावनात्मक संलग्नता को रेखांकित करते हैं। यहाँ प्रेम स्पर्श से आगे बढ़कर अनुभूति का संगीत बन जाता है।
विशेष रूप से उल्लेखनीय है कविता का स्मृति-बोध—
“स्मृतियों में, बन, मधुर रागिनी / अनन्त काल तक बजना चाहूं”—
यह पंक्तियाँ प्रेम को क्षणिक आकर्षण से ऊपर उठाकर कालातीत चेतना का स्वर प्रदान करती हैं। प्रेम यहाँ स्थायित्व चाहता है, विसर्जन नहीं।
कविता का अंतिम खंड दार्शनिक ऊँचाई को स्पर्श करता है, जहाँ कवि अस्तित्व-समर्पण की बात करता है। “प्रेमतृप्त उस अन्तस्तल में / सदा तरल बन रहना चाहूं”—यह तरलता जड़ता के विरुद्ध जीवन की निरंतर गति का प्रतीक है। यहाँ प्रेम आत्म-विलय का मार्ग बन जाता है।
भाषा संस्कृतनिष्ठ होते हुए भी प्रवाहमयी है। “मैं बयार सा बहना चाहूं” की पुनरावृत्ति कविता को मंत्रात्मक लय प्रदान करती है, जो भाव को गहराई तक स्थापित करती है। यह पुनरावृत्ति बोझ नहीं, बल्कि काव्यात्मक आग्रह बन जाती है।
समग्रतः यह कविता प्रेम को न तो केवल भावुकता बनाती है और न ही मात्र शारीरिक आकर्षण। यह प्रेम को जीवन-दर्शन, संवेदना की शुद्ध अवस्था और आत्मिक प्रवाह के रूप में प्रतिष्ठित करती है। यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति और साहित्यिक उपलब्धि है।



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