प्रणय वेदना हिय की
श्रवण करने को तत्पर तुम
कहां थी रागनी में खुद की
प्रखर ज्वाला हुई हिय की
घुमड़ बादल बहुत आये
बरसने को हो बेकल
नयन में आ घने छाये
दृगों को भान था इसका
नही वे नेह पायेंगे
जन्हु बन तभी तो वे
धारा सोख जायेंगे
कभी मनीषा कभी प्रज्ञा
कभी मन का कोई कोना
कहता रहा मुझसे
न होगा उसका तेरा होना
पर मानता कैसे
सरस दिल जो मेरा ठहरा
दृगों की रागनी से वह
लगा बैठा सरगमी पहरा
मगर साज सारे ही
सिमट शून्य पर जा ठहरे
हो तुम बिखरी तारों सी
मैं पुच्छल सा गिरा जाता ।
न चीरा है न पीड़ा है
तड़पन है मगर अनहद
है बेरुखी जो तेरी
बढ़ाती
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