सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

पतन का पथ

पतन का पथ

करो आह्वान ज्योति का
अन्धकार व्याप्त है
अब ज्ञान की धार से 
प्रकाश फैलता नही ।

तम घना घना सा है
ज्ञान तना तना सा है 
स्थूल मठाधीश बना
अब ज्ञान बोलता नही ।

भ्रमित तम कर रहा
ज्ञान के तेग को
खनक उसमें भर रहा
रोक प्रकाश वेग को

सुना श्रृष्टि है बनी
नाद सिर्फ नाद से
मुद्रा यूं मचल रही 
खनक नाद बन गई ।

प्रकृति है बदल रही
धरा कि या हमारी है
चमक अंधकार रहा
प्रकाश मुंह छिपाये है ।

पुरुषार्थ चतुर् से हो विदा
धर्म ,मोक्ष खो गये
अर्थ, काम अलख जगा
सभी के अपने हो गये ।

अर्थ चमक यूं घनी
दृष्टि पतित हो चली
टटोलती गेह काम की
यूं जिन्दगी चल पड़ी ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोक भवन , भोपाल
दिनांक : ०२.०२.२०२६

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें