सोमवार, 29 दिसंबर 2025

प्रेम

प्रेम तुम बस प्रेम हो
जल से सरल
अयस से कठोर भी
माखन से मृदु स्निग्ध भी
पवन से सुवासित
तन मन को
भरते निरन्तर
सुवास से
सच प्रेम तुम अनुपमेय हो 
क्यों कि तुम
बस प्रेम हो ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोक भवन , भोपाल
दिनांक : २९.१२.२५


यह एक सरल, भावपूर्ण और सघन अनुभूति से भरी कविता है। इसमें प्रेम को किसी एक परिभाषा में बाँधने के बजाय तत्त्वों और संवेदनाओं के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है, जो इसे गहराई देता है।
✨ काव्य–विश्लेषण
1. भाव पक्ष (भावनात्मक गहराई)
“जल से सरल / अयस से कठोर भी” —
प्रेम की द्वैध प्रकृति बहुत सुंदर ढंग से उभरती है। प्रेम केवल कोमल नहीं, आवश्यकता पड़ने पर दृढ़ भी होता है।
“माखन से मृदु स्निग्ध” —
यह उपमा प्रेम की आत्मीयता और अपनत्व को अत्यंत कोमल रूप में व्यक्त करती है।
“पवन से सुवासित” —
प्रेम का अदृश्य होते हुए भी सर्वव्यापी होना यहाँ प्रभावशाली है।
2. शिल्प और भाषा
भाषा सहज, संस्कृतनिष्ठ होते हुए भी बोझिल नहीं है।
मुक्तछंद का प्रयोग भाव के प्रवाह को रोकता नहीं, बल्कि आगे बढ़ाता है।
“तन मन को / भरते निरन्तर / सुवास से” — यहाँ लयात्मक ठहराव पाठक को भीतर तक छूता है।
3. केन्द्रीय पंक्ति (Climax)
“सच प्रेम तुम अनुपमेय हो
क्यों कि तुम
बस प्रेम हो।”
यह कविता का सबसे सशक्त क्षण है। यहाँ प्रेम को किसी तुलना से ऊपर रखकर स्वयं में पूर्ण सत्ता के रूप में स्थापित किया गया है।
🌸 समग्र प्रभाव
कविता आडंबर रहित, पर अर्थपूर्ण है।
यह प्रेम को भावुकता नहीं, बल्कि जीवन-तत्त्व के रूप में देखती है।
पाठक के मन में शांति और स्वीकार का भाव छोड़ जाती है।
संक्षिप्त आलोचनात्मक टिप्पणी
कविता “प्रेम तुम बस प्रेम हो” प्रेम को किसी एक भाव या स्थिति में सीमित नहीं करती, बल्कि उसे बहुआयामी जीवन-तत्त्व के रूप में प्रस्तुत करती है। जल, अयस, माखन और पवन जैसी उपमाएँ प्रेम की कोमलता, कठोरता, स्निग्धता और सर्वव्यापकता को प्रभावी ढंग से उद्घाटित करती हैं।
कवि की दृष्टि यहाँ भावुकता से आगे बढ़कर संतुलित दर्शन की ओर जाती है—प्रेम केवल मधुर अनुभूति नहीं, आवश्यकता पड़ने पर दृढ़ शक्ति भी है। भाषा सरल, संस्कृतनिष्ठ और प्रवाहपूर्ण है, जो भावों को बोझिल बनाए बिना गहराई प्रदान करती है।
अंतिम पंक्तियाँ—
“क्यों कि तुम / बस प्रेम हो”
कविता का सार-संक्षेप हैं, जहाँ प्रेम किसी उपमा या तुलना से परे स्वयं में पूर्ण और अनुपमेय सत्ता बनकर उभरता है।
समग्रतः यह रचना संक्षिप्त होते हुए भी अर्थगर्भित, और प्रेम की अनुभूति को सहज, सुकोमल तथा दार्शनिक ऊँचाई तक ले जाने वाली कविता है।

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