आकर्षण
माया जाल का वह अदृष्य रेषा है
जो तंतु भी है
हिनहिनाहट व दहाड़ भी
पर अनिश्चित
क्यों कि इसमें
विकर्षण का योग भी
छिपा रहता है यूं
जैसे जन्म में छिपी मृत्यु ।
अद्धैत का घोष
दृष्यमान अनेकता
भ्रम है दृष्टि का
तार्किक विचार शक्ति व अहंकार का
जो ऊर्जा ब्रम्हाण्ड में व्याप्त है
वह नित निरन्तर है
अखण्ड अविभाज्य
दो फलकों के साथ
दृष्य व अदृष्य
उसी ऊर्जा की प्रतिकृति हैं सभी
कोई धनी ऊर्जा
कोई ऋणी ऊर्जा
के संवाहक
आकर्षण - विकर्षण
कब कहां होगा
उसके उद्भव क्षेत्र पर
निर्भर करता है
अतः मेल, ऋजु होगा वक्री होगा
या मिलन में अश्व सा वेग होगा
या होगी शेर की दहाड़
सब अनिश्चित है
पर इस धरा पर
आकर्षण सनातन
सुख आनंद का पुनः मिलन है
विकर्षण विपरीत इसका ।
उमेश कुमार श्रीवास्तव
राजभवन भोपाल
दिनांक १५ दिसम्बर २०२५
'रेषा' (Resha) के कई अर्थ हैं, जिनमें मुख्य रूप से रेखा (Line), यानी एक लंबा निशान या सीमा, और रेशा (Fiber), यानी धागा या तंतु, शामिल हैं; इसके अलावा, यह संस्कृत में घोड़े की हिनहिनाहट या शेर की दहाड़ के लिए भी इस्तेमाल होता है, और कभी-कभी इसका अर्थ 'अनिश्चित' भी होता है, खासकर पुराने दस्तावेजों में.
आकर्षण : अद्वैत, ऊर्जा और अनिश्चितता का काव्य-दर्शन
(कविता: “आकर्षण” – उमेश कुमार श्रीवास्तव)
कविता “आकर्षण” प्रेम या मानवीय संबंधों की सीमित व्याख्या से आगे बढ़कर ब्रह्मांडीय ऊर्जा, अद्वैत दर्शन और अस्तित्वगत अनिश्चितता का काव्यात्मक प्रतिपादन है। यह रचना आकर्षण को भाव नहीं, बल्कि सार्वभौमिक नियम के रूप में प्रस्तुत करती है—ऐसा नियम जिसमें सृजन और संहार दोनों अंतर्निहित हैं।
1. आकर्षण : माया, तंतु और अनिश्चितता
कविता की शुरुआत ही आकर्षण को “माया जाल की अदृश्य रेखा” और “तंतु” के रूप में परिभाषित करती है। यह तंतु कभी हिनहिनाहट है, कभी दहाड़—अर्थात आकर्षण की तीव्रता परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है। यहाँ कवि यह स्पष्ट करता है कि आकर्षण सदैव सौम्य नहीं होता; उसमें हिंस्रता और उग्रता की संभावना भी निहित है।
महत्वपूर्ण यह है कि कवि आकर्षण को अनिश्चित घोषित करता है, क्योंकि उसमें विकर्षण का योग छिपा है। “जैसे जन्म में छिपी मृत्यु”—यह उपमा आकर्षण-विकर्षण को जीवन-मरण के द्वैत के समान अनिवार्य और अविभाज्य सिद्ध करती है।
2. अद्वैत का घोष : अनेकता का भ्रम
कविता का दार्शनिक केंद्र अद्वैत है।
“दृष्यमान अनेकता / भ्रम है दृष्टि का”—यह कथन शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत की सीधी अनुगूंज है। कवि तर्क, विचार-शक्ति और अहंकार को उस भ्रम का कारण मानता है जो एकत्व को विभाजन में बदल देता है।
यहाँ आकर्षण और विकर्षण दो अलग शक्तियाँ नहीं, बल्कि एक ही अखण्ड ऊर्जा के दो फलकों के रूप में प्रस्तुत होते हैं—दृश्य और अदृश्य। यह दृष्टि कविता को आध्यात्मिक ऊँचाई प्रदान करती है।
3. ऊर्जा का विज्ञान और दर्शन का संगम
कविता में धनी ऊर्जा और ऋणी ऊर्जा जैसे शब्दों का प्रयोग आकर्षण को भौतिक विज्ञान के निकट ले आता है, जहाँ विद्युत, चुम्बकत्व और कण-भौतिकी के सिद्धांत अनायास स्मरण हो उठते हैं। पर कवि विज्ञान तक सीमित नहीं रहता—वह इसे मानवीय संबंधों और भावनात्मक मिलन से जोड़ देता है।
“कब कहां होगा / उसके उद्भव क्षेत्र पर निर्भर करता है”—यह पंक्ति संकेत करती है कि संबंधों का स्वरूप व्यक्ति की चेतना, परिस्थितियों और समय के क्षेत्र से निर्धारित होता है। इस प्रकार कविता नियतिवाद और संभाव्यता के बीच संतुलन स्थापित करती है।
4. अश्व का वेग और शेर की दहाड़ : प्रतीकात्मक तीव्रता
अश्व का वेग और शेर की दहाड़—ये प्रतीक आकर्षण की विभिन्न अभिव्यक्तियों को दर्शाते हैं। कहीं वह गति है, कहीं सत्ता; कहीं सौंदर्य, कहीं भय। कवि यह स्पष्ट करता है कि आकर्षण का परिणाम सदैव सुखद या शांत नहीं होता—वह उथल-पुथल भी ला सकता है।
5. निष्कर्ष : सनातन आकर्षण और पुनर्मिलन
कविता का अंतिम स्वर आशावादी और दार्शनिक है—
“आकर्षण सनातन / सुख आनंद का पुनः मिलन है”
यहाँ आकर्षण को आत्मा के विस्मृत स्रोत से पुनर्मिलन की प्रक्रिया माना गया है, जबकि विकर्षण उससे विच्छेद की अवस्था है। यह दृष्टि भारतीय दर्शन में लीला, वियोग और संयोग की अवधारणाओं से गहरे जुड़ाव को दर्शाती है।
समग्र मूल्यांकन
“आकर्षण” एक विचारप्रधान कविता है, जिसमें भावुकता न्यूनतम और बौद्धिक–दार्शनिक गहनता अधिक है। इसकी भाषा सघन, प्रतीकात्मक और अर्थबहुल है। यह कविता पाठक से केवल अनुभूति नहीं, चिन्तन की माँग करती है—और यही इसे सामान्य प्रेम-कविता से अलग, विशिष्ट और स्मरणीय बनाती है।
आकर्षण : अद्वैत की अनुभूति और द्वैत का अनुभव
(कविता “आकर्षण” के संदर्भ में)
कविता “आकर्षण” का मूल वैचारिक आधार अद्वैत दर्शन है, किंतु इसकी काव्य-भूमि द्वैत के अनुभवों से निर्मित है। यही द्वंद्व—या कहें, यही समन्वय—इस कविता को साधारण दार्शनिक वक्तव्य से ऊपर उठाकर एक जीवंत काव्य-दर्शन में रूपांतरित करता है। यह रचना अद्वैत को सिद्धांत के रूप में नहीं, बल्कि द्वैत के माध्यम से अनुभव करने की चेष्टा करती है।
1. द्वैत : अनुभव का संसार
द्वैत दर्शन के अनुसार सृष्टि भिन्नताओं से बनी है—जीव और ईश्वर, सुख और दुःख, आकर्षण और विकर्षण। कविता का प्रारंभिक भाग स्पष्ट रूप से इसी द्वैतात्मक अनुभव-जगत में स्थित है।
“हिनहिनाहट व दहाड़”, “आकर्षण–विकर्षण”, “अश्व सा वेग / शेर की दहाड़”—ये सभी बिंब विरोधी शक्तियों की उपस्थिति को स्वीकार करते हैं। यहाँ आकर्षण कभी सौम्य है, कभी उग्र; कभी गति है, कभी आतंक। यह वही संसार है जहाँ संबंध अनिश्चित हैं, परिणाम अस्थिर हैं और भावनाएँ परस्पर टकराती रहती हैं।
द्वैत की यह स्वीकृति कविता को यथार्थ से जोड़े रखती है। कवि यह नहीं कहता कि विकर्षण असत्य है; वह उसे जन्म में छिपी मृत्यु की तरह अनिवार्य सत्य मानता है। यह दृष्टि द्वैत को नकारती नहीं, बल्कि उसे अनुभव का अपरिहार्य क्षेत्र स्वीकार करती है।
2. अद्वैत : सत्य का स्तर
कविता का वैचारिक उत्कर्ष अद्वैत की घोषणा में निहित है—
“दृष्यमान अनेकता / भ्रम है दृष्टि का”
यह कथन शंकराचार्य के उस सूत्र को प्रतिध्वनित करता है, जहाँ अनेकता अविद्या का परिणाम और एकत्व ही परम सत्य है। कवि के अनुसार आकर्षण और विकर्षण दो स्वतंत्र शक्तियाँ नहीं, बल्कि एक ही अखण्ड ऊर्जा के दो फलकों की अभिव्यक्तियाँ हैं—दृश्य और अदृश्य।
यहाँ अद्वैत केवल आध्यात्मिक अवधारणा नहीं रहता, बल्कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा का सिद्धांत बन जाता है। धनी और ऋणी ऊर्जा का प्रयोग दर्शाता है कि भौतिक विज्ञान में दिखने वाला द्वैत भी मूलतः एक ही ऊर्जा का खेल है। इस प्रकार कविता दर्शन और विज्ञान के बीच सेतु निर्मित करती है।
3. द्वैत से अद्वैत की यात्रा
इस कविता की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह अद्वैत को आरंभिक बिंदु नहीं, गंतव्य बनाती है। कवि पहले द्वैत के अनुभवों से गुजरता है—अनिश्चितता, टकराव, वेग, दहाड़—और अंततः इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि इन सबके मूल में एक सनातन आकर्षण विद्यमान है।
यह दृष्टि भारतीय दर्शन की उस परंपरा से जुड़ती है जहाँ संसार मिथ्या नहीं, बल्कि व्यवहारिक सत्य है। द्वैत अनुभव का सत्य है, जबकि अद्वैत अस्तित्व का। कविता इसी अंतर को रेखांकित करती है।
4. आकर्षण–विकर्षण : द्वैत का रूप, अद्वैत का सार
द्वैत के स्तर पर आकर्षण और विकर्षण विरोधी प्रतीत होते हैं—एक सुख, दूसरा दुःख; एक मिलन, दूसरा विछोह। किंतु अद्वैत के स्तर पर दोनों एक ही प्रक्रिया के अंग हैं। कविता स्पष्ट करती है कि विकर्षण आकर्षण का निषेध नहीं, बल्कि उसका ही अन्य रूप है।
“आकर्षण सनातन / सुख आनंद का पुनः मिलन है”—यह कथन अद्वैत की अनुभूति को व्यक्त करता है, जहाँ सब भटकाव अंततः मूल में लौटने की चेष्टा हैं।
5. समग्र निष्कर्ष
“आकर्षण” अद्वैत बनाम द्वैत की बहस में किसी एक पक्ष का समर्थन नहीं करती, बल्कि यह दर्शाती है कि द्वैत के बिना अद्वैत की अनुभूति संभव नहीं। द्वैत मार्ग है, अद्वैत लक्ष्य। अनुभव द्वैतात्मक है, सत्य अद्वैतात्मक।
यही कारण है कि यह कविता केवल दार्शनिक वक्तव्य नहीं बनती, बल्कि चिन्तनशील काव्य के रूप में उभरती है—जहाँ पाठक को भी अपने अनुभवों के द्वैत से गुजरकर एकत्व की संभावना तक पहुँचने का निमंत्रण मिलता है।
आकर्षण : अद्वैत, विशिष्टाद्वैत और द्वैत का काव्यात्मक संवाद
(शंकराचार्य–रामानुज–माध्व दर्शन के संदर्भ में)
कविता “आकर्षण” भारतीय दार्शनिक परंपरा के तीन प्रमुख मतों—शंकराचार्य का अद्वैत, रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैत और माध्वाचार्य का द्वैत—के बीच एक सृजनात्मक संवाद स्थापित करती है। यह कविता किसी एक दर्शन का प्रत्यक्ष प्रतिपादन नहीं करती, बल्कि तीनों दर्शनों के तत्वों को समाहित कर आकर्षण-विकर्षण को एक ब्रह्मांडीय, मानवीय और आध्यात्मिक प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करती है।
1. शंकराचार्य का अद्वैत : एकत्व का बोध
शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन के अनुसार ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है; जगत् माया है और जीव-ब्रह्म में कोई भेद नहीं। कविता में यह दृष्टि स्पष्ट रूप से प्रतिध्वनित होती है—
“दृष्यमान अनेकता
भ्रम है दृष्टि का
तार्किक विचार शक्ति व अहंकार का”
यह पंक्तियाँ अविद्या को अनेकता का कारण मानती हैं, जो शंकराचार्य के मत का मूल है। कविता में वर्णित अखण्ड, अविभाज्य ऊर्जा उसी ब्रह्म-तत्त्व का काव्यात्मक रूप है। आकर्षण और विकर्षण यहाँ ब्रह्म की ही दो प्रतीतियाँ हैं—वास्तविक नहीं, अनुभवजन्य।
इस स्तर पर कविता शुद्ध अद्वैत की ओर झुकती है, जहाँ आकर्षण सनातन पुनर्मिलन है—आत्मा का ब्रह्म से।
2. रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैत : भेद सहित अभेद
रामानुजाचार्य ने अद्वैत की निराकारता का खंडन करते हुए सगुण ब्रह्म की स्थापना की। उनके अनुसार जीव और जगत ब्रह्म से भिन्न नहीं, किंतु स्वतंत्र भी नहीं—वे उसके विशेषण हैं।
कविता का यह अंश—
“दो फलकों के साथ
दृष्य व अदृष्य
उसी ऊर्जा की प्रतिकृति हैं सभी”
विशिष्टाद्वैत के अत्यंत निकट है। यहाँ अनेकता को भ्रम नहीं, बल्कि ब्रह्म की अभिव्यक्ति माना गया है। आकर्षण–विकर्षण दो स्वतंत्र शक्तियाँ नहीं, बल्कि उसी एक ऊर्जा के गुणात्मक विस्तार हैं।
रामानुज के दर्शन में भक्ति और प्रेम केंद्रीय हैं। कविता का निष्कर्ष—“आकर्षण सनातन / सुख आनंद का पुनः मिलन है”—इसी प्रेमपूर्ण समर्पण की अनुभूति को प्रकट करता है। यहाँ आकर्षण ईश्वर और जीव के भावनात्मक संबंध का रूप ले लेता है।
3. माध्वाचार्य का द्वैत : भेद की वास्तविकता
माध्वाचार्य का द्वैत दर्शन जीव और ईश्वर के बीच शाश्वत भेद को स्वीकार करता है। कविता के प्रारंभिक और मध्य भागों में यह दृष्टि मुखर होती है—
“हिनहिनाहट व दहाड़”
“आकर्षण–विकर्षण”
“अश्व सा वेग / शेर की दहाड़”
ये सभी द्वैत के सशक्त बिंब हैं, जहाँ शक्तियाँ टकराती हैं, परिणाम अनिश्चित हैं और भेद वास्तविक हैं। कविता यह स्वीकार करती है कि व्यवहारिक जगत में आकर्षण और विकर्षण का संघर्ष अपरिहार्य है। यह माध्व दर्शन के उस यथार्थवादी दृष्टिकोण से मेल खाता है, जहाँ संसार न तो मिथ्या है, न भ्रम—वह वास्तविक है।
4. कविता की विशेषता : तीनों दर्शनों का समन्वय
इस कविता की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह किसी एक दर्शन में सीमित नहीं होती। यह—
अनुभव के स्तर पर द्वैत को स्वीकार करती है (माध्व),
भाव और संबंध के स्तर पर विशिष्टाद्वैत को जीती है (रामानुज),
और सत्य के स्तर पर अद्वैत की ओर उन्मुख होती है (शंकराचार्य)।
कविता यह संकेत देती है कि आकर्षण और विकर्षण व्यवहारिक जगत की सच्चाइयाँ हैं, पर उनका मूल स्रोत एक ही अखण्ड ऊर्जा है।
5. निष्कर्ष : काव्य के माध्यम से दर्शन का सेतु
“आकर्षण” केवल एक दार्शनिक कविता नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन की त्रिधारा—अद्वैत, विशिष्टाद्वैत और द्वैत—का काव्यात्मक संगम है। यह कविता दर्शाती है कि दर्शन शुष्क तर्क नहीं, बल्कि अनुभूति का विस्तार है; और कविता वह माध्यम है जहाँ विरोधी दर्शनों के बीच भी संवाद संभव हो जाता है।
यही इस रचना की बौद्धिक गरिमा और साहित्यिक उपलब्धि है।
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