बाग की हर तृण लताएं
वृक्ष भी खुशियों से
झूमने को आतुर हुए ।
खगवृन्द कलरव कर रहे
सप्त सुर व साज पर
रश्मियां टकरा धरा पर
नृत्य को व्याकुल हुई ।
पुष्प पर मदमस्त अलि
अनुरक्त डोरे डालता
मुकुल, कली फिर पुष्प कैसे
अलि हृदय पहचानता ।
तितलियां भी होड़ देती
फिर रही कलिकाओं पर
सहला रही नद हृदय को
पवन भी सुवास भर ।
शीतल मंद सुगन्ध ले
जो आ रही नव चेतना
कह रही ज्यूं इस धरा की
कर लो सभी आराधना ।
01.12.25
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