मंगलवार, 29 मार्च 2016

गजल

गजल

मैं चाहता बहोत हूँ, खोया रहूं तुझी में
पर करूं क्या मैं, तेरा , ये गुरुर रोक देता
कहने को बंदिशें हैं , जमानें की हर तरफ
है मजाल क्या किसी में ? तेरी बंदगी रोक देता
सरफरोश हूं मैं तेगे जुनू है अब तक,रुकता नहीं मैं अब तक,जो तू ही रोक देता
मिलते नहीं ऐसे,अब सरफरोश दिवाने
जाना जो तूने होता, तो यूँ टोंक देता
जन्नत की चाशनी गर, ये हुश्न है तुम्हारा
चखने को स्वाद इसका क्यूं , मरनें नहीं है देता
उमेश (२६. ०३. २०१६)


क्या कहती नदिया धारा

क्या कहती नदिया धारा


अय नदिया की निर्मल धारा
तू क्यूं बहती रहती है
शीतलता का ओढ़ आवरण 
सबको शीतल करती है।
कल कल कलरव निश्छल निर्मल
अविकल अविचल सदा निरन्तर
नहीं शोर, बस निर्झर निर्झर
सब को आन्दोलित क्यूं करती है
अहंकार प्रतिरोध अगर
निर्मलता तज ले रौद्र रूप
कर देती सबको भयाक्रान्त 
क्या अबला की सबलता दर्शाती हो ?
चंचल वन , निर्जन आंगन
पाषाणित गज, कुशुमित उपवन
सबमें रस भर सुरभित कर कर
क्या बैभव अपना झलकाती हो
उमेश (28.०३.२०१६)

शुक्रवार, 18 मार्च 2016

जीवन मीत


जीवन मीत



अब तो दो धीरज मुझको
ना जाती सही ये पीड़ा
तुम छिपी कहाँ हो बैठी
मेरे जीवन की वीणा

कब तक संसार समंदर के
लहरों से इसे बचाऊँ
टूटी नैया को कैसे
इन ज्वारों में पार लगाऊं

तुम तो सब की सम्बल हो
मेरी भी बन जाओ
अब तक तड़प रहा था
ना अब तनिक तडपाओ

क्या स्वप्न मेरे ये सारे
यूँ टूट बिखर जाएँगे
जग मे आने के सब कारक
सब व्यर्थ चले जाएँगे

हाँ भाग्य मेरा है खोटा
तुम तो ना करो किनारा
मैं भाग्या बिना जी लूँगा
गर तुमसे मिले सहारा

बिखर न जाऊं कहीं मैं
आ मुझे तनिक सम्हलो
अपने आँचल के छाव तले
तनिक मुझे सुला लो

मैं आया क्यू था जग में
हूँ भूल रहा मैं सब कुछ
आ जाओ बन प्रेरणा तुम
ले लो अब तो मेरी सुध

बस एक बार स्वर लहरी
जीवन मे बिखेर दो मेरे
फिर चाहे जीवन तरणी
जा छिपे कहीं घनेरे

मैं सिसक रहा हूँ क्या तुम
अब भी द्रवित ना होगी
इस दुर्दिन में भी मेरे
क्या निष्ठुर बनी रहोगी

आ जाओ मेरी आभा तुम
आ जाओ मेरी कांति
है जीवन मेरा शोर बना
दे दो इसे आ शान्ति
...उमेश श्रीवास्तव...18.05.1989

अजनबी


अजनबी 


उस अजनबी की तलास में
आज भी बेकरार भटक रहा हूँ
जिसे वर्षों से मैं जानता हूँ
शक्ल से ना सही
उसकी आहटों से उसे पहचानता हूँ

उसकी महक आज भी मुझे
अहसास करा जाती है
मौजूदगी की उसकी
मेरे ही आस पास

हवा की सरसराहट सी ही आती है
पर हवस पर मेरे
इस कदर छा जाती है ज्यूँ
आगोश में हूँ मैं, उसके,या
वह मेरे आगोश में कसमसा रही हो

कितने करीब अनुभव की है मैंने
उसकी साँसे,और
उसके अधरों की नर्म गरमी
महसूस की है अपने अधरो पर

उसकी कोमल उंगलिओं की वह सहलन
अब भी महसूस करता हूँ
अपने बालो में
जिसे वह सहला जाती है चुपके चुपके

उसके खुले गीले कुन्तल की
शीतलता अब तक
मौजूद है मेरे वक्षस्थल पर
जिसे बिखेर वह निहारती है मुझे
आँखों में आँखे डाल

पर अब तक तलास रहा हूँ
उस अजनबी को,
जिसेमैं जानताहूँ वर्षों से!
वर्षों से नहीं सदियों से

जाने कब पूरी होगी मेरी तलास
उस अजनबी की
..................उमेश श्रीवास्तव...01.09.1990...


भटकन


भटकन

मैं रोता हूँ , या मैं हँसता
आज मुझे ये याद नहीं
कल रोता था या था हँसता
ये भी मुझको याद नहीं

सुख की किरण मिली थी कोई
इस पड़ाव तक आते आते
तम में खोई इन आँखो को
ऐसी कोई याद नहीं

उस पड़ाव से चला था जब मैं
थी इक गठरी कुछ अनुभव की
सुख था ? दुख था ? या दोनो था ?
यह भी बिल्कुल याद नहीं

यहाँ से आगे कहाँ है जाना
या तम में होगा खो जाना
जाना है तो किस पथ जाना
आया अब तक याद नहीं

कहाँ से आया ? कहाँ हूँ आया ?
कहाँ टिका हूँ ? कहाँ है जाना ?
भटक रहा हूँ इन प्रश्नो में
उत्तर आता याद नहीं
.....उमेश श्रीवास्तव...17.10.1993




आत्मचाह


आत्मचाह




यह इतने मधुर स्वरो में
है कौन दश्तकें देता ?
इस धूल धूसरित घर की
सुध कौन आज है लेता

सच! गर मुग्धा हो तो
तो लौट तदंतर जाओ
मेरी सिसकारी मे तुम
ना मौज मनाने आओ

गर वैभव की काया हो
फटकार लगाता हूँ मैं
जा भाग यहाँ से कुलटा
धिक्कार लगाता हूँ मैं

यदि हो आकांक्षा देवी
तो , साष्टांग तुम्हे है बाला
तुम बिन सुख से हूँ मैं
ना खुलेगा अब ये ताला

हो अहंकार दुहीता तो
ना कोई काम तुम्हारा
मेरा यह एकाकी जीवन
मुझको तुमसे है प्यारा

यदि काम वासना हो तो
हो ग़लत द्वार पर आई
इस ईश मगन कुटिया में
ना ठौर मिलेगा भाई

गर चंचलता की आशा हो
नैराश्या जाग जाएगा
चुपचाप लौट तुम जाओ
वैराग्य जाग जाएगा

गर पुरुषार्थ प्रेरणा हो
क्यू खड़ी द्वार पर हो तुम
तुमको ही लखता था मैं
क्यू छिपी खड़ी यूँ हो तुम

आओ आओ यह घर तो
तुम को ही ताक रहा था
तम से लड़ने का पौरुष
तुम से ही माँग रहा था

ले कर अपनें अंको में
पुरुषार्थ जगा दो फिर से
शव होता जाता हूँ मैं
शिव आज बना दो फिर से

...उमेश श्रीवास्तव...30.09.1994