गुरुवार, 9 मई 2019

ना यूं हमें ख्वाब में बुलाया करो

गजल

ना यूं हमें ख्वाब में बुलाया करो
मिलना हो तो हकीकत बन आया करो ।
रात फिर परेशां हमें कर डाला तुमनें
ऐसे डोरे हम पे न आजमाया करो ।
तुम जो मिल लेती हो ख्वाब में अपने
दिल, जमीं इश्क की ,आ आराम फरमाया करो ।
तड़पता किस कदर मैं खुद से बिछड़
मेरी रूह में उतर झांक जाया करो ।
हुश्न हो तुम ,नही मालूम इश्क की जलन
जरा इश्क की तलब ,खुद में भी जगाया करो ।
जानता, तुमको नही तलब इश्क-ए-आब की
पर मेरी तिश्नगी पे , तनिक तरस खाया करो ।
तुम तो जिन्दगी हो , मेरी जिन्दा दिल की
उसे इस कदर मायूस न बनाया करो ।
तब्बस्सुम को ख्यालों में न कैद रखो
मेरे इश्क पे थोड़ा तो मचल जाया करो ।
उम्र रक़ीब नहीं रुहानी बन जीने की
उम्र की आड़  ले दामन यूं न छुड़ाया करो।

उमेश श्रीवास्तव

पंच शेर

१. ऐ इश्क न हुआ कर इस उम्र में।
यार दीवाने (पागल) का तमगा लगा देता है ।

२.  कैसे कहूं नहीं इश्क मुझे तुमसे जालिम ।
बसी रहती हो सांसों में खुशबू बन कर ।

३. उम्र की चादर को यूं न फैलाओ कि,
घुट जाये बेचारे झश्क का दम।

४. उम्र गुजर जाती है जो सदा पाने में ।
हमने पाया उसे आ तेरे मयखाने में ।

५. हुश्न की दीवानगी नही ये जूनू-ए-मोहब्बत है।
हम तुम्हे देखे बिना चैन नहीं पाते जो ।

उमेश श्रीवास्तव

डूबता सा दिल

ढलती हुई सी सांझ,
डूबता सा दिल,
आज तू पहलू नही,
है टीसता सा दिल ।
रूठती सी रात,
जागती सी नींद,
करवटों में दर्द क्यूं,
पूछता सा दिल ।
आहटों पे कान क्यूं,
बेचैनियों के संग,
तू नहीं यहां कहीं ,
जब जानता ये दिल ।
रूक रही सी सांस क्यूं,
क्यूं थम रहा सा दिल,
बिखर रही सी जिन्दगी से,
है पूछता सा दिल ।
उमेश

अभिलाषा

अभिलाषा

अय सूरज
तू तपता क्यूं है ?
यूं शोलों में
जलता क्यूं है ?
आ अंको में
तुझको भर लूं
शीतल वाश
तन हिय मैं कर दूं

रहे अगन न
बाकी कण भी
सब शोषित
स्व तन मैं कर लूं
कान्ति तेरी,
तुझको ही अर्पित
शीतल कनक बना
तुझको मैं
तुझको, तुझको
अर्पित कर दूं

मैं अविरल हूं
जल की धारा
तू जग का है
पालन हारा
तेरे श्रम का मोल नही तो
क्यूं ना अनमोल
मै आगत कर लूं

उमेश श्रीवास्तव १९.०१.२०१७

मार्तण्ड-नीर

मार्तण्ड-नीर

हिय में छवि ,तेरी क्या धारी
मैं हो गई बावरी दिनकर

जड़ चेतन सब मोहित मुझ पर
हूं मोहित मैं तुझ पर
छवि मेरी बदल गई है
सब झांक रहे हैं गहवर
रक्तिम लाली गालों पर लख
हैं मोहित होते नभचर

तरूवर छोड़ धरा जड़ अपनी
आये देखो प्रियवर
मै अदनी थी पोखर , भानू
तू बना दिये है सागर

ये छवि मेरी तेरी छाया है
तू मेरा कुसुमाकर
रात रात जग ठिठुर तका है
तब प्रात मिले हो मन नागर

उमेश श्रीवास्तव १९.०१.२०१७

चन्द बन्दिशें दिलेनादां

१.
ख्वाब सी झिलमिलाती
सबा सी मदमस्त करती
ये तेरी याद है कि
इत्र की भीनी खुश्बू

२.
अल सुबो उठ कर तेरा ,
वो चुपके से आ जाना
ता दिन मेरे खयालो में रम जाना
विदा आफताब कर शब पर छाना
मुझे सोने के लिये प्यार लुटाना
तू क्या है मेंरी यार
कहीं मेरी जां तो नही

३.
तू तो उड़ रही बे-पर अय हमनशीं
है कौन जिसने तुझे ये तदबीर कही

४.
आह यूं न भर इश्क को रुसुवा न कर
इश्क में डूबना है इबादत रब की

५.
रब तेरे साथ है जो तू इश्क का है नेक बंदा
अपने बन्दे को वो कभी मायूस न करे।

उमेश श्रीवास्तव

जिन्दगी

जिन्दगी

इतनी तो फुरसत दे जिन्दगी
कुछ तो तुझे भी मैं जी सकूं
संग बहता रहा पर मिल ना सका
बिन मिले तू बता, क्या मैं कह सकूं ।

तू सदा से विदेही रही जिन्दगी
बस बही जा रही अनवरत चंचला
मायावी कीच में तू पड़ी ही नही
मै निरा जड़ हूं ठहरा ,उसी में फंसा ।

तनिक तू समय दे ,मुझे साथ ले ले
सिसकता रहूं मैं ,यूं कब तक खड़ा
जानता हूं ,मै ये कि, तू ठहरती नहीं
हो न सकता क्या ये,ले तू मुझको बहा ।

काश ! तू भी बहे संग मैं भी बहूं
मेरी धड़कनो में भी सरगम बजे
भीड़ में खो गया जो अस्तित्व मेरा
तेरी वादियों में वो कुछ,मिल तो सके ।

कभी बरखा रही, सर्द रातें कभी
जेठ की धूप सी तू कभी थी तपी
यूं ही बावरा मैं ,इनसे डरता रहा
मर्म इनका मुझे क्यूं ना समझा सकी

हर घड़ी आज तक मै लड़ता रहा
दौड़ता ही रहा हांफता ही रहा
खुद को खुद ही से मैं दूर करता रहा
बस इसे जिन्दगी मैं समझता रहा

इस कदर थक गया पर जी ना सका
लुफ्त तेरे मौसमों का, न ले मैं सका
यूं न मायूस कर तू ठहर जा जरा
ले लूं तेरी झलक जो , न ले मैं सका ।

ठहर जरा ठहर जरा ऐ जिन्दगी ठहर जरा
गम के घूंट पी तो लूं  तुझे जरा मै जी तो लूं
हो न जाये शेष ये सफ़र ,जीने की संग चाह ले
प्यासा सफर करता रहा,ये अमी भी पी तो लूं ।

उमेश श्रीवास्तव 27.01.2017 जबलपुर