रविवार, 12 अक्टूबर 2025

इक थी पगडंडी
गांव - गांव, नगर - नगर
घूम घूम कर जाती थी
हम सबको पहुंचाती थी
अपने अपने गंतव्यों पर ।

अल्हड़ थी वह
कहीं धसी सी, कहीं उठी सी
उबड़ खाबड़
जंगल जंगल
ऊसर ऊसर
या खेतों की तरहटी से
कुछ अलसाई कुछ शरमाई
झिझक झिझक
छुरमुट से जाती
टीलों पर भी चढ़ बढ़ जाती
नदी पोखरों के बगल से जाती
सोंधी शीतल महक बांटती 
सब थकान वो हरती जाती
जोड़ रखे थी सबको सब से
धीमी थी पर 
सब की साथी ।

वह प्यारी थी, न्यारी न्यारी
सब के दिल की राजदुलारी 
पग पग हो या दो- पहियों पर
सब पर अपना लाड जताती 
मेरी प्यारी वो पगडंडी
धीरे धीरे ओझल होते
कहीं खो गई वो
राग द्वेष तज ।

ढूढ़े से कभी जो मिलती 
जर्जर काया ले फोड़े फुंसी 
मवाद भरी झुरझुर काया ले
टीश भोगती टीश बांटती
विस्मृत होती स्मृति पटल से
युगों युगों की
मेरी पगडंडी ।
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पथ
कुछ हम बदले कुछ जग बदला
पगडंडी ने रूप था बदला 
नव पीढ़ी की पगडंडी आई
थोड़ी लम्बी थोड़ी चौड़ी
स्वच्छ मुहानी तरुण सयानी
चिकनी समतल सुघड़ थी काया 
फलदार वृक्ष की समुचित छाया
चौराहों पर हाट सजाया
पथ इक नाम मिला था इनको 
नगर ग्राम बस दिया था इनको ।

नगर नगर ले जा पहुंचाना 
ग्रामों को भी साथ में लाना
इतना काम दिया था इनको
दोनो छोर सजे थे इनके
दीप ज्योति तम हर लेने को
कुछ पग धारक शकट प्रिये  कुछ
रथ गामी कुछ तुरंग सवार कुछ
कुछ का आना कुछ का जाना
आवागमन सुरम्य सुहाना

हुई तेज गति मिलन बढ़े फिर
ग्राम टूट नगर बढ़े फिर
घर से दूर  नगर को भागे
नव युवकों के सपने जागे
उमड़े घुमड़े सम्बन्धों के जाल
विरह मिलन जी के जंजाल
वन नदिया पर्वत मैदान
सबका करते पथ सम्मान
अल्हड़ कमसिन पर परिधान निराला
चले पथिक ले अमृत प्याला ।

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सड़क
पक्की ईंटें और खड़ंजे
बिन ऊसर से गिट्टी आई
फोड़ शिला खंड औ पथ्थर 
कंकरीट बनी





राज  
राष्ट्रमार्ग

बुधवार, 8 अक्टूबर 2025

कालचक्र

कालचक्र का यह पहिया 
तम ज्योति योग से गढ़ा गया
जीवन पथ पर हर क्षण प्रतिपल
पथिक निरन्तर पढ़ा गया
तम ज्योति में जो सम भाव रहा
आनन्द उसी को चूमे है
तम देख टूट गया जो भी
सन्ताप उसी पर झूमे है ।
         🌹उमेश🌹
दिनांक : 08.10.25

शनिवार, 4 अक्टूबर 2025

तरंगे

तरंगे कभी नही मरती
वे अच्छे लहरों की हो सकती हैं
बुरी लहरों की भी
पर निरन्तर गतिमान 
चलायमान रहती हैं
वे मर नही सकती
कभी मर नही सकती ।

वे सरिता की हो सकती हैं
तड़ागों की भी
यहां तक की सागर की भी
हो सकती हैं वे
वे  गंदे नालों की 
नालियों की या 
खारी झीलों की भी हो सकती हैं
पर गतिशील ही होंगी
क्यों कि
तरंगे मर नही सकती ।

वे समीपस्थ सभी को स्वयं में
समेटने समाहित करने का
स्वयं के अनुरूप उन्हे
लहरों में परिवर्तित करने का 
प्रयास तो कर सकती हैं
वे दूसरी लहरों से 
प्रभावित तो हो सकती हैं
हां , कर भी सकती हैं प्रभावित
दूसरों को भी
पर वे मर नही सकती ।

ये तरंगे
धरा से गगन गगन से अनन्त लोकों तक
यहां तक कि
सोच के अन्तिम छोर तक भी
चाहे वह ब्रम्हाण्ड का अन्तिम 
विस्तृत हो रहा छोर ही क्यों न हो तक भी
गमन कर सकती हैं
ऋजु , तिर्यक अथवा वक्री
किसी भी दशा दिशा में
पर तरंगे चलीं तो फिर 
गमन ही करती हैं निरन्तर
वे मर नही सकती

जन्म के साथ मृत्यु का, है अटूट रिस्ता भौतिक जगत का नियम यह
तरंगों पर प्रभावी नही लगता
क्योंकि
प्रकृति जगत का हर पदार्थ 
जिसमें प्राण जगत के साथ 
निष्प्राण भी हैं सम्मिलित
अपना अस्तित्व खोने के उपरान्त भी
प्रेक्षित करता रहता है
तरंगों को निरन्तर अनवरत
ब्रम्हाण्ड में
अनन्त पथ पर गमन करता
संसृति काया पुनः धारण करने तक

इसलिये
जान लो,तरंगे कभी नही मरती
वे मर ही नही सकती
कभी मर नही सकती ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव
राजभवन, भोपाल
दिनांक०७.१०.२०२५


गुरुवार, 25 सितंबर 2025

आखिर तुम क्या हो राधे
आज मुझे ये बतला दे

था जन्मा जब मुझे खिलाया
अपनी बाहों में भर भर
लाड़ दिखाया प्यार जताया
दे जीवन रस झर झर झर
क्या था रिस्ता तेरा मेरा
आज मुझे ये बतला दे ।

अलट पलट जब भी मैं गिरता
वहां तेरे हाथों को पाता
घुटनों के बल जो चल पड़ता
सीने से तू उठा लगाती 
स्नेह रसों से भिगा भिगा
हर क्षण अपना लाड़ जताती 
नित सुलाती और जगाती
जाने क्या क्या जतन बना
मेरे तन मन को बहलाती
स्नेह प्रेम के हर रूपों में
कौन था अगुआ यह बतला दे
आखिर तुम क्या हो राधे
आज मुझे ये बतला दे ।


गुरुवार, 11 सितंबर 2025

शेर

न काम से आयें न बुलाने से आयें
तासीर तो तभी जब बहाने से आयें ।

शनिवार, 6 सितंबर 2025

अन्धकार में बैठा मैं था
भटकाव भरा यह जीवन था 
चहुंदिश केवल तम ही तम था
तड़प रहा अन्तरमन था ।

कृष्ण विवर सा अहम् शून्य था
पर अवशोषित वहां सभी था
शुष्क, आद्र, तरल जीवन था  
भष्म तमाग्नि में पर चिन्तन था ।

धैर्य धरा पर जब तुम आये
चिन्तन जागा तुम मुस्काये 
तम अवशोषित काया ले कर
विवेक जगा कर धैर्य जगाये ।

मधुर तेरी मुस्कानों से
स्वर लहरी जो मचल चली
मेरे अन्तस के पोर पोर में
उमंग नई किसलय सी पली ।

तेरी सांसों की छंदों में
वीणा का मेल भी मिलता है
भौतिकता के अनगूंज गूंज में
रस सरगम सा घुलता है ।

तिमिर छटा,आलोक है छाया
खड़ी है सम्मुख, तेरी काया
बदल रही माया की डोरी
शिव सम्मुख हूं जब से आया ।

ना है भटकन ना ही तम है
तरल सरल सा जीवन है
बस हूं मैं और, तू ही तू है
मन अन्तस है अन्तस मन है ।

हूं अब बैठा तुझ संग भोले
जो होना जीवन को हो ले
कर धारणा हूं ध्यान में बैठा 
जगी समाधी शरण में ले ले ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव
राजभवन , भोपाल
दिनांक : ०४.०९.२०२५




बुधवार, 3 सितंबर 2025

गज़ल : अय यार तेरी सोहबत में

गजल

अय यार तेरी सोहबत में हम 
हंस भी न सके रो भी न सके ।
किया ऐसा तुने दिल पे सितम 
चुप रह भी न सके औ कह भी न सके।

बेदर्द जमाना था ही मगर'
हंसने पे न थी कोई पाबन्दी
खारों पे सजे गुलदस्ते बन
खिल भी न सके मुरझा न सके

हम जीते थे बिन्दास जहां
औरों की कहां कब परवा की
पर आज तेरी खुशियों के लिये
खुश रह न सके गम सह न सके

हल्की सी तेरी इक जुंबिस
रुत ही बदल कर रख देती
पर आज दूर तक सहरा ये
तप भी न सके न जल ही सके

जब साथ न देना था तुमको
तो दिल यूं लगाया ही क्यूं था
यूं दम मेरा तुम ले हो गये 
ना जी ही सके ना मर ही सके ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव ०४.०९.१६