शनिवार, 29 अगस्त 2020
कारवाँ-ए-जिंदगी
गुरुवार, 27 अगस्त 2020
गजल၊ आपको आप से ही ,चुरा क्यूं न लूं
सोमवार, 24 अगस्त 2020
है भूल ये किसकी
तलास
तलास
उस अजनबी की तलाश में
आज भी बेकरार भटक रहा हूँ
जिसे वर्षों से मैं जानता हूँ
शक्ल से ना सही
उसकी आहटों से उसे पहचानता हूँ ၊
उसकी महक आज भी मुझे
अहसास करा जाती है
मौजूदगी की उसकी
मेरे ही आस पास ၊
हवा की सरसराहट सी ही आती है
पर हवस पर मेरे
इस कदर छा जाती है ज्यूँ
आगोश में हूँ मैं, उसके,या
वह मेरे आगोश में कसमसा रही हो ၊
कितने करीब अनुभव की है मैंने
उसकी साँसे,और
उसके अधरों की नर्म गरमी
महसूस की है अपने अधरों पर ၊
उसकी कोमल उंगलिओं की वह सहलन
अब भी महसूस करता हूँ
अपने बालों में
जिसे वह सहला जाती है चुपके चुपके ၊
उसके खुले गीले कुन्तल की
शीतलता अब तक
मौजूद है मेरे वक्षस्थल पर
जिसे बिखेर वह निहारती है मुझे
आँखों में आँखे डाल ၊
पर अब तक तलाश रहा हूँ
उस अजनबी को,
जिसे मैं जानता हूँ,
वर्षों से!
वर्षों से नहीं सदियों से ၊
जाने कब पूरी होगी मेरी तलाश
उस अजनबी की
..................उमेश कुमार श्रीवास्तव
निःशब्दता से नाद तक : उपनिषद, नाथ-योग और आधुनिक चेतना का काव्य-संवाद
(कविता : “निःशब्द अकेला चलता हूं” – उमेश कुमार श्रीवास्तव)
कविता “निःशब्द अकेला चलता हूं” भारतीय आध्यात्मिक परंपरा और आधुनिक मनुष्य की चेतना के बीच एक सार्थक सेतु निर्मित करती है। यह रचना उपनिषदों की आत्मविद्या, नाथ-योग की साधना-पद्धति और आधुनिक कविता की आत्मसंघर्षपूर्ण दृष्टि—तीनों को एक साझा काव्य-भूमि पर प्रतिष्ठित करती है।
1. उपनिषदिक दृष्टि : निःशब्द ब्रह्म और आंतरिक यात्रा
उपनिषदों का मूल स्वर “नेति-नेति” और “मौनं व्याख्या प्रकटिता” में निहित है—जहाँ सत्य शब्दों से परे अनुभूति है। कविता का उद्घोष—
“निःशब्द अकेला चलता हूं”
सीधे उसी उपनिषदिक परंपरा से संवाद करता है, जहाँ साधक बाह्य कोलाहल के बीच भी अंतःमौन को साधे रहता है। “अन्तस के उजले कोटर” उपनिषदों के गुहा-हृदय का काव्यात्मक रूप है, जहाँ ब्रह्म का साक्षात्कार होता है।
“भेद रहा हूं ब्रम्ह रन्ध्र मैं”—यह कथन मुण्डक और कठोपनिषद की उस यात्रा की स्मृति दिलाता है, जहाँ आत्मा अज्ञान के आवरण को भेदकर सत्य तक पहुँचती है।
2. नाथ-योग परंपरा : नाद, ब्रह्म-रन्ध्र और साधक का संघर्ष
नाथ-योग परंपरा में नाद-साधना और ब्रह्म-रन्ध्र भेदन केंद्रीय तत्व हैं। कविता में—
“पोर-पोर में नाद समाया”
“नाद सुनू या मौन सुनू”
जैसी पंक्तियाँ स्पष्ट रूप से नाद-ब्रह्म की अवधारणा को उद्घाटित करती हैं। यहाँ मौन शून्य नहीं, बल्कि नाद की सूक्ष्म अवस्था है—यही नाथ-योग का सार है।
नाथ-साधक का स्वर प्रायः निर्भीक, चुनौतीपूर्ण और संघर्षशील होता है। “अहंकार के शस्त्र लिये / प्रतिरोध चाहता सुर-असुरों का”—यह पंक्ति उसी साधक-स्वभाव की अभिव्यक्ति है, जो आत्म-संघर्ष को साधना का अनिवार्य अंग मानता है।
3. आधुनिक कविता : अकेलापन, आत्मसंघर्ष और बौद्धिक चेतना
आधुनिक हिंदी कविता में ‘अकेलापन’ प्रायः विघटन, अवसाद या असंगति का प्रतीक रहा है। किंतु इस कविता में अकेलापन नकारात्मक नहीं, साधनात्मक है। कवि न भीड़ से भागता है, न उससे भयभीत होता है—
“ना कोलाहल से भाग रहा
ना भीड तंत्र से विह्वल हूं”
यह दृष्टि आधुनिक कवि की उस चेतना को दर्शाती है जो सामाजिक यथार्थ से कटा नहीं, बल्कि उससे ऊपर उठकर अर्थ की खोज करता है। “रेला कोलाहल का” और “हलाहल का सागर” आधुनिक सभ्यता की विडंबनाओं का सटीक रूपक हैं।
4. त्रिधारा का संगम : परंपरा और आधुनिकता का समन्वय
इस कविता की सबसे बड़ी शक्ति इसका समन्वयात्मक स्वर है।
उपनिषद से इसे मौन और अद्वैत मिलता है,
नाथ-योग से नाद और साधना का संघर्ष,
और आधुनिक कविता से अस्तित्वगत प्रश्न और सजग अकेलापन।
यह कविता न तो परंपरा में विलीन होती है, न आधुनिकता में भटकती है—बल्कि दोनों के बीच सचेत संतुलन बनाती है।
5. निष्कर्ष : साधक-कवि की आधुनिक पहचान
“निःशब्द अकेला चलता हूं” आधुनिक समय का वह काव्य है, जहाँ कवि साधक भी है और साक्षी भी। उसकी निःशब्दता पलायन नहीं, उसकी अकेलापन दुर्बलता नहीं, और उसका मौन निष्क्रियता नहीं—वह नाद से भरा हुआ मौन है।
यह कविता सिद्ध करती है कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा आज भी आधुनिक कविता में नई अर्थवत्ता के साथ जीवित है—और वही कविता को कालातीत बनाती है।