बुधवार, 31 दिसंबर 2025

नव वर्ष पर

ग्रेगोरियन कैलेण्डर के वर्ष २०२५ की विदाई की व  नव वर्ष २०२६
के आगमन की  सभी को अनन्त शुभकामनाएं 
💐💐💐🙏🙏💐💐💐

जो जाने को आतुर बैठा
उसे रोक सका क्या कोई 
मोक्ष मिले यूं ऐसा जिसको
उसे टोक सका क्या कोई ।

बिदा करो सब प्रफुलित मन से
फल जो चाहे दिये रहा वो
कर्म नदी की राह रहा वह
विदा ले रहा आज है जो ।

छोड़ चला है वह अपनी थाती
नव आगन्तुक नये वर्ष को
विगत हुआ आगत कल जो था
आगत स्वागत सब कर लो ।

नये वर्ष की नई दिशाएं 
चहुंदिश जाती राहें है
गत आगत की संगम राहे
चलो हमें पुकारे हैं ।

नई रश्मि से, ले नई उमंगे
आगे कदम बढ़ायेंगे
इस पड़ाव से मंजिल तक
हम उज्ज्वल भविष्य बनायेंगे । 

उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोक भवन , भोपाल
दिनांक ३१. १२.२५


सोमवार, 29 दिसंबर 2025

नूतन अभिनन्दन "नए वर्ष"

सभी मित्रो को नववर्ष की मंगलमय शुभकामनाएं 
नूतन अभिनन्दन "नए वर्ष" 

वही रश्मि औ वही किरण है 
वही धरा औ वही गगन है 
वही  पवन है नीर वही  है 
वही कुंज  है वही लताएँ 

पर्वत सरिता तड़ाग वही हैं 
 वन आभा श्रृंगार वही है 
प्राण वायु औ गंध वही है 
भौरो  की गुंजार वही है 

क्या बदला है कुछ,नव प्रकाश में 
ना ढूंढो उसको बाह्य जगत में 
वहाँ मिलेगा कुछ ना तुमको 
डूबो तनिक अन्तःमन में 

क्या कुछ बदला है मन के भीतर ?
जब आये थे इस धरती पर 
क्या वैसा अंतस लिए हुए हो ?
या कुछ बन कर ,कुछ तने हुए हो !

अहंकार , मदभरी लालसा 
वैरी नहीं जगत की  हैं यें  
यही जन्म के बाद जगी है 
जो वैरी जग को ,तेरा कर दी है 

यदि विगत दिवस की सभी कलाएँ 
फिर फिर दोहराते जाओगे 
नए वर्ष की नई किरण से 
उमंग नई  क्या तुम पाओगे 

जब तक अन्तस  अंधकूप है 
कहाँ कही नव वर्ष है 
अंधकूप को उज्जवल कर दो 
क्षण प्रतिक्षण फिर नववर्ष है 

हर दिन हर क्षण, जो गुजर रहा है 
कर लो गणना वह वर्ष नया है 
हम बदलेंगे  युग बदलेगा 
परिवर्तन ही वर्ष नया है 

गुजर रहे हर इक पल से 
क्या हमने कुछ पाया है 
जो क्षण दे नई चेतना 
वह नया वर्ष ले आया है  

मान रहे नव वर्ष इसे तो 
बाह्य जगत से तोड़ो भ्रम 
अपने भीतर झांको देखो 
किस ओर  उझास कहाँ है तम 

अपनी कमियां ढूढो खुद ही 
औरो को बतलादो उसको 
बस यही तरीका है जिससे 
हटा सकोगे खुद को उससे 

सांझ सबेरे एक समय पर 
स्वयं  करो निरपेक्ष मनन 
क्या करना था क्या कर डाला 
जिस बिन भी चलता जीवन 

कल उसको ना दोहराऊंगा 
जिस बिन भी मैं जी पाऊंगा 
आत्म शान्ति जो दे जाए मुझको 
बस वही कार्य मैं दोहराऊंगा 

 राह यही  नव संकल्पो की 
लाएगी वह  अदभुत हर्ष 
तन मन कि हर  जोड़ी जिसको 
झूम कहेगी नया वर्ष 

आओ हम सब मिलजुल कर  
स्वागत द्वार सजाएं आज 
संकल्पित उत्साहित ध्वनि से 
नए वर्ष को लाएं आज 

   उमेश कुमार श्रीवास्तव

प्रेम

प्रेम तुम बस प्रेम हो
जल से सरल
अयस से कठोर भी
माखन से मृदु स्निग्ध भी
पवन से सुवासित
तन मन को
भरते निरन्तर
सुवास से
सच प्रेम तुम अनुपमेय हो 
क्यों कि तुम
बस प्रेम हो ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोक भवन , भोपाल
दिनांक : २९.१२.२५


यह एक सरल, भावपूर्ण और सघन अनुभूति से भरी कविता है। इसमें प्रेम को किसी एक परिभाषा में बाँधने के बजाय तत्त्वों और संवेदनाओं के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है, जो इसे गहराई देता है।
✨ काव्य–विश्लेषण
1. भाव पक्ष (भावनात्मक गहराई)
“जल से सरल / अयस से कठोर भी” —
प्रेम की द्वैध प्रकृति बहुत सुंदर ढंग से उभरती है। प्रेम केवल कोमल नहीं, आवश्यकता पड़ने पर दृढ़ भी होता है।
“माखन से मृदु स्निग्ध” —
यह उपमा प्रेम की आत्मीयता और अपनत्व को अत्यंत कोमल रूप में व्यक्त करती है।
“पवन से सुवासित” —
प्रेम का अदृश्य होते हुए भी सर्वव्यापी होना यहाँ प्रभावशाली है।
2. शिल्प और भाषा
भाषा सहज, संस्कृतनिष्ठ होते हुए भी बोझिल नहीं है।
मुक्तछंद का प्रयोग भाव के प्रवाह को रोकता नहीं, बल्कि आगे बढ़ाता है।
“तन मन को / भरते निरन्तर / सुवास से” — यहाँ लयात्मक ठहराव पाठक को भीतर तक छूता है।
3. केन्द्रीय पंक्ति (Climax)
“सच प्रेम तुम अनुपमेय हो
क्यों कि तुम
बस प्रेम हो।”
यह कविता का सबसे सशक्त क्षण है। यहाँ प्रेम को किसी तुलना से ऊपर रखकर स्वयं में पूर्ण सत्ता के रूप में स्थापित किया गया है।
🌸 समग्र प्रभाव
कविता आडंबर रहित, पर अर्थपूर्ण है।
यह प्रेम को भावुकता नहीं, बल्कि जीवन-तत्त्व के रूप में देखती है।
पाठक के मन में शांति और स्वीकार का भाव छोड़ जाती है।
संक्षिप्त आलोचनात्मक टिप्पणी
कविता “प्रेम तुम बस प्रेम हो” प्रेम को किसी एक भाव या स्थिति में सीमित नहीं करती, बल्कि उसे बहुआयामी जीवन-तत्त्व के रूप में प्रस्तुत करती है। जल, अयस, माखन और पवन जैसी उपमाएँ प्रेम की कोमलता, कठोरता, स्निग्धता और सर्वव्यापकता को प्रभावी ढंग से उद्घाटित करती हैं।
कवि की दृष्टि यहाँ भावुकता से आगे बढ़कर संतुलित दर्शन की ओर जाती है—प्रेम केवल मधुर अनुभूति नहीं, आवश्यकता पड़ने पर दृढ़ शक्ति भी है। भाषा सरल, संस्कृतनिष्ठ और प्रवाहपूर्ण है, जो भावों को बोझिल बनाए बिना गहराई प्रदान करती है।
अंतिम पंक्तियाँ—
“क्यों कि तुम / बस प्रेम हो”
कविता का सार-संक्षेप हैं, जहाँ प्रेम किसी उपमा या तुलना से परे स्वयं में पूर्ण और अनुपमेय सत्ता बनकर उभरता है।
समग्रतः यह रचना संक्षिप्त होते हुए भी अर्थगर्भित, और प्रेम की अनुभूति को सहज, सुकोमल तथा दार्शनिक ऊँचाई तक ले जाने वाली कविता है।

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2025

प्रेरणा

मैं बनाता हूं तुम्हे, तुम ना बिगाड़ो
यथार्थ की धरा पर अहसास को
भावना से दूर कर यूं ना उतारो
मैं बनाता हूं तुम्हे, तुम ना बिगाड़ो ।

रूपकों से रिस रही रस धार तुम 
गूंजती जो छन्द मे अनुस्वार तुम
हूं तृषा, बदरी मेरी बरखा की तुम
मुझको भी कोई नाम दे, अब तो पुकारो।
मैं बनाता हूं तुम्हे, तुम ना बिगाड़ो ।

दिख रही हो सामने पर दूर हो
कुछ तो कहो क्यूं आज यूं मजबूर हो
थे चले हम साथ, तुम सब जानती
संग चलने, सहचर मेरे, फिर से पुकारो
मैं बनाता हूं तुम्हे, तुम ना बिगाड़ो ।

टूटा नही, बिखरा नही,दरका नही
बात इतनी  कि अभी हरखा नही
हरितमा की चाह में पीत होता जा रहा
आतप मेरी, रश्मि अपनी, मुझपे भी डालो
मैं बनाता हूं तुम्हे, तुम ना बिगाड़ो ।

शव रहा हूं, शक्ति मेरी हर युग रही तुम
आश में विश्वास भर, जगती रही तुम
बन युगल,उल्लास भर,अवनि जो सजाई
रसमई, अब इस धरा को, यूं ना उजाड़ो
मैं बनाता हूं तुम्हे, तुम ना बिगाड़ो ।

प्रेम का तन्तु, विशुद्ध अध्यात्म जग में
तुमने दिया था मुझे, यह ब्रम्ह चिन्तन
चिन्तन यही जब बन गया सार जीवन
मरुभूमि सा अस्तित्व मेरा ना बिगाड़ो
मैं बनाता हूं तुम्हे, तुम ना बिगाड़ो ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव
भोपाल से निजामुद्दीन यात्रा
भोपाल एक्सप्रेस
दिनांक : १९.१२.२५





धरा है जीवन, जल है जीवन
वन जीवन है , पवन है जीवन
प्राण जगत में श्रेष्ठ है मानव, पर,
श्रोत सभी का रवि है जीवन ।

पर जीवन क्या है ? क्या है जीना ?

बुधवार, 17 दिसंबर 2025

नाद

रश्मियों का नाद, मैने सुना है
सन्नाटे की आवाज, मैने सुना है
गुनगुनाती सुनी हैं दश दिशायें
ब्रम्ह स्वर विलक्षण, भी सुना है

पर्वतों, कंदराओं और घाटियो की
सरगमी ध्वनि साज जो गुन सको
तड़ित सा मुस्कुरा तुम कह सकोगे
मदन स्वर बांसुरी का मैने सुना है

झूमते तरु,शाख गाती मल्हार जब
पल्लवों से टपकती जब अल्हड़ बूंदें,
जो साध लो संगीत इनके, हृदय पट पर 
कह दो अलौकिक संगीत मैने सुना है

तितलियों से बात करते मृग स्वरों को
झूमते चिग्घाड़ते गज - नग स्वरों को
सरिता हृदय सहलाती, पवन जिस स्वर
पुष्प - भृंग संवाद सा उनको सुना है ।

हर नाद मेरी नाद में यूं घुल गई है
ॐकार की नाद सा अब हो चला हूं
अनहद तो नही ! उस सा बनने हूं लगा
आत्म ध्वनि,स्वर, नाद को जब से सुना है ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोक भवन , भोपाल
दिनांक : १८ .१२.२०२५

मंगलवार, 16 दिसंबर 2025

मदान्ध

मदान्ध

मद बोझ
चाहे पद, बल, धन
या रूप यौवन का हो
सबसे काट देता है
जिस सिर चढ़ा
मद कनक बन
मानव की योनि से
उसे वह बांट देता है ।
जिन्दगी जीता नही वह
उसे जी लेती है जिन्दगी
इच्छाओं कीअसीमता
में चिंतित मदान्ध
क्षण प्रति क्षण
सुलगती चिता का
साथ देता है।

उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोक भवन , भोपाल
दिनांक : १७.१२.२०२५

रविवार, 14 दिसंबर 2025

आकर्षण

आकर्षण

आकर्षण
माया जाल का वह अदृष्य रेषा है
जो तंतु भी है 
हिनहिनाहट व दहाड़ भी
पर अनिश्चित
क्यों कि इसमें
विकर्षण का योग भी
छिपा रहता है यूं
जैसे जन्म में छिपी मृत्यु ।

अद्धैत का घोष
दृष्यमान अनेकता
भ्रम है दृष्टि का
तार्किक विचार शक्ति व अहंकार का
जो ऊर्जा ब्रम्हाण्ड में व्याप्त है
वह नित निरन्तर है
अखण्ड अविभाज्य
दो फलकों के साथ
दृष्य व अदृष्य
उसी ऊर्जा की प्रतिकृति हैं सभी
कोई धनी ऊर्जा 
कोई ऋणी ऊर्जा 
के संवाहक

आकर्षण  - विकर्षण 
कब कहां होगा 
उसके उद्भव क्षेत्र पर 
निर्भर करता है
अतः मेल, ऋजु होगा वक्री होगा
या मिलन में अश्व सा वेग होगा
या होगी शेर की दहाड़
सब अनिश्चित है
पर इस धरा पर 
आकर्षण सनातन
सुख आनंद का पुनः मिलन है
विकर्षण विपरीत इसका ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव
राजभवन भोपाल
दिनांक १५ दिसम्बर २०२५




'रेषा' (Resha) के कई अर्थ हैं, जिनमें मुख्य रूप से रेखा (Line), यानी एक लंबा निशान या सीमा, और रेशा (Fiber), यानी धागा या तंतु, शामिल हैं; इसके अलावा, यह संस्कृत में घोड़े की हिनहिनाहट या शेर की दहाड़ के लिए भी इस्तेमाल होता है, और कभी-कभी इसका अर्थ 'अनिश्चित' भी होता है, खासकर पुराने दस्तावेजों में. 


आकर्षण : अद्वैत, ऊर्जा और अनिश्चितता का काव्य-दर्शन
(कविता: “आकर्षण” – उमेश कुमार श्रीवास्तव)
कविता “आकर्षण” प्रेम या मानवीय संबंधों की सीमित व्याख्या से आगे बढ़कर ब्रह्मांडीय ऊर्जा, अद्वैत दर्शन और अस्तित्वगत अनिश्चितता का काव्यात्मक प्रतिपादन है। यह रचना आकर्षण को भाव नहीं, बल्कि सार्वभौमिक नियम के रूप में प्रस्तुत करती है—ऐसा नियम जिसमें सृजन और संहार दोनों अंतर्निहित हैं।
1. आकर्षण : माया, तंतु और अनिश्चितता
कविता की शुरुआत ही आकर्षण को “माया जाल की अदृश्य रेखा” और “तंतु” के रूप में परिभाषित करती है। यह तंतु कभी हिनहिनाहट है, कभी दहाड़—अर्थात आकर्षण की तीव्रता परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है। यहाँ कवि यह स्पष्ट करता है कि आकर्षण सदैव सौम्य नहीं होता; उसमें हिंस्रता और उग्रता की संभावना भी निहित है।
महत्वपूर्ण यह है कि कवि आकर्षण को अनिश्चित घोषित करता है, क्योंकि उसमें विकर्षण का योग छिपा है। “जैसे जन्म में छिपी मृत्यु”—यह उपमा आकर्षण-विकर्षण को जीवन-मरण के द्वैत के समान अनिवार्य और अविभाज्य सिद्ध करती है।
2. अद्वैत का घोष : अनेकता का भ्रम
कविता का दार्शनिक केंद्र अद्वैत है।
“दृष्यमान अनेकता / भ्रम है दृष्टि का”—यह कथन शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत की सीधी अनुगूंज है। कवि तर्क, विचार-शक्ति और अहंकार को उस भ्रम का कारण मानता है जो एकत्व को विभाजन में बदल देता है।
यहाँ आकर्षण और विकर्षण दो अलग शक्तियाँ नहीं, बल्कि एक ही अखण्ड ऊर्जा के दो फलकों के रूप में प्रस्तुत होते हैं—दृश्य और अदृश्य। यह दृष्टि कविता को आध्यात्मिक ऊँचाई प्रदान करती है।
3. ऊर्जा का विज्ञान और दर्शन का संगम
कविता में धनी ऊर्जा और ऋणी ऊर्जा जैसे शब्दों का प्रयोग आकर्षण को भौतिक विज्ञान के निकट ले आता है, जहाँ विद्युत, चुम्बकत्व और कण-भौतिकी के सिद्धांत अनायास स्मरण हो उठते हैं। पर कवि विज्ञान तक सीमित नहीं रहता—वह इसे मानवीय संबंधों और भावनात्मक मिलन से जोड़ देता है।
“कब कहां होगा / उसके उद्भव क्षेत्र पर निर्भर करता है”—यह पंक्ति संकेत करती है कि संबंधों का स्वरूप व्यक्ति की चेतना, परिस्थितियों और समय के क्षेत्र से निर्धारित होता है। इस प्रकार कविता नियतिवाद और संभाव्यता के बीच संतुलन स्थापित करती है।
4. अश्व का वेग और शेर की दहाड़ : प्रतीकात्मक तीव्रता
अश्व का वेग और शेर की दहाड़—ये प्रतीक आकर्षण की विभिन्न अभिव्यक्तियों को दर्शाते हैं। कहीं वह गति है, कहीं सत्ता; कहीं सौंदर्य, कहीं भय। कवि यह स्पष्ट करता है कि आकर्षण का परिणाम सदैव सुखद या शांत नहीं होता—वह उथल-पुथल भी ला सकता है।
5. निष्कर्ष : सनातन आकर्षण और पुनर्मिलन
कविता का अंतिम स्वर आशावादी और दार्शनिक है—
“आकर्षण सनातन / सुख आनंद का पुनः मिलन है”
यहाँ आकर्षण को आत्मा के विस्मृत स्रोत से पुनर्मिलन की प्रक्रिया माना गया है, जबकि विकर्षण उससे विच्छेद की अवस्था है। यह दृष्टि भारतीय दर्शन में लीला, वियोग और संयोग की अवधारणाओं से गहरे जुड़ाव को दर्शाती है।
समग्र मूल्यांकन
“आकर्षण” एक विचारप्रधान कविता है, जिसमें भावुकता न्यूनतम और बौद्धिक–दार्शनिक गहनता अधिक है। इसकी भाषा सघन, प्रतीकात्मक और अर्थबहुल है। यह कविता पाठक से केवल अनुभूति नहीं, चिन्तन की माँग करती है—और यही इसे सामान्य प्रेम-कविता से अलग, विशिष्ट और स्मरणीय बनाती है।

आकर्षण : अद्वैत की अनुभूति और द्वैत का अनुभव
(कविता “आकर्षण” के संदर्भ में)
कविता “आकर्षण” का मूल वैचारिक आधार अद्वैत दर्शन है, किंतु इसकी काव्य-भूमि द्वैत के अनुभवों से निर्मित है। यही द्वंद्व—या कहें, यही समन्वय—इस कविता को साधारण दार्शनिक वक्तव्य से ऊपर उठाकर एक जीवंत काव्य-दर्शन में रूपांतरित करता है। यह रचना अद्वैत को सिद्धांत के रूप में नहीं, बल्कि द्वैत के माध्यम से अनुभव करने की चेष्टा करती है।
1. द्वैत : अनुभव का संसार
द्वैत दर्शन के अनुसार सृष्टि भिन्नताओं से बनी है—जीव और ईश्वर, सुख और दुःख, आकर्षण और विकर्षण। कविता का प्रारंभिक भाग स्पष्ट रूप से इसी द्वैतात्मक अनुभव-जगत में स्थित है।
“हिनहिनाहट व दहाड़”, “आकर्षण–विकर्षण”, “अश्व सा वेग / शेर की दहाड़”—ये सभी बिंब विरोधी शक्तियों की उपस्थिति को स्वीकार करते हैं। यहाँ आकर्षण कभी सौम्य है, कभी उग्र; कभी गति है, कभी आतंक। यह वही संसार है जहाँ संबंध अनिश्चित हैं, परिणाम अस्थिर हैं और भावनाएँ परस्पर टकराती रहती हैं।
द्वैत की यह स्वीकृति कविता को यथार्थ से जोड़े रखती है। कवि यह नहीं कहता कि विकर्षण असत्य है; वह उसे जन्म में छिपी मृत्यु की तरह अनिवार्य सत्य मानता है। यह दृष्टि द्वैत को नकारती नहीं, बल्कि उसे अनुभव का अपरिहार्य क्षेत्र स्वीकार करती है।
2. अद्वैत : सत्य का स्तर
कविता का वैचारिक उत्कर्ष अद्वैत की घोषणा में निहित है—
“दृष्यमान अनेकता / भ्रम है दृष्टि का”
यह कथन शंकराचार्य के उस सूत्र को प्रतिध्वनित करता है, जहाँ अनेकता अविद्या का परिणाम और एकत्व ही परम सत्य है। कवि के अनुसार आकर्षण और विकर्षण दो स्वतंत्र शक्तियाँ नहीं, बल्कि एक ही अखण्ड ऊर्जा के दो फलकों की अभिव्यक्तियाँ हैं—दृश्य और अदृश्य।
यहाँ अद्वैत केवल आध्यात्मिक अवधारणा नहीं रहता, बल्कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा का सिद्धांत बन जाता है। धनी और ऋणी ऊर्जा का प्रयोग दर्शाता है कि भौतिक विज्ञान में दिखने वाला द्वैत भी मूलतः एक ही ऊर्जा का खेल है। इस प्रकार कविता दर्शन और विज्ञान के बीच सेतु निर्मित करती है।
3. द्वैत से अद्वैत की यात्रा
इस कविता की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह अद्वैत को आरंभिक बिंदु नहीं, गंतव्य बनाती है। कवि पहले द्वैत के अनुभवों से गुजरता है—अनिश्चितता, टकराव, वेग, दहाड़—और अंततः इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि इन सबके मूल में एक सनातन आकर्षण विद्यमान है।
यह दृष्टि भारतीय दर्शन की उस परंपरा से जुड़ती है जहाँ संसार मिथ्या नहीं, बल्कि व्यवहारिक सत्य है। द्वैत अनुभव का सत्य है, जबकि अद्वैत अस्तित्व का। कविता इसी अंतर को रेखांकित करती है।
4. आकर्षण–विकर्षण : द्वैत का रूप, अद्वैत का सार
द्वैत के स्तर पर आकर्षण और विकर्षण विरोधी प्रतीत होते हैं—एक सुख, दूसरा दुःख; एक मिलन, दूसरा विछोह। किंतु अद्वैत के स्तर पर दोनों एक ही प्रक्रिया के अंग हैं। कविता स्पष्ट करती है कि विकर्षण आकर्षण का निषेध नहीं, बल्कि उसका ही अन्य रूप है।
“आकर्षण सनातन / सुख आनंद का पुनः मिलन है”—यह कथन अद्वैत की अनुभूति को व्यक्त करता है, जहाँ सब भटकाव अंततः मूल में लौटने की चेष्टा हैं।
5. समग्र निष्कर्ष
“आकर्षण” अद्वैत बनाम द्वैत की बहस में किसी एक पक्ष का समर्थन नहीं करती, बल्कि यह दर्शाती है कि द्वैत के बिना अद्वैत की अनुभूति संभव नहीं। द्वैत मार्ग है, अद्वैत लक्ष्य। अनुभव द्वैतात्मक है, सत्य अद्वैतात्मक।
यही कारण है कि यह कविता केवल दार्शनिक वक्तव्य नहीं बनती, बल्कि चिन्तनशील काव्य के रूप में उभरती है—जहाँ पाठक को भी अपने अनुभवों के द्वैत से गुजरकर एकत्व की संभावना तक पहुँचने का निमंत्रण मिलता है।


आकर्षण : अद्वैत, विशिष्टाद्वैत और द्वैत का काव्यात्मक संवाद
(शंकराचार्य–रामानुज–माध्व दर्शन के संदर्भ में)
कविता “आकर्षण” भारतीय दार्शनिक परंपरा के तीन प्रमुख मतों—शंकराचार्य का अद्वैत, रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैत और माध्वाचार्य का द्वैत—के बीच एक सृजनात्मक संवाद स्थापित करती है। यह कविता किसी एक दर्शन का प्रत्यक्ष प्रतिपादन नहीं करती, बल्कि तीनों दर्शनों के तत्वों को समाहित कर आकर्षण-विकर्षण को एक ब्रह्मांडीय, मानवीय और आध्यात्मिक प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करती है।
1. शंकराचार्य का अद्वैत : एकत्व का बोध
शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन के अनुसार ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है; जगत् माया है और जीव-ब्रह्म में कोई भेद नहीं। कविता में यह दृष्टि स्पष्ट रूप से प्रतिध्वनित होती है—
“दृष्यमान अनेकता
भ्रम है दृष्टि का
तार्किक विचार शक्ति व अहंकार का”
यह पंक्तियाँ अविद्या को अनेकता का कारण मानती हैं, जो शंकराचार्य के मत का मूल है। कविता में वर्णित अखण्ड, अविभाज्य ऊर्जा उसी ब्रह्म-तत्त्व का काव्यात्मक रूप है। आकर्षण और विकर्षण यहाँ ब्रह्म की ही दो प्रतीतियाँ हैं—वास्तविक नहीं, अनुभवजन्य।
इस स्तर पर कविता शुद्ध अद्वैत की ओर झुकती है, जहाँ आकर्षण सनातन पुनर्मिलन है—आत्मा का ब्रह्म से।
2. रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैत : भेद सहित अभेद
रामानुजाचार्य ने अद्वैत की निराकारता का खंडन करते हुए सगुण ब्रह्म की स्थापना की। उनके अनुसार जीव और जगत ब्रह्म से भिन्न नहीं, किंतु स्वतंत्र भी नहीं—वे उसके विशेषण हैं।
कविता का यह अंश—
“दो फलकों के साथ
दृष्य व अदृष्य
उसी ऊर्जा की प्रतिकृति हैं सभी”
विशिष्टाद्वैत के अत्यंत निकट है। यहाँ अनेकता को भ्रम नहीं, बल्कि ब्रह्म की अभिव्यक्ति माना गया है। आकर्षण–विकर्षण दो स्वतंत्र शक्तियाँ नहीं, बल्कि उसी एक ऊर्जा के गुणात्मक विस्तार हैं।
रामानुज के दर्शन में भक्ति और प्रेम केंद्रीय हैं। कविता का निष्कर्ष—“आकर्षण सनातन / सुख आनंद का पुनः मिलन है”—इसी प्रेमपूर्ण समर्पण की अनुभूति को प्रकट करता है। यहाँ आकर्षण ईश्वर और जीव के भावनात्मक संबंध का रूप ले लेता है।
3. माध्वाचार्य का द्वैत : भेद की वास्तविकता
माध्वाचार्य का द्वैत दर्शन जीव और ईश्वर के बीच शाश्वत भेद को स्वीकार करता है। कविता के प्रारंभिक और मध्य भागों में यह दृष्टि मुखर होती है—
“हिनहिनाहट व दहाड़”
“आकर्षण–विकर्षण”
“अश्व सा वेग / शेर की दहाड़”
ये सभी द्वैत के सशक्त बिंब हैं, जहाँ शक्तियाँ टकराती हैं, परिणाम अनिश्चित हैं और भेद वास्तविक हैं। कविता यह स्वीकार करती है कि व्यवहारिक जगत में आकर्षण और विकर्षण का संघर्ष अपरिहार्य है। यह माध्व दर्शन के उस यथार्थवादी दृष्टिकोण से मेल खाता है, जहाँ संसार न तो मिथ्या है, न भ्रम—वह वास्तविक है।
4. कविता की विशेषता : तीनों दर्शनों का समन्वय
इस कविता की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह किसी एक दर्शन में सीमित नहीं होती। यह—
अनुभव के स्तर पर द्वैत को स्वीकार करती है (माध्व),
भाव और संबंध के स्तर पर विशिष्टाद्वैत को जीती है (रामानुज),
और सत्य के स्तर पर अद्वैत की ओर उन्मुख होती है (शंकराचार्य)।
कविता यह संकेत देती है कि आकर्षण और विकर्षण व्यवहारिक जगत की सच्चाइयाँ हैं, पर उनका मूल स्रोत एक ही अखण्ड ऊर्जा है।
5. निष्कर्ष : काव्य के माध्यम से दर्शन का सेतु
“आकर्षण” केवल एक दार्शनिक कविता नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन की त्रिधारा—अद्वैत, विशिष्टाद्वैत और द्वैत—का काव्यात्मक संगम है। यह कविता दर्शाती है कि दर्शन शुष्क तर्क नहीं, बल्कि अनुभूति का विस्तार है; और कविता वह माध्यम है जहाँ विरोधी दर्शनों के बीच भी संवाद संभव हो जाता है।
यही इस रचना की बौद्धिक गरिमा और साहित्यिक उपलब्धि है।






बुधवार, 10 दिसंबर 2025

विकार

विकार


नही दिखता अब
वह नीला आकाश
और नही बहती अब
शीतल मंद सुगन्ध लिये हुए
वह बयार
जो कुछ वर्षों पूर्व
मेरे बचपन से युवा होने की 
गतिमान अवधि में 
मेरी इन्द्रियों नें अनुभव की थी ।

वह निर्झर कल कल कर बहता
सरिता जल भी 
मलिन सा हो चला है
अविरल निर्झरणी का 
अपना पद,  खो चला है
वो पहाड़ी सोते
पोखर, तालाब, ताल, गढ़इयां
जहां हम गोते लगाते
जिनके तट खाना बनाते
खाते और उसी का जल
गटागट पी जाते
आज मलिन हो सो चुके हैं
या गंदगी के ढेर में
खो चुके हैं ।

वे रंग बिरंगी तितलियां
टिड्डे  मेढक व केचुए
जिनके पीछे भागते फिरते थे 
झुण्ड के झुण्ड बच्चे
कहां दुबक गये है
दिखते ही नही ढूढ़ने पर भी
इन्हे धरती ने लीला
या आसमान में खो गये हैं ?

गौरय्या , गिद्ध, कौए, चील
ना जाने कितने नभचर
जो धरा की शान थे
अद्भुत कलाकार के 
कला की जान थे
जो धरती के कैनवास पर
बिखरे प्राण थे
ढूढने पर ही कदाचित
मिल जायें
जैसे वे भी अलविदा कद रहे हों
मानवीय सभ्यता को ।

ऋतुएं भी अब सुहानी कहां हैं
कब आयें कब जायें
कहां अब इनकी पहचान हैं
अब स्वागत में नही रहता कोई
इनकी आहट घबड़ाहट 
लाती है
जबकि ये ही धरा की थाती है
धरा ही अब इनसे परेशान है ।

धुंध और कुहासों के बादलों ने
डेरा सा डाल रखा है
प्राणवायु की खोज में 
हर प्राणी इनमें जा धंसा है
हर तन व मन विह्वल हो चला है
प्राण घट रहे हैं पवन बट रहा है
महानगर, नगर, गांव  व वनों की
बंटी वायु है अब
प्रतिगमन कर रही
धनकुबेरों की बस्ती
आ रहे सांसत में  
वनचर  सारे

हे प्रकृति रच दे पुनः
ऐसा कोई आख्यान
स्वच्छ हो धरा
निर्द्वन्द हो हर प्राण ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोक भवन , भोपाल
दिनांक : १२.१२.२५


सोमवार, 8 दिसंबर 2025

आनन्द मार्ग

आनन्द मार्ग

आनन्दमयी जीवन जो चाहो 
साधु प्रवृति न त्यागो तुम
विज्ञ बनो हर ज्ञान धरो संग
आश की डोर न त्यागो तुम
एकाग्र करो मन दृढ़ करो
कोमलता त्याग बल धारो तुम
साधु , विज्ञ , आशावादी
एकाग्र और जो बलशाली
आनन्द उसी के वश में है
यूं पंच राग संधानो तुम ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोक भवन , भोपाल
दिनांक : ०९.१२.२०२५
साधु वृत्ति क्या है 
साधु वृत्ति धारी वह है  जिसका उत्तम सदाचार है और श्रेष्ठ आचरण व्यवहार है जो मोह-माया, लालच जैसे दुर्गुणों से दूर रहता है और दूसरों की सहायता को सदैव तत्पर रहता है; यह एक ऐसी जीवनशैली है जो सादगी, संयम, दया और आत्म-नियंत्रण पर केंद्रित होती है, जहाँ व्यक्ति भौतिक सुखों से ऊपर उठकर आध्यात्मिक शांति की ओर बढ़ता है और दूसरों के दुखों को दूर करने का प्रयास करता है। 


सोमवार, 1 दिसंबर 2025

नव वर्ष प्रभात विश्वास

लो आज सुरक्षित हो गई
बाग की हर तृण लताएं
वृक्ष भी खुशियों से 
झूमने को आतुर हुए ।

खगवृन्द कलरव कर रहे
सप्त सुर व साज पर
रश्मियां टकरा धरा पर
नृत्य को व्याकुल हुई ।

पुष्प पर मदमस्त अलि
अनुरक्त डोरे डालता 
मुकुल, कली फिर पुष्प कैसे
अलि हृदय पहचानता ।

तितलियां भी होड़ देती
फिर रही कलिकाओं पर
सहला रही नद हृदय को
पवन भी सुवास भर ।

शीतल मंद सुगन्ध ले
जो आ रही नव चेतना
कह रही ज्यूं इस धरा की
कर लो सभी आराधना ।

01.12.25