गुरुवार, 30 जुलाई 2026

गज़ल : गुज़रेगी जब यार के कूंचे से

गज़ल

गुज़रेगी जब यार के कूंचे से तू ऐ सबा 
नामावर बन ज़ख्मे-निहा कर देना उनसे बयाँ ।

कह देना उनसे कि अश्क भी अब सूखते 
विस्मिल दिल से आरजूएँ हो चुकी कब की फ़ना ।

याद तो करता बहोत पर सब्र ही जाता रहा
कब तलक तेगे जुनू से मैं बचाता आसियाँ ।

इस कफ़स में आज तो जां भी है मचलने लगी
छोटे पड़ने लगे अब ये ज़मीं ये आसमाँ ।

उस दिले-मगरूर से आख़िर में कहना तू जा
मिट रहा फुर्कत में तेरी, नशेमन का हर निशां ।

नामावर : सन्देश वाहक,पत्र वाहक
जख्म - ए - निहां : छिपे घाव ( दिल के )
फुर्क़त : प्रियजन से अलग होने की पीड़ा, वियोग
...उमेश श्रीवास्तव...25.11.1989

सोमवार, 27 जुलाई 2026

कर्म गति

घनघोर घटायें छाई थी 
पर एक बून्द ना आई थी
रुष्ठ हुए यूं जलद आज
ना तनिक दया दिखाई थी ।

अषाढ़ गया रीता - रीता
आंखें सब कुम्हलाई थी
फसलों की  कोमल पौधें
नीर बिना अकुलाई थी ।

वन, कानन,नग धानी चुनरी
पीत गात बन छाई थी
ताल तलैय्या सरिता पोखर
तट छोड़ सिमटी सकुचाई थी ।

धरनी प्यास लिये अपनी
सावन पर आस लगाये थी
पर विह्वल सन्तति उसकी 
करुण पुकार लगाये थी  ।

करुणाकर की भीगी आंखें 
रौद्र रूप धर आई थी
अश्रुनीर नग शिखर गिरीं
प्राणों पर विपदा आई थी ।

सूखी धरती सूखे तन मन
रीते बादल रीते चिन्तन 
गति कर्मों की व्यक्त हो रही
क्या मानवता पछताई थी ?

उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोकभवन भोपाल .
दिनांक : 29.07.2026


गुरुवार, 9 जुलाई 2026

हे कृष्ण मुरारी राधे श्याम

हे कृष्ण मुरारी राधे श्याम -२
सुर संधान, सुर संधान

दे तान वेणु पर मधुर मधुर 
सप्त सुरों की गूंज मधुर
जगति छंद उतरे धृ पर
हो भोर सुवासित जगे प्राण ।

हे कृष्ण मुरारी राधे श्याम -२
सुर संधान, सुर संधान


टूट गये सुर से सब नाते
सरगम के सुर ना हैं भाते
खनक भरी सब के कानों में
सिसक रहा सबका है बिहान ।

सुर संधान, सुर संधान
हे कृष्ण मुरारी राधे श्याम -२
सुर संधान, सुर संधान

राह अटपटी भाग रहे सब
ना, सम्बन्धो में राग रहे अब
जगति है चिन्तित जन व्याकुल हैं
मांग रहे सब इससे त्राण
.
सुर संधान, सुर संधान
हे कृष्ण मुरारी राधे श्याम -२
सुर संधान, सुर संधान

हो चले आज सब रक्त पिपासू
तम पोषक, शोषक अविनासी
स्वच्छन्द विचरते घातक चहुंदिश
विचलित है हर साधु प्राण ।

सुर संधान, सुर संधान
हे कृष्ण मुरारी राधे श्याम -२
सुर संधान, सुर संधान

वेणु,  सुदर्शन  संग ले आजा 
भयभीत धरा को धैर्य बंधा जा
विश्वास सभी का डोल गया
है  टूट रही मानव पहचान  ।


सुर संधान, सुर संधान
हे कृष्ण मुरारी राधे श्याम -२
सुर संधान, सुर संधान


उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोकभवन , भोपाल
दिनांक : ०९.०७.२०२६

रविवार, 5 जुलाई 2026

गधे हैं

इधर भी गधे हैं , उधर भी गधे हैं
जहां भी नज़र हो उधर ही गधे हैं ।

कुछ राही गधे हैं ,कुछ माही गधे हैं
मुकुट कुछ हैं पहने वो शाही गधे हैं ।

कुछ गम्भीर दिखते शालीनता ओढ़े
वो विरादरी में अपनी ज्ञानी गधे हैं ।

प्रवचन कर रहे जो, मजमा लगाये
वो राज , योगी, फ़सादाई गधे हैं ।

कई तो पढ़े हैं  किताबें  अनेको
गौर से देखने पर बस किताबी गधे हैं ।

कुछ देशी भेष में कुछ विदेशी रंग में हैं
मगर रेंकने पर सब सियासी गधे हैं ।

वो गरमी के गधे हम बरसाती गधे हैं
इनमें भी अनेको करामाती गधे हैं ।

चलो ढूढ़ लें,  विरादर को अपने
सभी तो यहां पर,बस गधे ही गधे हैं ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोकभवन, भोपाल.
दिनांक : 06.07.2026