सोमवार, 27 जुलाई 2026

कर्म गति

घनघोर घटायें छाई थी 
पर एक बून्द ना आई थी
रुष्ठ हुए यूं जलद आज
ना तनिक दया दिखाई थी ।

 अषाढ़ गया रीता - रीता
आंखें सब कुम्हलाई थी
फसलों की  कोमल पौधें
नीर बिना अकुलाई थी ।

वन, कानन,नग धानी चुनरी
पीत गात बन छाई थी
ताल तलैय्या सरिता पोखर
तट छोड़ सिमटी सकुचाई थी ।

धरनी प्यास लिये अपनी
सावन पर आस लगाये थी
पर विह्वल सन्तति उसकी 
करुण पुकार लगाये थी  ।

करुणाकर की भीगी आंखें 
रौद्र रूप धर आई थी
अश्रुनीर नग शिखर गिरीं
प्राणों पर विपदा आई थी ।

सूखी धरती सूखे तन मन
रीते बादल रीते चिन्तन 
गति कर्मों की व्यक्त हो रही
क्या मानवता पछताई थी ?

उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोकभवन भोपाल
दिनांक : 29.07.2026


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