पर एक बून्द ना आई थी
रुष्ठ हुए यूं जलद आज
ना तनिक दया दिखाई थी ।
अषाढ़ गया रीता - रीता
आंखें सब कुम्हलाई थी
फसलों की नन्ही कोमल पौधें
नीर बिना अकुलाई थी ।
वन कानन नग शिखर चुनरी
धानी से पीत बन छाई थी
ताल तलैय्या सरिता पोखर
तट छोड़ सिमटी सकुचाई थी ।
धरनी प्यास लिये अपनी
सावन पर आस लगाये थी
पर सन्तति उसकी अब भ
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