पर एक बून्द ना आई थी
रुष्ठ हुए यूं जलद आज
ना तनिक दया दिखाई थी ।
अषाढ़ गया रीता - रीता
आंखें सब कुम्हलाई थी
फसलों की कोमल पौधें
नीर बिना अकुलाई थी ।
वन, कानन,नग धानी चुनरी
पीत गात बन छाई थी
ताल तलैय्या सरिता पोखर
तट छोड़ सिमटी सकुचाई थी ।
धरनी प्यास लिये अपनी
सावन पर आस लगाये थी
पर विह्वल सन्तति उसकी
करुण पुकार लगाये थी ।
करुणाकर की भीगी आंखें
रौद्र रूप धर आई थी
अश्रुनीर नग शिखर गिरीं
प्राणों पर विपदा आई थी ।
सूखी धरती सूखे तन मन
रीते बादल रीते चिन्तन
गति कर्मों की व्यक्त हो रही
क्या मानवता पछताई थी ?
उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोकभवन भोपाल
दिनांक : 29.07.2026
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