रविवार, 5 जुलाई 2026

गधे हैं

इधर भी गधे हैं , उधर भी गधे हैं
जहां भी नज़र हो उधर ही गधे हैं ।

कुछ राही गधे हैं ,कुछ माही गधे हैं
मुकुट कुछ हैं पहने वो शाही गधे हैं ।

कुछ गम्भीर दिखते शालीनता ओढ़े
वो विरादरी में अपनी ज्ञानी गधे हैं ।

प्रवचन कर रहे जो, मजमा लगाये
वो राज , योगी, फ़सादाई गधे हैं ।

कई तो पढ़े हैं  किताबें  अनेको
गौर से देखने पर बस किताबी गधे हैं ।

कुछ देशी भेष में कुछ विदेशी रंग में हैं
मगर रेंकने पर सब सियासी गधे हैं ।

वो गरमी के गधे हम बरसाती गधे हैं
इनमें भी अनेको करामाती गधे हैं ।

चलो ढूढ़ लें,  विरादर को अपने
सभी तो यहां पर,बस गधे ही गधे हैं ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोकभवन, भोपाल
दिनांक : 06.07.2026


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