जहां भी नज़र हो उधर ही गधे हैं ।
कुछ राही गधे हैं ,कुछ माही गधे हैं
मुकुट कुछ हैं पहने वो शाही गधे हैं ।
कुछ गम्भीर दिखते शालीनता ओढ़े
वो विरादरी में अपनी ज्ञानी गधे हैं ।
प्रवचन कर रहे जो, मजमा लगाये
वो राज , योगी, फ़सादाई गधे हैं ।
कई तो पढ़े हैं किताबें अनेको
गौर से देखने पर बस किताबी गधे हैं ।
कुछ देशी भेष में कुछ विदेशी रंग में हैं
मगर रेंकने पर सब सियासी गधे हैं ।
वो गरमी के गधे हम बरसाती गधे हैं
इनमें भी अनेको करामाती गधे हैं ।
चलो ढूढ़ लें, विरादर को अपने
सभी तो यहां पर,बस गधे ही गधे हैं ।
उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोकभवन, भोपाल
दिनांक : 06.07.2026
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