गज़ल
गुज़रेगी जब यार के कूंचे से तू ऐ सबा
नामावर बन ज़ख्मे-निहा कर देना उनसे बयाँ ।
कह देना उनसे कि अश्क भी अब सूखते
विस्मिल दिल से आरजूएँ हो चुकी कब की फ़ना ।
याद तो करता बहोत पर सब्र ही जाता रहा
कब तलक तेगे जुनू से मैं बचाता आसियाँ ।
इस कफ़स में आज तो जां भी है मचलने लगी
छोटे पड़ने लगे अब ये ज़मीं ये आसमाँ ।
उस दिले-मगरूर से आख़िर में कहना तू जा
मिट रहा फुर्कत में तेरी, नशेमन का हर निशां ।
नामावर : सन्देश वाहक,पत्र वाहक
जख्म - ए - निहां : छिपे घाव ( दिल के )
फुर्क़त : प्रियजन से अलग होने की पीड़ा, वियोग
...उमेश श्रीवास्तव...25.11.1989
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