कर अनुसंधान रे मानव
विज्ञान इसी में रचा बसा है
जान सके तो जान ले मानव ।
हर कारक ब्रम्हाण्ड इसी में
जड़ चेतन लघु दीर्घ सभी
ज्ञान चक्षु तीक्ष्ण करो
बहिर्भाग ना टटोल रे मानव ।
प्राण इसी में ज्ञान इसी मे
माया का विज्ञान इसी में
ब्रम्ह इसी में भगवान इसी में
नाद इसी में मान ले मानव ।
नीर इसी में पवमान इसी में
धरणी की पहचान इसी में
पितृ लोक का ज्ञान इसी में
नव सृजन यही, पहचान ले मानव ।
सप्त लोक का ज्ञान इसी में
सप्तवर्ण को भेद जो ले
काल जगत सिमटा इसमें
भेद सके तो पहचान ले मानव ।
उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोक भवन , भोपाल
दिनांक : २३.०९.२६
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