अंको में भर लूं तुमको
मन चाहता है
चुम्बन ललाट पर तेरे
मन चाहता है
संवारूं कुंतल तेरे
काली घटा के साये में
सुकून तलासते
निश्चिंत सो जाने को
आंखे चाहती
आंखों में झांकना तेरे
मीन बन बसना
मादक झील में तेरे
वे चाहती निरन्तर
निहारना तुझको
अक्स बना
दिल में उतारने को
नासिका मचल जाती
गंध पा तेरे तन की
संजो लेती जिसे
यादों में भिगोने को
हाय ! तेरा रूप
कल्पनाओं से निकल
कब अनावृत होगा
सम्मुख आ मेरे
दिनांक ०६.१०.२६
लोक भवन , भोपाल
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें