मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

मानव मन

मन चाहता है 
अंको में भर लूं तुमको
मन चाहता है 
चुम्बन ललाट पर तेरे

मन चाहता है
संवारूं कुंतल तेरे
काली घटा के साये में
सुकून तलासते
निश्चिंत सो जाने को

आंखे चाहती
आंखों में झांकना तेरे
मीन बन बसना
मादक झील में तेरे
वे चाहती निरन्तर
निहारना तुझको
अक्स बना 
दिल में उतारने को

नासिका मचल जाती
गंध पा तेरे तन की
संजो लेती जिसे
यादों में भिगोने को
हाय ! तेरा रूप
कल्पनाओं से निकल
कब अनावृत होगा
सम्मुख आ मेरे

दिनांक ०६.१०.२६
लोक भवन , भोपाल


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें