बुधवार, 9 अक्टूबर 2013

दिल के नाले (शेर )

दिल के नाले (शेर )
             १
मेरे नालों में गर दिल का दर्द भी होगा
तुम्हे भी नींद ना होगी तुम्हे भी चैन ना होगा

             २
उन्ही की सूरतें उनके ख्यालात आते हैं
करते हैं हम कुछ याद , मगर वो याद आते हैं

             ३
अरे अब रोक लो इनको , कहीं पागल न हो जाऊं
तुम्हारी याद संग जी जी , तुम्हे ही भूल ना जाऊं

             ४
कसक कहते किसे तुमको गर मालूम होता
न कहते , फुर्कत में हमें ना याद किया करना

              ५
गमो के सहारे, जिया यूँ किया करते
कभी नालों पे चला करते कभी आहें भरा करते


                      उमेश कुमार श्रीवास्तव

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ग़ज़ल

ग़ज़ल

इस कदर दिल पे छाई हो तुम
जिंदगी बन हर तरफ गुनगुनाई हो तुम

खुशबू से तेरी महकी बज्म मेरी
सहारा को गुलशन बनाई हो तुम

ख्वाब था, ख्वाब हूँ,ख्वाब अब ना रहूँगा
हक़ीकत का वो मंज़र लाई हो तुम

है हक़ीकत यही अहले दिल कह रहा
मेरी हर साँस में समाई हो तुम

ये ना समझो की तारीफ़ हूँ कर रहा
बन के तकदीर मेरी झिलमिलाई हो तुम

इस कदर दिल पे छाई हो तुम
जिंदगी बन हर तरफ गुनगुनाई हो तुम

                                        उमेश कुमार श्रीवास्तव


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इक बूँद हूँ मैं




इक बूँद हूँ मैं
आश की
विश्वास की
आभास की
जो कभी ना भर सकी
प्याला , प्याला !
इक प्यास की

इक बूँद हूँ मैं
श्वेद की
निर्वेद की
इक खेद की
जीती रही जो सर्वदा
बहती हुई निर्बाध सी

इक बूँद हूँ मैं
उस जलद की
जो कभी बरसा नहीं
हरसा नहीं
थरसा नहीं
स्वयं में सिमटा रहा
जो सर्वदा...सर्वदा

इक बूँद हूँ मैं
अजनबी सी
अनछुइ सी
अनकही सी
अज्ञात लुप्त
हो जाए गुप्त
वाष्प की जो
बन परिणीता


...........उमेश श्रीवास्तव..


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आह्ववाहन

कब तक बैठोगे तम में तुम
बाट जोहते दिनकर की
तुम दीप जलाओ तो पहले
सूरज तो निकलेगा ही ।

आत्मदीप की आभा में
राकेश तिमिर से लगने लगें
प्रज्जवलित करो तुम आत्म अनल
हिम-तम फिर तो पिघलेगा ही

मन के चंचल इन अश्वों को
इक डोरी में तो बांधो
अधीर हुए क्यूँ बैठे यूँ
मंज़िल पथ तो निकलेगा ही

हैं पथरीली राहें तो क्या
क्या कर लेंगे उतन्ग शिखर
पग अवधारो पहले तो तुम
सुमन राह में बिखरेगा ही

कभी नहीं विचलित होना
कर्म राह से तुम सीखो
इस पार भले मरूभूमि मिले
उस पार सुमन बिखरेगा ही ।


                     ......उमेश श्रीवास्तव


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जागो हे भारत



अय मानवता के प्रहरी
रक्त के धब्बे
पड़े आज क्यू तुझ पर
है कौन छिपा, जो तुझसे
छीनता सौम्य आवरण तेरा
क्रूरता का पहनाने को वसन

अय सभ्यता दूत
उदगाता संस्कृति के
है कौन घोलता जहर
बर्बरता तामसी
वायु जल वाणी का

अय धर्म के प्राण
अध्यात्म के चिंतन
क्यूँ बाधित हुई है धार
कौन तंत्रिका रोध बना
निष्प्राण किया
कृषकाय भीम सम बदन

अय शक्ति के पुंज
किन्कर्तव्य विमूढ़ हुए क्यूँ
बर्बरता का देख तांडवी नृत्य
करते भयभीत सभ्यता सस्कृति को
जब करने को एकता भेद

अय अजर अमरता दीप
उठो उठो तुम जागो
भयभीत हुई संस्कृति
आलस्य तुम त्यागो
आज जलाओ फिर वैसी ही ज्वाला
यज्ञ भूमि पर बैठ , जपे सब
भारत की ही फिर माला

                            ...उमेश श्रीवास्तव...
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चंद मुक्तक-२



चंद मुक्तक


पलकें उठी उठ कर गिरीं
ओंठो की पंखुड़ीयाँ कपकपा उठी
ऐसा लगा जैसे साकी
वो कुछ कहना चाहतीं हों......उमेश



बसते हैं दोजख की नादिया के किनारे
ख्वाबों में बसाए हुए जन्नत के नज़ारे
ख्वाबों को रूबरू करने का है हौसला
बदलेंगे हम तस्वीर को अपने कर्मों के सहारे........उमेश



हर समय याद तेरी आती रही
जिंदगी पास ही गुनगुनाती रही
जिसे खोजा फिरे हर घड़ी हर दिशा
दिल में बैठी वो मूरत मुस्कुराती रही .........उमेश




ये दुनिया हुस्न व सोहरत की , कब किसका साथ निभाई है
कभी जिंदा रखा मुर्दा कर , तो कभी जिंदा ही जला डाला.........उमेश


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मंगलवार, 8 अक्टूबर 2013

चंद मुक्तक

   
चंद मुक्तक

        १

आँखो में मुस्कान लिए हो
ओठों पर मधुमास
ज़ुल्फो में सावन की घटा ले
हो , जाती किसके पास



        २


किन सोचों में गुमसुम हो तुम
किन ख्यालो में हो डूबी
ये बीते पल की यादें देखो
कहाँ कहाँ ले कर डूबी



         ३


सिमटी सिमटी वहाँ खड़ी क्यूँ
अपने में ही सकुचाती
किस परदेसी की बात जोहती
ले व्यथा विरह की हहराती


          ४


घूर रही क्यूँ तिरछी चितवन
क्या कोई तकरार है
पर ओठों पर शोख हँसी है
लगता आया प्यार है


          ५


खोजती है नज़र उन्ही उनको ऐ सनम
जिनने दिल को दर्द दे कर कर किनारा है लिया


                     उमेश कुमार श्रीवास्तव
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