गुरुवार, 25 मार्च 2021

क्या है प्यार

किसी ने जब पूछा, क्या है प्यार ?
चिन्तन तनिक ठिठक गया
चंचल मन तनिक भ्रमित भया
पर प्रज्ञा तनिक सजग हुई
विद्या को उसने दिया यूं जबाब

स्पन्दित दिल की लहर है प्यार
शुद्ध लहू की धार है प्यार
रोशन जग को करती आंखे
उन आंखों की ज्योति है प्यार
बन्द कली प्रमुदित हो चहके
नर्म,गर्म वो दुलार है प्यार

अंग अंग उन्मादित कर दे
चेहरे पर आतुरता भर दे
अबूझ प्यास सा जीवन कर दे
चिन्तन को भी मोहित कर दे
जीवन की हर दशा दिशा  को
एक राग से गुंजित कर दे
परमात्म जगत से प्रतिध्वनित हुई
दो आत्म जगत का राग है प्यार

उमेश कुमार श्रीवास्तव , 23.03.17 जबलपुर

गजल

गजल

मैं चाहता बहोत हूँ, खोया रहूं तुझी में
पर करूं क्या मैं, तेरा , ये गुरुर रोक देता ।

कहने को बंदिशें हैं , जमानें की हर तरफ
है मजाल क्या किसी में ? तेरी बंदगी रोक देता ।

सरफरोश हूं मैं तेगे जुनू है अब तक,
रुकता नहीं मैं अब तक,जो तू ही न रोक देता ।

मिलते नहीं ऐसे,अब सरफरोश दिवाने
जाना जो तूने होता, तो यूँ न टोंक देता ।

जन्नत की चाशनी गर, ये हुश्न है तुम्हारा
चखने को स्वाद इसका क्यूं  , मरनें नहीं है देता 

उमेश (२६. ०३. २०१६)

सोमवार, 22 मार्च 2021

होली

सभी को मंगल हो,ये होली , 
उमंग मिली,भंग की गोली,
टेसू सा सुर्ख रहे जीवन
चहुं दिश गूंजे , हंसी ठिठोली
     उमेश

शुक्रवार, 12 मार्च 2021

होली के रंग सब के संग

होली के रंग सब के संग

होली के रंग में
रंगीली उमंग में
आपका भी साथ हो
दिलों की ही बात हो
नयनों में प्यार हो
रंगों की बहार हो
हाथों में गुलाल हो
चेहरे सब के लाल हों

फागुनी बयार में
सुनहरी एक तान हो
झूमते बदन के संग
खिलती मुस्कान हो

यार हो प्यार हो
दुलार ओ सत्कार हो
जिन्दगी की रंगीनियों की
खुली इक दुकान हो

बांटिये खुले खुले
बन्द न कोई प्राण हो
प्यार भरे रंग सब
न दिल में कोई त्राण हो

हरे नीले पीले के संग
गुलाबी भी श्रृंगार हो
दिलों में भरे उंमग
लाली लिये प्यार हो

रिस्तों की खटास पर
मिठाइयौं की मार हो
मिटा दो खटास सब
होली की पुकार हो

गले लगा प्रिये सभी
रंग दो सभी चुनर
न हो अलग थलग कोई
बस प्यार की खुमार हो

आओ खेले होली हम सब
राधा कान्हा बन बन
प्रेम जगे धरती पर सात्विक
बने धरा वृन्दावन

सबके जीवन में खिल जायें
सतरंगी  फुलवारी
सुख की उझास यूं फैले
मिटे दुःखों की अंधियारी

सभी गुरु जन को सादर नमन के साथ, बन्धुओं को सादर ,एंव कनिष्ठ जन को सस्नेह होली का अमिनन्दन एंव मंगल कामना ।

उमेश श्रीवास्तव  जबलपुर १३.०३.२०१७

गुरुवार, 11 मार्च 2021

मैं प्यार हूं

मैं प्यार हूं, 
क्या तुम भी कहोगी ?
मैं बहता तरल हूं , 
क्या तुम भी बहोगी ?
मैं प्यार हूं , क्या तुम भी कहोगी ?

बसन्ती है रंगत
मेरे गात की
मादक-मोहनी छवि
मेरे जाति की ,
क्या रंगत मे मेरी 
तुम भी घुलोगी
उन्मत्त हो कर
मुझ संग चलाेगी ?

वीणा की धुन सी
वाणी है मेरी 
मधु चासनी सी
वचनों की लड़ियां
सुधा के बिना
हैं कुपोषित ये सारे
क्या लता सोम बन तुम
पोषित करोगी ?

है पथ ये दूभर
पर,मादक डगर है
कटंक भरा पर
सुरभित भ्रमण है
चला जो भी इस पर
डगमग ही डगमग
सहारा मिला तो
सुहाना सफर है
क्या मेरे संग मेरी
हमडग तुम बनोगी ?

जब से धरा है
भटकता रहा हूं
टूटता भी रहा हूं 
बिखरता रहा हूं
जब भी मिली तुम
संवर भी गया हूं
प्रेम के ही सहारे
निखर भी गया हूं 
क्या नयनों की अमी को
अधरों पे ला के
मेरे प्राण मुझको अर्पित करोगी  ?

उमेश कुमार श्रीवास्तव
केराकत , जौनपुर
दिनांक : ११.०३.२०२१.



बुधवार, 10 मार्च 2021

ग़ज़ल : कहाँ से लाए हो चुरा के

ग़ज़ल

कहाँ से लाए हो चुरा के इन नज़रो को 
चुरा लेती हैं  जो हर दिल करीने से

पलक के पर्दों को यूँ आहिस्ता उठाती क्यूँ हो
कहीं डर तो नही , कोई दिल फिसल न गिरे

तीखी नही जो सीधे बेध देती है
खंजर सी तिरछी नज़र से देखा न करो

कहने को लाख कहे झील या दरिया
हमे तो जाम-ए-हाला ही नज़र आती है

क्या कम तेरा हुस्न खाना खराब करने को
तीर-ए -नज़र के वार से हो क्यूँ विस्मिल हम

यदि चाहते हम भी हुस्न का दीदार करें
इश्क की चासनी भर इनको झुका लो ज़रा

                                      उमेश कुमार श्रीवास्तव

ग़ज़ल : तरासते रहे औरों को

ग़ज़ल

तरासते रहे औरों को , कमियाँ निकाल निकाल
गर खुद को तरास लेते हर दिल अज़ीज होते

औरों ने चाहा जब जब हमको तरासना
अपने गुरूर में हम आपा रहे हैं खोते

हमने तो जाना ये ही हम से भला न कोई
औरों की मज़ाल क्या जो कह दे हमे हो खोटे

हम जान ये रहे थे मसहूर हो रहे हैं
बदगुमानियों में शायद अब तक रहे हैं सोते

ऐ जिंदगी तुझसे बस एक ही गिला है
क्यूँ शामिल किए नहीं, जो सच्चे मीत होते

तरासते रहे औरों को , कमियाँ निकाल निकाल
गर खुद को तरास लेते हर दिल अज़ीज होते

उमेश कुमार श्रीवास्तव ( ११.०३.२०१६)