शनिवार, 7 सितंबर 2013

ग़ज़ल-३

ग़ज़ल


ये जुनू है वहशत है या है दीवानगी
कि हर शख्स में तू है नज़र आती

प्यार से हर बुत को मैं चूमता फिरता
कि हर बुत तेरी अक्से-रु है नज़र आती

राहे इश्क पर कदम मेरे डगमगाते कुछ यूँ
कि कभी पास कभी दूर तू है नज़र आती

तीर-ए-नज़र अब तो रोक लो 'साकी'
दिल की हालत अब विस्मिल है नज़र आती

नाजो अदा तेरी देख लगता कुछ यूँ
हर फन में तू उस्ताद है नज़र आती

                 उमेश कुमार श्रीवास्तव
                 दिनांक:२४.११.१९८९


ग़ज़ल- २

ग़ज़ल

शब्दो के हिन्दी अर्थ

यार र्‍ प्रेमी
कूंचे र्‍ गली
सबा र्‍ शीतल हवा
नामावर = पत्र वाहक
जख्में निहाँ = छिपी चोटें
बयां र्‍  विवरण बता देना
अश्क र्‍ आंसू
विस्मिल- घायल
आरजू र्‍ इच्छा, कामना
फना- गायब, अदृष्य
सब्र - धैर्य
तेगे जुनू= उन्माद की तलवार
आसियां- आवास
कफस- पिंजरा , गजल में शरीर रूपी पिंजरा
मगरूर - अभिमानी
फुर्कत र्‍ जुदायी , वियोग
नशेमन - घोसला , आवास


गुज़रेगी जब यार के कूंचे से तू सबा
नामावर बन जख्में-निहा उनसे कर देना बयाँ

कह देना उनसे कि अश्क भी अब सूखते
विस्मिल दिल से आरजूए हो चुकी कब की फ़ना

याद तो करता बहोत पर सब्र ही जाता रहा
कब तलक तेगे जुनू से मैं बचाता आसियाँ

इस कफस में आज तो ज़ान भी मचलने  लगी
छोटे पड़ने लगे अब ये ज़मीं ये आसमाँ

उस दिले मगरूर से आख़िर में कहना तू जा
मिट रहा फुर्कत में नशेमन का हर निशाँ

                 उमेश कुमार श्रीवास्तव
                 दिनांक: २५.११.१९८९





शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

दर्दे-दिल --३



१   नयनो की मय अब ज़रा होठो पे लाइए
    अधरो से छू, हम भी ज़रा जन्नत तो देख लें


२   हम मजबूर हैं कितने की आ भी नही पाते
    यह जान कर भी कि तुम, होगी मुंतज़र में

३   तुमने कहा था इक दिन , मैं हूँ वहाँ जहाँ तुम
    तब से हर महफ़िल में , तुम हो नज़र आती

४   मैं करता हूँ याद तुम्हे तुम भी तो करती होगी
    मैं मुस्काता हूँ बस यूँ, कि तुम मुस्काती होगी

५   रिस रहा है चश्मे से दरिया-ए-लहू
    अश्क तेरी याद में कब के फ़ना हो गये

६   गुफ्तगू करता रहा मुद्दतो से मैं तेरी
    दरमियाँ राजे-नियाज़ भूला ज़ुबाँ चलाना

७   दिल मुझसे जुदा था जिंदगी हुई जुदा
    अश्क भी अब कर चले मुझको अलविदा

८   तब्बस्सुम थी कल तक मेरी मिल्कियत
    तब्बस्सुम ही मेरी अदू बन गई है
    अश्को से कल तक मेरी थी आदावट
    उन्ही से अब तो गुफ्तगू हो चली है

९   चंद लम्हो के सफ़र में गुज़री है इक जिंदगी
    अब तो रोशन करेगी यादो की उनकी रोशनी

१०  लबों से उनकी मय है छलकती
    ज़ुल्फो से खुशबू के रेले हैं उठते
    बहकते कदम हैं बिन पिए ही साकी
    कूंचे से उनकी जब हम गुज़रते


                   उमेश कुमार श्रीवास्तव



दर्दे-दिल--२

१   चंचल शोख़ निगाहों से ना तीर चलाओ ऐ जालिम
    दिल के टुकड़ों पर पग रख यूँ ना मुस्काओ ऐ जालिम

२   तकदीर में लिखा है कब तक, यूँ देखना मजबूरियाँ
     इक दिन तो आएगा , जब पास होंगी दूरियाँ

३   हर ठोकरों के साथ मजबूत कर अपने इरादे
     ये बता दे आज तू , गिर कर सम्हलाना कहते किसे

४   अब ज़रा रहने भी दो इन जर्द पत्तों को ही तुम
     शोख कलियों से तुम्हारा दामन क्या भरा नहीं

५   बरहम-ए-जुल्फ जर्द-ए-हुस्न,कयामत की कोई निशानी है ये
     मोहब्बत खुदा ने बनाई ही क्यूँ, क्या कोई कहेगा जवानी है ये

६   बा-वफ़ा न रहा अब नज़र मे तेरी
     वादा किया था आने का, कर के भुला दिया

७   जालिम हुआ जमाना दुश्मन हुई खुदाई
    तुम भी गर रूठी रही, तो समझो की मौत आई

८   दोजख मे जाए ये मेरी मसरूफ़ जिंदगी
    मुझको तो मेरे यार का बुलावा मिल गया

९   आज मुझे ये होश कहाँ कि ह्स लूँ रो लूँ या गा लूँ
     तनिक ठहर इधर तो देखो बरसों की मैं प्यास बुझा लूँ

१०   शुष्क इन लबों को ताज़गी दे दो
      अपने लबों से छू कर इन्हे जिंदगी दे दो

                         उमेश कुमार श्रीवास्तव

दर्दे-दिल

१ ढूँढने से मिलते नहीं साकी रफ़ीक
  मुक्कद्दर में हों तो खुद ही ढूढ़ लेते हैं

 २ तितलियाँ फिरने लगी सड़को पे जब से
   लगता की गुलशन बन गया है शहर सारा

३ चश्में से लुढ़कते ये अश्को के दो कतरे
   दिल की बात बे ज़ुबाँ कह देते करीने से

४ बद-इन्सानियत की राह भी कितनी है सुकून बख्स
   चलते हैं आँख मूंद लोग लगती नहीं ठोकर

५  इस बुतनशी की सरकशी तो देखिए जनाब
    सरेमहफ़िल किस कदर अंगड़ाइयां ले रही है

६  लब पे छाले आए , आए फिर फूट गये
    मेरे नाले उस तलक आज भी पहुँचे नहीं
 
७  इस इश्क की मीना में गम की मय तो डाल
    देखें ज़रा साकी कहते किसे बहकना

८  मेरे कदम दर कदम इक और भी कदम है
    पर मालूम कर सका ना किसके ये कदम हैं

९   हर आश मेरी प्यास-ए-दरस लिए है
     पर उनकी शख्सियत तो,है भूल जाने की

१०   आता नहीं इश्क का आलिफ भी इन्हे साकी
     ये हुस्न-ए-हाला हैं ज़रा दूर ही रहना

११   इस हुस्न की महफ़िल में हम आज हैं आए
     देखें ज़रा हुस्न-ए-मदिरा किसे कहते

१२   खो दिया है दिल मैने जानम तेरी राहों में
      चाहे तो ठुकरा देना चाहे गले लगा लेना

१३   इस कदर बेचैन ना हो ऐ मेरे मासूम दिल
      बिजलियाँ गिर गिर के खुद फ़ना हो जाएँगी
                                   

                                उमेश कुमार श्रीवास्तव

गुरुवार, 5 सितंबर 2013

आत्म मंथन

आत्म मंथन


तरंगे उठती हैं
ज्वार-भाटों सी कुछ-कुछ
कभी स्थिर नही रहने देती
जो जिन्दगी को

कभी अनुभव करता हूँ
स्वयं को
उच्चतम शिखर पर
जहाँ सभी कुछ
मनोहारी प्रतीत होता है
चक्षु शीतलता की अनुभूतियाँ करते हैं
कानो में निश्च्छल स्वर लहरी बज उठती है
औ सांसो में चंदन महक उठता है
मन तृप्त सा हो जाता है .

जग की मोहमाया से लिप्त
यह भौतिक जीवन
वास्तव में नश्वरता की
अनुभूति से भर देता है
मस्तिष्क को
लगता है मेरी मोक्ष की तलास
पूरी हो चुकी है

सभी मे मैं स्वयं को अनुभव करने लगता हूँ
औ समस्त जड़ चेतन
मुझी में समाहित से दिखाई देते हैं
यह सामंजस्य
स्वयं का स्वयं से ही
कितना अद्भुत होता है
क्यूँ की वहाँ 'मैं' कहाँ होता है
केवल औ केवल
एक पिंड होता है
जिससे अलग जड़ चेतन
किसी का कोई
अस्तित्व ही नहीं लगता
और मैं विलीन होने लगता हूँ
उस अनन्त अभेद्य
अक्षर, ब्रम्‍ह में

पर क्षण भर में ही
प्रकृति की शाश्वातता
चुभने सी लगती है
आत्मा फिर उसी आवरण से
ढकने सी लगती है

अब मैं भाटे पर होता हूँ
प्रकृति के नियम की छाया में
इस भौतिकता के अन्तह्तल में कहीं
खो जाता हूँ मैं
एक ऐसे तल में
जो अतल सा प्रतीत होता है
क्यूँ कि वहाँ टिक कहाँ पाता हूँ
निरन्तर
नीचे और नीचे
फिसलता पाता हूँ स्वयं को
फिर कैसे कहूँ
किसी तल की अनुभूति
होती है मुझे

कभी परिवार , कभी समाज ,
कभी देश कभी राष्ट्र
कभी संस्कृति औ सभ्यता जैसे
अनेक स्तर
तल की अनुभूतियाँ देते हैं
वास्तविकता से दूर
कभी धन कभी यौवन
कभी तन कभी मन
औ कभी जीवन की लालसाएँ
दुर्भिक्ष की भूख सी
घेर लेती हैं मुझे
इनका ही सहारा ले
उबरना चाहता हूँ,दो पल
पर डूबता ही जाता हूँ निरंतर
अतल के तल को
निश्चित करने

स्वयं को स्थिरता देने की चाह में
शायद खो देता हूँ
स्वयं को ही मैं
और खो जाता हूँ इन्ही के मध्य
भूल निर्लिप्तता की राह

सदा सर्वदा रहता आया
रथी मेरा
इन्ही दो अवस्थाओ के मध्य
नहीं पा सका समतल
अश्वो को लयबद्ध करता
झुझला पड़ता है सारथी
कभी कभी, औ
छोड़ देता है लगाम हाथो से
कुढता हुआ सा रथी पर
और उच्छसृंखल हो
दौड़ पड़ते हैं अश्व
अलग अलग दिशाओं में खींचते
रथ को
प्रेरित करती लगाम
बिलबिला उठता है रथी
नित निरंतर ठोकरे खा - खा उछलता
इस असमतल भूमि पर
यही होती पराकाष्ठा अनुभूति की
भौतिक जगत की मेरी

                        उमेश कुमार श्रीवास्तव

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मेरे अपने आदर्श

जिस व्यक्ति नें अंतःकरण की आवाज़ सुन स्वयं अवरोध का वरण किया है,वह स्वमेव निर्मल हो जाता है ,किसी पर बाह्य अवरोध लगा सुधारने का प्रयास क्षणिक सफलता तो पा सकता है शुद्ध व स्थाई निर्मलता नहीं......उमेश



जब हम क्रोधावस्था में होते है तो लोगो से हमारे दिल की दूरियाँ बहोत बढ़ जाती हैं यही कारण है कि क्रोधित व्यक्ति ज़ोर ज़ोर से बोलता है. किंतु जब हम शांत अवस्था में होते हैं तब दिल लोगो से सामान्य दूरी पर रहता है अतः उसे दूसरे दिल तक अपने विचार संप्रेषण हेतु ज़ोर से बोलने की आवश्यकता नही पड़ती वह सामान्य आवाज़ में ही दूसरे दिल तक अपनी संवेदनाओं का संप्रेषण कर सकता है.इन सब से विपरीतजब दिलो में प्रेम भरा हो तो दिलो की नज़दीकियाँ इतना अधिक होती है की उन्हे शब्द स्वरो की भी आवश्यकतानहीं रह जाती वे अपनी बातें कुछ बोले बिना भी एक दूसरे तक पहुचाने में सफल रहते है. प्रेम मे शरीर का हर अंग संवाद संप्रेषण का कार्य करता है......उमेश



सभी अपने अपने कर्मों के फल भोग रहे हैं इस भोग लोक में, परमात्मा कर्म बंधन में गूँथ कर जीव को इस लोक मेंसृष्टि के आरम्भ मे. छोड़ दिए है जीव जैसे कर्म करेगा वैसा फल उसे मिलेगा जिसे इस जीवन में उसे भोगना है अच्छे कर्म का अच्छा फल बुरे कर्म का बुरा फल . यदि कुछ कर्मों के, चाहे वो अच्छे हो या बुरे फल भोगने से इस जीवन में रह जाते हैं तो उन्हे भोगने हेतु पुनः जन्म कर्मों के फल के अनुरूप जीव को लेना पड़ता है, इसमे परमात्मा का किसी प्रकार का कोई अवरोध या अनुकम्पा नही होती ईश्वर आराधना पूजा पाठ या जितनी भी विधियाँ विभिन्न धर्मो में ईस्वारी कृपा पाने की प्रचलित हैं उनके मध्यम से हमें केवल सच्चा मार्ग, जीवन जीने का व सत कर्म करने की ईश्वरीय प्रेरणा के माध्यम से प्राप्त होती है किसी प्रकार की भौतिक वस्तु धन दौलत ऐस्वर्य इनके मध्यम से ना कभी मिला है ना कभी मिलेगा कर्म बंधन को ईश्वर भी सृष्टि आरंभ के उपरांत से ना तो तोड़ सका है ना ही तोड़ेगा अन्यथा वह सृष्टि के सम्मस्त प्राणिओ का सम दृष्टि रखने वाला पिता कैसे कहलाएगा वह धृतराष्ट्र न बन जाएगा.......उमेश


यदि पहली ही मुलाकात में कोई आप को आवश्यकता से अधिक महत्व दे तो , या तो इसमें उसका कोई निहित स्वार्थ है , अथवा वह आपको मूर्ख बनाने का प्रयत्न कर रहा है .........उमेश


मेरे जेहन में जीवन संगनी की जो तस्वीर है वह औरत की वफ़ा और त्याग की मूर्ति है, जो अपनी बेजबानी से, अपनी कुर्बानी से, अपने को बिल्कुल मिटा कर पति के आत्मा का एक अंश बन जाती है, देह पुरुष की रहती है पर आत्मा स्त्री की होती है, आप कहेंगे मर्द अपने को क्यो नही मिटाता ?औरत से ही क्यों इसकी आशा करता है ? मर्द में वह सामर्थ ही नही है, वह अपने को मिटाएगा तो शून्य हो जाएगा, वह किसी खोह में जा बैठेगा और अह्न्कार मे यह समझ कर कि वह ज्ञान का पुतला है सीधे ईश्वर में लीन होने की कल्पना करेगा, स्त्री पृथ्वी की तरह धैर्यवान है शांति - संपन्न है सहिष्णु है , पुरुष में नारी के गुण आ जाते है तो वह महात्मा बन जाता है , नारी में पुरुष के गुण आ जाते हैं तो वह कुलटा हो जाती है , पुरुष उसी स्त्री की ओर आकर्षित होता है जो सर्वान्स में स्त्री हो , संसार में जो कुछ सुंदर है उसी की प्रतिमा को मैं स्त्री कहता हूँ , मैं उससे यह आशा रखता हूँ कि उसे मार ही डालूं तो प्रतिहिंशा का भाव उसमें न आवे , अगर मैं उसकी आँखो के सामने किसी स्त्री को प्यार करूँ तो भी उसकी ईर्ष्या न जागे, ऐसी नारी पा कर मैं उसके चरणों में गिर पड़ूँगा और उस पर अपने को अर्पन कर दूँगा....प्रेमचंद...गोदान.....
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