मेरी कविता हो तुम
वह कविता जो गुनी नही जाती
अन्तस से आती
अन्तस तक जाती
जो सुनी नही जाती
नयनों से पढ़
चिन्तन में खो
जिसके रस की अनुभूति
उर में धारित कर
जीवन सार बना
तरल सरल निर्मल जल सम
सरि बन
बस ! बहती जाती
बहती जाती ।
नारी !
मेरी कविता हो तुम
जीवन चिन्तन
घुर्णन करता
चतुर्दिक जिसके
बाल्य, युवा या प्रौढ़
अब वृद्धा
सभी अवस्थाओं में
मधुर मृदुल अवलम्बन
तेरा ही
जीवन धारा के दो तट सा
सभी दृष्य प्रकृति के
मनोरम तब तक
जब तक तेरी धारा
अन्तस में ।
नारी !
मेरी कविता हो तुम
मेरा आकर्षण
वृथा नही
ज्यूं कविता में
समाहित रहे सदा
हर रस
यूं ही तुम हो जीवन में
रस घोल रही
नहीं तो
शुष्क रेणु सा है
यह जीव धरा पर
जिसमें मैं भी ।
उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोक भवन
दिनांक : ०६.१०.२०२६
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