यह नाद यदि प्राण का है
मुक्ति का कारक बनेगा
यदि बुद्धि से निकले ये नाद
बद्ध कर देता जगत से
प्रेम रस है
गूंथता सब को सभी से
ब्रम्हाण्ड के कारक सभी
जुड़ते इसी से
खींचता सब को, फिर
सींचता, सानता है
पंचभूतों का असांजक यही जो
कण बन ब्रम्हाण्ड से
जुड़ना जो चाहो
चाहता, प्राण से तुम भी पुकारो
बुद्धि को सुप्त कर हिय में उतारो
गुंजन करो तुम भी, मैं प्यार हूं
सप्त सुर में नाद कर दो
करता मैं भी प्यार हूँ ।
उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोकभवन , भोपाल
दिनांक : २६.१०.२६
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