बुधवार, 14 अक्टूबर 2026

१४ . १०. २६

भाव जगत के सम्प्रेषण को 
शब्द कहां गढ़ सकते है
भाषा की अपनी बन्दिश हैं
जो चुप्पी है कह सकते हैं
 
जब अन्तस में कुछ पकता है 
वो आंखों में आ झलकता है
शब्द उसे क्या तोल सकेगा ?
न भाषा बोली में बोल सकेगा !

बोली ने अब तक बस तोड़ा है
भाव जगत ने बस जोड़ा है

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