शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

गुणवत्ता

                   गुणवत्ता
 वर्तमान काल खण्ड में हम, प्रत्येक वस्तु में, गुणवत्ता का अवलोकन कर ही यह निर्धारित करते हैं कि उसे हमें लेना है अथवा नही । गुणवत्ता का मानक हर दृष्टि से स्तरीय पाये जाने के आधार पर ही उसका मूल्यांकन होता है ।

किन्तु मानव स्वयं का गुणवत्ता सूचकांक विस्मृत कर चुका है । वह स्वयं ही स्वयं का मूल्यांकन कर उसी आधार पर अपना गुणधर्म, प्राकृतिक , मानवीय, सामाजिक, पारिवारिक व व्यक्तिगत नियत कर लेता है । यह  एक दृष्टि से उचित भी है क्योंकि गुणवत्ता का प्रमाण स्व से आये तो वह मानसिक आनन्द , सन्तोष तथा स्वयं के  अस्तित्व पर गर्व की अनुभूति कराता है । किन्तु ऐसा करते समय यदि वह अपने कार्य व्यवहारों के प्रति, सचेत , निष्पक्ष व विवेकशील निर्णायक की भूमिका का निर्वाह कर सके । जो कि हर मानव में अंतर्निहित अहंकार तत्व के विद्यमान रहते लगभग असंभव है । क्योंकि अहं स्व को कभी गलत ठहराने नही देगा और स्वयं के गुण को सदैव उचित का  ही विश्लेषण देगा ।

वहीं यदि गुणवत्ता का प्रमाण दूसरे के माध्यम से अपेक्षित किया जाये तो वह अहंकार, प्रतिस्पर्धा व वैमनस्य को जन्म देता है । क्योंकि यहां दूसरे का भी स्वयं का अहंकार होगा जिसके अहंकार से चाहने वाले का अहंकार टकरायेगा ।

अतः  एक विवेकशील, निरपेक्ष, निष्पक्ष
निर्णायक के कठोर व्रत का पालन सुनिश्चित कर स्वयं में झांके कि
 क्या आप प्रकृति के साथ, मानवता के साथ , समाज के साथ, परिवार व रिस्तों के साथ, व स्वयं के साथ, स्थापित गुणधर्म का पालन करते हुए, एक गुणवत्ता पूर्ण जीवन जी रहे हैं ? यदि निर्णायक के रूप में सकारात्मक उत्तर आये तो आप वास्तव में सार्थक जीवन जी रहे हैं अन्यथा आप का जीवन प्रकृति, मानवता, समाज, परिवार व रिस्तों हेतु ही नही वरन स्वयं हेतु भी अभिशाप है । भले ही आप कितनी ही सम्पत्ति संसाधनों के धारक क्यो न हो या उच्च से उच्च पदधारी या विद्वान ही क्यों न हो ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोक भवन , भोपाल
दिनांक : १६. १०. २६

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