गुरुवार, 3 अक्टूबर 2019

दरस की आश

 दरस की आश

नेह जगा
हृदय गुहा में ,
कौन भला, चुप बैठा है ,
दुःख के सागर
आनन्दमयी सरि ,
इन द्धय तीरों पर
रहता है ၊
आश जगे
या , प्यास जगे ,
श्वांसे बेतरतीब
बहकती हैं,
जिसके आने या जाने से
ये मंद, तीव्र हो
चलती हैं ၊
वाचाल रहे
या, मितभाषी,
आन्दोलित जो कर जाता है ၊
मौन सन्देश से
उर प्रदेश को,
जो,मादक राग सुनाता है ၊
मैं सोचूं या ना सोचूं
पर सोच जहां से चलती है ၊
उस सुरभित
शीतल गलियारें में ,
है प्यास ये जिसकी
पलती है ?
ये पंच भूत की
देह है मेरी ,
औ पंचेन्द्री का ज्ञान कोष्ट ,
पर ,प्रीति,अप्रीति,विषाद त्रयी, सम .
जो घनीभूत  हो बैठा है ၊
हूं वाचाल
पर, मौन धरे हूं
आहट उसकी लेता हूं ,
बाह्य जगत से तोड़ के नाता ,
अन्तस को अब सेता हूं ၊
आश यही ले
निरख रहा हूं
शायद उससे मिल जाऊं
वह ही मुझको ढूढ़ ले शायद
जिसे खोज, न, शायद पाऊं ၊
उमेश श्रीवास्तव दि० ०३.१०.१९  : १०.४५ रात्रि

मंगलवार, 17 सितंबर 2019

गमन - आगमन

 गमन - आगमन

जन्म से मृत्यु,
यात्रा ,
प्रत्यक्ष का साक्षात्कार ,
जन्म से पूर्व
मृत्यु के पश्चात
अज्ञात का अंधकार ,
पर्ण पात, है ज्ञात
आगमन व गमन ,
जिस धरा से प्रस्फुटित हो प्रत्यक्ष,
उस धरा का चुम्बन ,
शिखर से उतर ,
हो विलीन उस धृ-लोक में ,
जिसका था कभी अंश ၊
पल्लव से पर्ण
पर्ण से रजकण
रज से रस
रस से रससार बन
पुन: पल्लवित  ,
क्रिया निरन्तर
अनवरत ၊
ग्रीष्म, सर्द
झंझावत बरखा ,
अवरोध कहां ၊
सुख-दुःख ?
प्रश्न कहां ?
नियमबद्ध , कर्मचक्र ၊
गमन ,आगमन
जन्म , जरा , मृत्यु
समदर्शी ,
परमात्म जगत का
कहां, कभी
रहा दखल ၊
उमेश , १७.९.१९ सिंगरौली

सोमवार, 16 सितंबर 2019

रूबाई

रूबाई


गम-ए-दिल को गमजदा गमख्वार चाहिए ,
गमगीनियों की गली में ग़जरा-ए-गुलनार चाहिए ,
तकदीर कोई सै नही राहे गमगीनियां ,
सबा के झोंके सी, बस इक नई बयार चाहिए ၊
........................ उमेश , १७.९.१९

बुधवार, 4 सितंबर 2019

अबूझ आकांक्षा

अबूझ आकांक्षा

उत्कंठा
मुक्ति के ,
अनुभूति की
भटकाती सदा ၊
यह प्रकृति है,
मायावी ၊
रची ब्रम्ह की ၊
आलिप्त करती सदा,
हर कण के
कणों को भी ၊
निर्लिप्त केवल
ब्रम्ह ၊
मुक्ति
स्वातन्त्र है ,
गेह से ၊
इन्द्रियों से ,
पंचवायु से ,
मन ,बुद्धि, दंभ से
आधीन जिनके
उत्कंठा पालता ,
प्राणी ၊
अनुभूति
अन्तस का
नाद है ,
निःस्वर
भेदता है
हर क्षेत्र , क्षेत्रज्ञ को
कर सके प्रवेश
विरला इस
गुह्य क्षेत्र में
जो रचता ब्रम्ह है ၊
मुक्ति स्वरूप ,
ब्रम्ह बनने की चाह,
युगों से,
देती रही धरा पर,
अबूझ प्राणियों के,
झुण्ड के झुण्ड ၊
कुछ देवत्व पा
इठलाने लगे
कुछ विदेह बन
इतराने लगे
कुछ दानवों के रूप में
निर्मोहिता का
नग्न नृत्य
धृ पर चतुर्दिक
दिखाने लगे ၊
पर हो सके ना
निर्लिप्त ၊
मुक्ति का प्रथम पग,
डूबे आकण्ठ
मायावी सरोवर
नीर में ၊
निर्लिप्तता
यूं कि ज्यूं
पुण्डरीक ၊
कीचक और
जीवन सार जल से भी ,
मुक्तता का
कराता आभास
उसमें ही आकंठ डूब ၊
रहा सदा
अति दुरूह
पग उठाना
प्रथम ၊
आकांक्षाएं, अभिलाषाएं
चाहे जितनी पाल लो
दलहीज से
बाहर निकलने को ,
यदि कोई उद्धत न हो,
क्या करेंगी
उत्कट ईप्सा
यदि पगों को
मंजिलों की
चाह न हो ၊
मायावी ऐश्वर्य
जाल ,
फंसा रखता सदा
गेह, मन ,बुद्धि को ၊
आत्म तत्व से विलग
सुख सागरी जल में
तिरते हम,
बस सोच कर मुक्ति के
आनन्द को,
पालते, लालसा का
का भ्रूण हैं ၊
और भौतिक सुखों की चाह में
करते निरन्तर,
भ्रूण वध ၊
मुक्त कर स्वयं को
स्वच्छन्द बन ၊
उमेश , इन्दौर, दिनांक ४ - ५ . ०९. १९



मंगलवार, 3 सितंबर 2019

क्षणिका

 क्षणिका

रिश्ते कोमल कलियां हैं ,सींच इन्हे न तोड़ इन्हे ।
महक बचा ले जीवन की,सर्वस्व लुटा कर जोड़ इन्हे ।
...उमेश ०३.०९.१६ जबलपुर

गुरुवार, 22 अगस्त 2019

जीवन आनन्द

जीवन आनन्द


थकते नहीं
रेत पर ये कदम ,
राहें बनाते , ये
मेरे कदम ၊
मिटाती चली
रेत की आंधियां
राह, उनको
जिन पर
सदियां चलीं ၊
है उन्हे ये पता
उन पर चलना नहीं
यायावरी मेरी
सब उन्हे है पता ၊
हूं फिसलता नहीं,
रेत की राह पर
छोड़ते भी नहीं
पग अपने निशां
मै भटकता चलूं
या , राह सीधी चलूं
न मुझे है खबर
न मंजिलों को पता ၊
तप्त रेत है,
अर्क के अर्क सी,
और लगती कभी
बर्फ से भी है शीतल,
वो जानती ,
पग किसके हैं ये
मखमली बन तभी
दुलारे उसे ၊
है पसरा हुआ,
मरु चारों दिशा,
पर अन्तस मेरा,
नखलिस्तान है
हर दिशा में चहकते
खगवृन्द संग हैं
महकते हुए से
उद्यान हैं ၊
चला जा रहा
बस चला जा रहा
समय की नदी संग
बहता हुआ ,
संग आये व जाये
लहरों सा को
ना चाहत है कोई
न उसकी रज़ा ၊
उमेश , इन्दौर , २२.०८.१९

शनिवार, 17 अगस्त 2019

अहसास-ए-दिल

अहसास-ए-दिल


हर क्षण जैसे कोई मेरे
टीस जगाता है, दिल में ,
स्पर्शों की आश लगा ,
कोई बलखाता, है दिल में ၊
दृष्टिपटल से ओझल कोई
ह्रदयपटल पर छाया है ,
हर सांसो में आते जाते
खुद को महकाता, है दिल में၊
उससे बिछुड़ा हूं मैं , या
खुद से, बिछड़ गया हूं मैं ,
यक्ष प्रश्न यह, पीड़ादायक
नित टकराता है दिल में ၊
हर कर्मों में, जीवन के
संग जिसे, महसूस करूं,
उसकी दरकन औ टूटन
दर्द बढ़ाती , है दिल में ၊
हर पल हर क्षण संग जिए जो
जीवन की इक थाती हैं ,
अहसासों का नया बवंडर
उठा जो जाते हैं दिल में ၊
उमेश , १७.०८.१९ , रात्रि ८.४५ , इन्दौर