सोमवार, 29 अगस्त 2016

गजल : आपको आप से ही ,चुरा क्यूं न लूं

गजल

आपको आप से ही ,चुरा क्यूं लूंआपकी जो रज़ा हो, गुनगुना क्यूं लू।
आपकी शोखियां मदहोश कर गईसोचता हूं बे-वजह मुस्कुरा क्यूं लूं।
हूं जानता आप मेरे नहींइस दिल में आपके बसेरे नहीं
मानते पर कहां दिल के जज्बात हैंइक घरौंदा तिरा मैं बना क्यूं लूं।
आप यूं चल दिये ज्यूं देखा नहींरूप की धूप को चांदनी से उढ़ा
चांदनी से जला,खाक बन जायेगाखाक--बदन फिर उड़ा क्यूं लूं।
कदमों में लिपट चैन पा जाऊंगागेसुओं में भी थोड़ा समा जाऊंगा
सबा से जो मदद,थोड़ी मिल जायेगीबदन से लिपट झिलमिला क्यूं लूं।
आपको आप से ही चुरा क्यूं लूंआपकी जो रज़ा हो गुनगुना क्यूं लूं।
उमेश २८.०८.२०१६ जबलपुर

मंगलवार, 23 अगस्त 2016

गीत : बहुत तड़पाते हो,

गीत

बहुत तड़पाते हो, जब याद तुम आते हो
ये तो अच्छा है कि हम भूलते ही नही
वर्ना सांसो को भी, तुम तो चुरा ले जाते हो
बहुत तड़पाते हो, जब याद तुम आते हो

शर्द रातों में भी ये बदन जलता है
दिल के नशेमन से भी धुआँ निकलता है
तुम तो इतराते हो,होश उड़ाते हो
अश्क बन आँखो से छोड़ जाते हो
बहुत तड़पाते हो, जब याद तुम आते हो

कुछ नज़र आता नहीं अब जमाने में
जब से आँखो में तुम्हे बसाए हैं
बिस्तर की सलवटें बयाँ करती हैं
नीदों में किस तरह सताते हो
बहुत तड़पाते हो, जब याद तुम आते हो

अब तो ज़िदा हूँ ये ही काफ़ी है
लाश बन इंतजार करता तो हूँ
तेरी मगरूरियत पे भी फिदा हूँ मैं तो
इश्क का इम्तहान जो कराते हो
बहुत तड़पाते हो, जब याद तुम आते हो

उमेश कुमार श्रीवास्तव , जबलपूर २३.०८.२०१६

रविवार, 21 अगस्त 2016

ग़ज़ल ; तेरी आँखो से मुझे

ग़ज़ल

तेरी आँखो से मुझे झील का अहसास क्यूँ है
तेरे आने से मेरी जिंदगी में मधुमास क्यूँ है

आग लग जाती है सीने में जब तकता हूँ तुझे
पर इस जलन में सुकून का अहसास क्यूँ है

अब तलक तल्ख़ सहरा पे पड़ते थे कदम
संग तेरे हर राह में जन्नत का अहसास क्यूँ है

तू जो जीती रही जिंदगी औरो के लिए
ओ कोई और नहीं मैं हूँ ये अहसास क्यूँ है

अब तलक जान सका ना तेरी फितरत ऐ सनम
फिर भी कूंचे में तेरी खुशियों का अहसास क्यूँ है

आज कह दो न छिपाओ राज अहले दिल के
मेरी सासों में तेरी सासों का अहसास क्यूँ है

उमेश कुमार श्रीवास्तव ०३.०२.२०१४

शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

ग़ज़ल ज़ुल्फो को न सुलझाओ यूँ हाथों से


ग़ज़ल

ज़ुल्फो को न सुलझाओ यूँ हाथों से
बेबस दिल को उनमें उलझाया न करो

पलकों को यूँ न गिराओ अदाओं से
पेवस्त खंजर दिल में यूँ कराया न करो

तुम चाहो न चाहो कोई बात नही
मैं जो चाहूं तो इल्ज़ाम यूँ लगाया न करो

शमा बन चाहे करो रौशन महफ़िल
पर अंधेरो सा मुझे  यूँ दूर भगाया न करो

भले बैठो  हर साख पर तितली बन कर
खार कह मुझको यूँ पराया न करो

हम तो जीते ही हैं तेरे दम पर हमदम
दम जब मेरी तुम, रूठ यूँ जाया न करो

....उमेश कुमार श्रीवास्तव, जबलपुर ०७.०८.२०१६




शनिवार, 23 जुलाई 2016

ग़ज़ल

ग़ज़ल

खुद समझ पाया नही मैं अपने मिज़ाज को
लोग कहते हैं मुझे, यूँ खुल जाया न करो

दिल है बच्चा जो मेरा, तो क्या ग़लत हुजूर
मेरे दिल पर उम्र का, स्याह साया न करो

काश तुम भी भूल कर, आ जाते इस गली
फिर ये कहते. यूँ उम्र को, तुम जाया न करो !

हम तो चलते उस राह पर, जो नेमत मे है मिली
तन्हाइयों की राह हमें, तुम बतलाया न करो

अलमस्त हूँ अल्हड़ हूँ मैं, परवाह नहीं इसकी मुझे
तुम सबक संजीदगी का, यूँ सिखाया न करो

मैं निरा बच्चा रहूं बच्चा जियूं बच्चा मरूं
तुम मेरे मिज़ाज को औरों से मिलाया न करो

खुली किताबे हर्फ हूँ जो चाहे पढ़ ले जब कभी
इंसानी फितरत से मेरा ताल्लुक कराया न करो

खुद समझ पाया नही मैं अपने मिज़ाज को
लोग कहते हैं मुझे, यूँ खुल जाया न करो

उमेश कुमार श्रीवास्तव , जबलपुर, दिनांक २३.०७.२०१६

शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

बिरहन


बिरहन


घटा घनघोर घिरी चहु दिश
लरजत नार सलोनी
पनघट पर पिय बाट तकत गोरी
नयनन कै डार बिछौनी

चंचल चित लै ,मेघ मीत से
करत रार बरजौनी
पी की पाती लाए काहे नही
रहि बाट जोहति चौमहनी

पथराय गई नयनो की पुतरी
अधरादल पड़े सुखौनी
हिय मध्य दहत अगन जो
उरोज बने धौकोनी

तुम बरसो ना बरसो बदरा
मधुमास गयो तरसौनी
हर्षित फसल दूर की कौड़ी
ये खेत पड़े परतौनी

भीग गई चुनरी चोली
अंसुअन कै चुऐ ओरौनी
हुलसित हिय पेंग लगे तन पे
सब राग चले उतरौनी


मुझ बिरहन कै राग जरे सब
आग लागि बिछौनी
अखियन में नीद समाय सकी
उत, पी छवि लाय बसौनी


ना रोर करो मत शोर करो
मीत बनाय पछतौनी
अंधियारी घनेरि का तुम करो
पिउ की उजियारि बचौनी


हे मेघ मेरे साजन के सखा
इत आय मोहे लिपटा लो
सोख घनेरी व्यथा सब मोरी
उत लिपट तुम्ही समझा दो

उमेश कुमार श्रीवास्तव, जबलपुर,१५.०७.२०१६

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

भीगे अहसास

भीगे अहसास

अम्ल सदृश्य गिरती बूंदे
बेकल घन से
घनघोर वेदना उठती
बेकल मन से

उत झनक रही पायल
झनन झनन झन से
इत धड़क रहा दिल
धिनक धिनक धन से

मैं मूढ़, ताकता
मेघों को,
सरसराती पवन मध्य
ठिठुरता
बचाता स्वयं को
गुदगुदाती फुहारों से

कुहासों से फुहारों की
डरा, बेचैन मैं
भोथरी असमतल धरा पर
घटाओं के अंधेरो में घिरा
डगर पर सहमा हुआ सा
बढ़ रहा था

वो नार चीकनी कमसिन
तर तर केश बसन से
रति रूप धरे,
 उन्मादित सी,
चर अचर जग
कण कण से
भी थी डगर पर

उसकी चितवन
टकराई हौले से
सिहरन भर गई
शिख से नख तक
उद्दीप्त हुआ
उद्दीपक नयनो की किरणें
ज्वाला सी लपकी रुधिर में
चितवन में नव ज्योति भर गई

वही धरा,घन, विटप, लताये
वही तड़ित नाद,
नभ जल मालाएँ
ताल वही विप्लव करते
नद नालों में उमड़ी
जल धाराएँ
पवन वही मृदु
ठिठुरन वाली
 झूम रही संग,
जल की हर डाली

सरगमी हो गई
सब की काया
बरसता संगीत
कण कण से
इक चितवन की यह
अदभुत माया

नर नारी का ये आकर्षन
अद्वितीय है
 शिव शक्ति सा शाश्वत
अलौकिक
अमार्जनीय है

न मेटो सम धरा के
दो प्राणियों के
मृदु तंतुओं को
बना अचिंतित विधि
सजाया है जिन्होने मिल
इस वसुंधरा को

उमेश कुमार श्रीवास्तव जबलपुर ०७.०७.१६