सोमवार, 16 जनवरी 2023

अपेक्षाओं का समर

प्रात की सांन्ध्य में
अरुण की प्रथम आभा
प्रदीप्त सी करती मुझे
जग उठती हैं
सब की अपेक्षाएं
आकांक्षाएं 
मुझमें
और मैं 
हो उठता हूं चैतन्य, 
आपूर्ति को
सभी की ईप्साएं
खपानें को 
अपनी समस्त ऊर्जा
जिससे उस्मित कर सकूं
प्राण उनके
जिन्होंने  अर्पित की हैं
अपनी ईप्सा
मुझे, इक आश संग ..
मैं सजग जी उठता हूं
उनका जीवन
अपने जीवन की तरह
कर प्रण 
प्राण कर समर्पित ।

 चाहते सब
हर संवेदना कर दूं समर्पित
भावनाओं का हर पोर
चिन्तन के हर तंतुओं को
जोड़ उनसे
उनके दुःखों को हरता रहूं
अपने सुखों से जब जोड़ना चाहें कभी
तब ही जुड़ूं
अन्यथा, ढूढ़ लूं
अपने सुखों के कणों को
मरुभूमि में ।

गो - धूली से सरोबर
खो तपन
लौटती गेह जब
सान्ध्य को,
चाहती
स्पर्श सलोना
संवेदनाओ से सरोबर
अवलेह बन
दुखते हुए हर पोर में
नव ऊर्जा संचार का
जो आधार हो ।

हा !
कहां ?
सुख !
खोजता क्या प्राण है !
दुःख जगत
वेदना में बसा हर प्राण है 
अपेक्षा ही जोड़ती
इक दूसरे से
तू सुमेरु मनिका 
बस आरम्भ को
ना अपेक्षित 
बस
उपेक्षित प्राण है ।

दिनांक १६.०१.२३
भोपाल










बुधवार, 11 जनवरी 2023

आकर्षण कब होता
जब कोई भा जाता है
जब कोई आ जाता है
इन मतवाली गलियों मे
और झूम जाती कुंज लताएं

मंगलवार, 27 दिसंबर 2022

मां

मातृ दिवस पर इस वसुधा पर की सभी माताओं को मेरी ओर से आदरान्जली :-

अनन्त मंगल घोषकारी    
*माँ* ध्वनि अपरमपार है ,
'ब्रम्ह' भौतिक लोक की ,
हर प्राण की आधार है  ၊

गढ़ती अनेको रूप जिससे
ये चराचर चल रहा
रहते अगढ़ पशु ,माँ पाठ बिन
मानव प्रगति जो कर रहा ၊

माँ आप में हैं देव तीनों
तृदेवियां भी आप में
ब्रम्हाण्ड की हर शक्तियां
माँ शब्द में ही व्याप्त हैं ၊

उमेश कुमार श्रीवास्तव
तितलियों के पर में भरे जो रंग  तूने
पक्षियों के स्वरों में भरी जो गूंज है
नदियों को निनाद रेसमी जो दे रखी है

मंगलवार, 6 दिसंबर 2022

नित सोता हूं तुझे संग ले
स्वप्न लोक में जज्बातों संग
कल उठूं ना तो

शनिवार, 26 नवंबर 2022

मेवे

जुनून के साथ ताकत से लबरेज़ कर देते है
आजमा के देखें, मेवे वो खुसूसी मज़ा देते हैं ।
ताज़े फलों का क्या,गिरे फटे लिज़लिजे हुए
सूखे मेवे हैं कि सबकी रंगत बदल देते हैं  ।

मज़ा चाहें गर, जिग़र, जान, तन-ओ-बदन का
खब्ती जहां में जुनूनी बन मज़ा लेने का
रंगत पे ना जायें, सब चिकने चुपड़े हैं यहां ,
मेवे में ही है कूबत, अन्दरूनी मज़ा देने का ।

ताज़ो में,ना हुनर , ना ही तहजीब है ,
बस नाजो अदा की ही वो तस्वीर हैं ,
तजुर्बे की झुर्रियां भर सूखे हैं  मेवे ,
अन्दरूनी सुकूं बाहरी ताज़गी से भर देते हैं ।

जहन्नुम  जन्नत सा है फरक  
जान सको , जो,ताजे सूखे का मरम  
एक नफ़ासत से भरा ,बस खींचे तन मन ,
दूजा अर्क-ए-तजुर्बे से , हर गुल खिला देते हैं l

आ करीब जरा,नजदीकियां बढ़ा,देखो
लबों पे रख , चश्मों से पिला कर देखो ,
खिलेगा बदन ,सुराख-ए-जिश्म खिल जायेंगे
हलक से जो उतरे मेवे , तो जन्नत का मज़ा देते हैं ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव ००
राजभवन भोपाल
दिनांक : २२.१२.२२

गुरुवार, 24 नवंबर 2022

गज़ल : इस गली भी कभी आप आया करें

इस गली भी कभी आप आया करें ,
नज़र यूं ना हमसे चुराया करें ।
गुफ्तगूं- ए- ज़ुबा हो न हो , 
गुफ्तगू-ए-नज़र कर जाया करें ।

तब्बस्सुम लबों पर सजे ना सजे, 
साज़-ए-जिगर बजे ना बजे
आ जुल्फे जरा लहराया करें, 
चश्मों को बोसे कराया करें ।

आपकी मसरूफियत , हमें है पता
आप मगरूर हैं, है ये भी  पता
ये जवानी के दिन बस गिने चार हैं
मुंतज़र हमें यूं   न कराया करें ।

आपकी शोखियां कर रही जुल्म हैं
तड़पते जिगर को दे रही गुल्म हैं
सुकूं पा जाये दीदार कर ये
कुछ ऐसे जतन कर जाया करें ।

है कदर हुश्न की नजर-ए-इश्क में 
फ़ना हो रहा इस जमाने जो
न परदों में खुद को छिपाया करें
पास आने की जहमत उठाया करें  ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव
राजभवन, भोपाल
दिनांक : २९ . १२ . २०२२