मंगलवार, 26 दिसंबर 2023

मैं वापस आ रहा हूं तुझसे मिलने को
बिछुड़े तंतु तरंगो से फिर जुड़ने को । 
श्वांस श्वांस परिहार लगा जग
किलकारी थी व्यथा जनित
प्राणवायु से रिक्त शिखर सब

मंगलवार, 19 दिसंबर 2023

इक झटके से उनने दिल को , प्रस्तर संज्ञा दे डाली
मेरे तन का यह अदना टुकड़ा, प्रेमासव से रचा गया था |

उम्र कहती है कहां, अब प्यार को तुम रोक लो
प्यार का तब ही मज़ा ,जब अनुभवी से प्यार हो ।

गुरुवार, 14 दिसंबर 2023

कटु स्मृति

था उत्सव 
शपथ ग्रहण का
सूबे के काबीना का
कर्तव्यबद्ध थे सभी विज्ञजन
जनसमुद्र में जाने को ।

तत्परता  से चले सभी थे
अपने अपने पोतों से
लहरों पर हिचकोले खाते
बचते भवरों के गोतों से ।

बडी भंवर ने ऐसा रोका
सभी धरा पर उतर रहे
दूर थी मंजिल शीघ्र पहुंचना
इतर राह सब निरख रहे ।

दिखा विवर इक खंडित दरवाजा
लालाइत सब बढ़े उधर
सजग था प्रहरी अवरोध लगाये
पर हिकमत से गये उतर ।

किंचित दर्शन लाभ लिया फिर
बैठक को प्रस्थान किया
पहुँच वहां जो पाया हमने
जैसे विप्लवआह्वान किया ।

तनिक ठिठक लहरों को तोला
तृण सा पाया जब खुद को
रणछोड़ ही बनना उचित जान तब
रण से बाहर प्रस्थान किया ।

राह सरल कहां थी वह भी
चहुं दिश अवरोधक अथाह सगर
भीटा एक बना अवलम्ब
कूद चढ़े तब पाई डगर ।

शपथ ग्रहण का यह उत्सव
स्मृतियों में अब अजर अमर
कशम तीसरी खाई मन ने
ना जायेंगे अब ऐसी डगर ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव
१४-१५ दिसम्बर २०२३
राजभवन , भोपाल






सोमवार, 9 अक्टूबर 2023

जगत के सात आयाम

*जगत के सात आयाम*
१. गर्भस्थ शिशु
२. नवजात से चौदह वर्ष की आयु
३. चौदह से पच्चीस वर्ष की आयु
४. पच्चीस से पचास वर्ष की आयु
५. पचास से पच्चहत्तर वर्ष की आयु
६. पचहत्तर से सौ वर्ष की आयु
७. जन्म के पूर्व मृत्यु के पश्चात
ये सभी अपनी जिस दृष्टि बुद्धि विवेक व ज्ञान से दृष्टि कोण बना जगत को देखते हैं वे उनके समूह हेतु एक आयाम है जो सभी का पृथक पृथक है वे एक दूसरे के आयाम में प्रवेशित भी नही हो सकते ।
आज दिनांक ०९ . १० . २०२३ का मेरा वैचारिक ज्ञान ।

शनिवार, 16 सितंबर 2023

जीवन निरन्तरता है, निरन्तरता में जीयें अन्यथा अन्य जीवन आपको जी लेगा

बुधवार, 26 जुलाई 2023

हूं अचम्भित देख कर
अट्टालिकाओं मे रुदन
जर्जरित नीड़ मे
खिलखिलाते चेहरे देख कर ।



सोमवार, 17 जुलाई 2023

प्यास तेरी


दिनांक 14.07.2023

कब से ताक रहा हूं तुझको
उमंग कोपलें साथ लिये
आओगे मधुमास संग ले
मकरंद मधुर कुछ खास लिये ।

स्वर लहरी की मधुर रागनी
कर्णपटल पर आ मुस्काई
रिमझिम रिमझिम रुनझुन रुनझुन
ज्यूं पावस ने मृदंग बजाई ।

हृदय द्वार पर बैठा पपिहा
ताके स्वाती बून्द एक बस
तर तन सारा मन झूर है
देख दामिनी भी मुस्काई ।

शीत लहर ले पवन बावली
आई अंतस दाह मिटाने
स्वास प्रश्वास की ज्वाला में
अश्रुनीर बन लगी जलाने ।

विरह योग सुख-दुःख का है
तभी ताकता है यह जीवन
यदि दुःख होता सुख ना होता
हठ में पड़ता क्यूं यह जीवन ।

सुख हो दुःख हो या हो दोनो
आश दरस की कभी मिटे ना
हूं बैठा यूं पाषाण मूर्ति सम
झलक तेरी, ये, दृग चूकें ना ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव
दिनांक १४ .०७ . २०२३
      राजभवन
.      भोपाल