मंगलवार, 27 दिसंबर 2022

मां

मातृ दिवस पर इस वसुधा पर की सभी माताओं को मेरी ओर से आदरान्जली :-

अनन्त मंगल घोषकारी    
*माँ* ध्वनि अपरमपार है ,
'ब्रम्ह' भौतिक लोक की ,
हर प्राण की आधार है  ၊

गढ़ती अनेको रूप जिससे
ये चराचर चल रहा
रहते अगढ़ पशु ,माँ पाठ बिन
मानव प्रगति जो कर रहा ၊

माँ आप में हैं देव तीनों
तृदेवियां भी आप में
ब्रम्हाण्ड की हर शक्तियां
माँ शब्द में ही व्याप्त हैं ၊

उमेश कुमार श्रीवास्तव
तितलियों के पर में भरे जो रंग  तूने
पक्षियों के स्वरों में भरी जो गूंज है
नदियों को निनाद रेसमी जो दे रखी है

मंगलवार, 6 दिसंबर 2022

नित सोता हूं तुझे संग ले
स्वप्न लोक में जज्बातों संग
कल उठूं ना तो

शनिवार, 26 नवंबर 2022

मेवे

जुनून के साथ ताकत से लबरेज़ कर देते है
आजमा के देखें, मेवे वो खुसूसी मज़ा देते हैं ।
ताज़े फलों का क्या,गिरे फटे लिज़लिजे हुए
सूखे मेवे हैं कि सबकी रंगत बदल देते हैं  ।

मज़ा चाहें गर, जिग़र, जान, तन-ओ-बदन का
खब्ती जहां में जुनूनी बन मज़ा लेने का
रंगत पे ना जायें, सब चिकने चुपड़े हैं यहां ,
मेवे में ही है कूबत, अन्दरूनी मज़ा देने का ।

ताज़ो में,ना हुनर , ना ही तहजीब है ,
बस नाजो अदा की ही वो तस्वीर हैं ,
तजुर्बे की झुर्रियां भर सूखे हैं  मेवे ,
अन्दरूनी सुकूं बाहरी ताज़गी से भर देते हैं ।

जहन्नुम  जन्नत सा है फरक  
जान सको , जो,ताजे सूखे का मरम  
एक नफ़ासत से भरा ,बस खींचे तन मन ,
दूजा अर्क-ए-तजुर्बे से , हर गुल खिला देते हैं l

आ करीब जरा,नजदीकियां बढ़ा,देखो
लबों पे रख , चश्मों से पिला कर देखो ,
खिलेगा बदन ,सुराख-ए-जिश्म खिल जायेंगे
हलक से जो उतरे मेवे , तो जन्नत का मज़ा देते हैं ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव ००
राजभवन भोपाल
दिनांक : २२.१२.२२

गुरुवार, 24 नवंबर 2022

गज़ल : इस गली भी कभी आप आया करें

इस गली भी कभी आप आया करें ,
नज़र यूं ना हमसे चुराया करें ।
गुफ्तगूं- ए- ज़ुबा हो न हो , 
गुफ्तगू-ए-नज़र कर जाया करें ।

तब्बस्सुम लबों पर सजे ना सजे, 
साज़-ए-जिगर बजे ना बजे
आ जुल्फे जरा लहराया करें, 
चश्मों को बोसे कराया करें ।

आपकी मसरूफियत , हमें है पता
आप मगरूर हैं, है ये भी  पता
ये जवानी के दिन बस गिने चार हैं
मुंतज़र हमें यूं   न कराया करें ।

आपकी शोखियां कर रही जुल्म हैं
तड़पते जिगर को दे रही गुल्म हैं
सुकूं पा जाये दीदार कर ये
कुछ ऐसे जतन कर जाया करें ।

है कदर हुश्न की नजर-ए-इश्क में 
फ़ना हो रहा इस जमाने जो
न परदों में खुद को छिपाया करें
पास आने की जहमत उठाया करें  ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव
राजभवन, भोपाल
दिनांक : २९ . १२ . २०२२






मंगलवार, 22 नवंबर 2022

प्रणय राग

प्रेम सुधा का प्यासा मन
ढूंढ़ रहा पपिहा बन 
स्वाती जल कण
मरू-रज जीवन
चूसे रस ,
कण कण,

विह्वल हिय
विह्वल मन तन,
शुष्क दृग द्वय
ढूढ़े उसको,
करे जो पूरित ,
तरल नीर सम,
प्रेम-विरह जल ।

हुलसित हिय
चित्कार करे ,
प्रतिध्वनित नाद
आमुख पर आ
झंकारित ।

व्याकुल अधर द्वय
कम्पित
विस्तारित नयनों से
प्रतीक्षित
चुम्बन को
प्रेयसी अधर को ।

रास-प्यास,आभास !
हुई संकुचित
स्व गुहा मध्य, पर
हार न माने
होगा संगम
भले लगे कल्प
यह रार है ठाने ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव
राज भवन , भोपाल
दिनांक : २३.११. २०२२




शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2022

नमामीशमीशान

वन्दन करता हूं तुम्हे, अखिल ब्रम्ह के धीश
मुक्ति शक्ति व वेद तुम, आदि व्याप्त जगदीश ॥
पूजन करूं हे शिव तेरी, है महिमा अनन्त अपार
गुण इच्छा सीमा रहित, हो चैतन्य ओढ़ अकाश ॥

हूं दण्डवत सम्मुख तेरे,अदृष्य ॐ की नाद
सम्मुख तेरे  दंडवत, मन चिन्तन अरु काल  ॥ 
कृपा सिन्धु कैलाशपति अनन्त गुणों के धाम
है अर्पित सब तुझे, वाणी, रूप, अरु काम ॥

धवलगिरि हिम सम बदन, कोटि मदन न्योछार 
शीश शिखर मंजुल सुरसरि, भ्रू,इन्दु करें मनुहार ॥
शिरोधर है नीलवर्ण  लिपटे भुंजग अनुकूल
भजूं  विलक्षण शम्भु तोहें, ना होयें प्रतिकूल ॥

श्रुतिपट सुन्दर कुण्डल, आनन सदा प्रमोद ,
विशाल अक्षिद्धय करुणामयी हे नीलकण्ठ आमोद । 
सामप्रिय भोले मेरे , नरमुण्ड सजे श्रीकण्ठ,
नाथ सभी के शम्भु तुम, भजूं तुम्हे अखण्ड ॥

हे रौद्ररूप हे श्रेष्ठरूप तुम तेजरूप हो अखिलेश्वर ,
अखण्ड अजर अमरत्वरूप त्रिविधि शूल के नाशक I
त्रिशूलधारी हे शिवापति, जहां भाव तहं आप,
ऐसे भोले को भजूं, कटे अनन्त  सन्ताप ॥

सज्जन हिय आनन्द तुम, नमन तुम्हे त्रिपुरारि,
कला के तुम ही आदि हो, हे कला के अन्तिम द्वार ।
कंदर्प दर्प भंजक तुम्ही, तुम्ही कल्प के काल,
हर्षित हो जड़ता हरो , हे कालों के काल ।

सुख शान्ति इह-पर मिले,पद शीश धरे जो नाथ 
बिन भजे अनन्त को, कहां कुधर्म का नाश ।
हर हृदय आगर तुम, भजूं उमा प्रिय उमेश
प्रसन्न हो रक्षा करो , हरो मेरे सब क्लेश |

ना जानूं पूजन  विधि, जप तप की क्या बात,
सदा खडा सम्मुख तेरे, कर जोड़े नत माथ ।
जरा-जन्म दुःख पिंड हूं, करूण खड़ा भगवान,
नतमस्तक हूं प्रसन्न हों,  मेरे कृपानिधान ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव
राजभवन, भोपाल
दिनांक १८ . १० . २२