शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2020

आत्म चिन्तन

आत्म चिन्तन

अनन्त इच्छाओं का
घनघोर वन
भटकता मन
घसिटता तन
लुहलुहान जीवन ।

वर्षावन के
लम्बे तरू सी
गगन छूती इच्छाओं से
सतह पर फैली 
अमर दूब सी
मकड़जाल जैसी 
जड़े फैलाई इच्छाएं
कुछ कटीली 
कुछ मखमली
कुछ हरितिमा भरी
कुछ सूखी तुड़ी मुडी 
इच्छाएं 
सब खड़ी 
सुरसा सी मुख बाये ।

बेचारा मन
भ्रमित सा
हर दिशाओं के 
आकर्षण से बिंधा
सब का
रसिक बनना चाहता ।

है चाहता 
सबका हिय टटोल लूं
है चाहता 
सबके हिय में मैं बसूं।
ना जानता
कामनाएं हैं,वे कामिनी
जो अरझाती ही रही हैं
जगत के हर प्राण को
अपने रुप लावण्य से
मृगमारीचिका सदृष्य ।

जीवन यही, हर प्राण का
है भटकता 
मन के सहारे
बुद्धि भ्रमित 
मोह में
मन - मदन के
रति बनी 
अनुगामिनी बन 
गमन करती बस उस दिशा
मन भागता जिस दिशा को ।

तटस्थ सा 
हूं देखता अब
भोक्ता व भोग्य को
दिग्भ्रमित 
मनु वंशजो के तेज को
ज्ञान के अतिरेक में
प्रज्ञा खो गई
वाचाल मन के सामने 
सारी ऋचाएं 
सो गई ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव ,
दिनांक 28.02.2020 ,07.56 अपरान्ह
ओव्हर नाईट ट्रेन , इन्दौर से जबलपुर यात्रा

बुधवार, 12 फ़रवरी 2020

दिल क्या है ?

दिल क्या है ?

दिल क्या है ?
कोशिकाओं का समुच्चय,
रक्त प्लाजमा व 
कणिकाओं भरा चषक,
अथवा इक व्योम विवर,
आकर्षित करता 
हर इक 
कार्य व्यवहार के
अहसासों को,
कटु मृदु या विभत्स ၊

दिल लोथड़ा नही
मांस पेशियों का,
जाल नही, 
धमनियों,शिराओं का,
न ही आश्रय स्थल है ,
सुचि व कलुषित रुधिर का ၊

दिल इक घरौंदा है ,
अहसासों का,
कोमल नरम मखमली
अहसासों का,
तीखे ,खट्टे-मीठे
सर्द-गर्म , सिहरन लिये
अहसासों का ၊
कुछ खुरदुरे ,भोथरे
कंकड़ीले, पथरीले,
ऊबड़-खाबड़ 
कंटीले अहसासों का ၊

ये अहसास ही
अस्तित्व है
दिल का,
सुख-दुःख ,पीड़ा - व्यथा 
स्नेह - दुलार, 
स्निग्ध प्यार तन्तु हैं,
जिनसे रचा ताना-बाना
निराकारी दिल का ၊
जो आकार ले लेता है
उसी का ,
जो भावना धारणार्थ
उपनिषद होती है उसके ၊

उमेश कुमार श्रीवास्तव
दिनांक १३.०२.२०२०, रात्रि ०९:३९ बजे
जबलपुर _ इन्दौर यात्रा ,नर्मदा एक्स.


शनिवार, 25 जनवरी 2020

मैं बयार सा बहना चाहूं

मैं बयार सा बहना चाहूं

मैं बयार सा बहना चाहूं
प्रमुदित कुसुम दल हिय में
मकरंद बना बस रहना चाहूं
मैं बयार सा बहना चाहूं ၊

हर प्रसून का हिय हिलोरता
प्रेम सुधा से गागर भरता
प्रकृति प्रबन्ध का पालन करता
गरल सभी के हरना चाहूं ,
मैं बयार सा बहना चाहूं ၊

अलकों संग खेलूं, अंको में भर,
कपोल चूम लूं ,अधरों को धर
कुच प्रदेश पर भाल धरूं जब
उर प्रदेश में रमना चाहूं ,
मैं बयार सा बहना चाहूं ၊

बन्द नयन के द्वार जो कर ले
भाव जगत में गोते ले कर
स्मृतियों में, बन, मधुर रागिनी
अनन्त काल तक बजना चाहूं
मैं बयार सा बहना चाहूं ၊

अस्तित्व समर्पित करूं उसे जो
तन मन से सम्पूर्ण करे , 
प्रेमतृप्त उस अन्तस्तल में
सदा तरल बन रहना चाहूं
मैं बयार सा बहना चाहूं ၊

उमेश ,दिनांक २६.०१.२० , जबलपुर-इंदौर यात्रा , ओव्हर नाइट एक्स. देवास


प्रेम, प्रकृति और आत्म-विलय की काव्यात्मक यात्रा
(कविता: “मैं बयार सा बहना चाहूं” – उमेश कुमार श्रीवास्तव)
कविता “मैं बयार सा बहना चाहूं” आधुनिक हिंदी कविता में प्रेम को प्रकृति, संवेदना और आध्यात्मिक समर्पण के त्रिवेणी-संगम के रूप में प्रस्तुत करती है। कवि का ‘मैं’ यहाँ किसी व्यक्तिगत अहं का प्रतीक नहीं, बल्कि एक ऐसी चेतना है जो बयार बनकर सर्वत्र फैल जाना चाहती है—स्पर्श में भी, अनुभूति में भी और स्मृति में भी।
कविता का केंद्रीय बिंब ‘बयार’ अत्यंत सार्थक है। यह बयार कहीं कुसुम-दल में मकरंद बनकर ठहरती है, कहीं प्रसून के हृदय को हिलोरती है, तो कहीं गरल को हरने वाली कल्याणकारी शक्ति बन जाती है। इस प्रकार प्रेम को केवल निजी अनुभूति न रखकर कवि उसे सार्वभौमिक, पोषक और शोधनकारी तत्व के रूप में प्रतिष्ठित करता है।
कविता के मध्य खंडों में शृंगार-बोध अत्यंत संयत, सौम्य और संस्कारित है। कपोल, अधर, उर प्रदेश जैसे शब्द स्थूल देहाभिव्यक्ति नहीं बनते, बल्कि प्रेम की कोमल निकटता और भावनात्मक संलग्नता को रेखांकित करते हैं। यहाँ प्रेम स्पर्श से आगे बढ़कर अनुभूति का संगीत बन जाता है।
विशेष रूप से उल्लेखनीय है कविता का स्मृति-बोध—
“स्मृतियों में, बन, मधुर रागिनी / अनन्त काल तक बजना चाहूं”—
यह पंक्तियाँ प्रेम को क्षणिक आकर्षण से ऊपर उठाकर कालातीत चेतना का स्वर प्रदान करती हैं। प्रेम यहाँ स्थायित्व चाहता है, विसर्जन नहीं।
कविता का अंतिम खंड दार्शनिक ऊँचाई को स्पर्श करता है, जहाँ कवि अस्तित्व-समर्पण की बात करता है। “प्रेमतृप्त उस अन्तस्तल में / सदा तरल बन रहना चाहूं”—यह तरलता जड़ता के विरुद्ध जीवन की निरंतर गति का प्रतीक है। यहाँ प्रेम आत्म-विलय का मार्ग बन जाता है।
भाषा संस्कृतनिष्ठ होते हुए भी प्रवाहमयी है। “मैं बयार सा बहना चाहूं” की पुनरावृत्ति कविता को मंत्रात्मक लय प्रदान करती है, जो भाव को गहराई तक स्थापित करती है। यह पुनरावृत्ति बोझ नहीं, बल्कि काव्यात्मक आग्रह बन जाती है।
समग्रतः यह कविता प्रेम को न तो केवल भावुकता बनाती है और न ही मात्र शारीरिक आकर्षण। यह प्रेम को जीवन-दर्शन, संवेदना की शुद्ध अवस्था और आत्मिक प्रवाह के रूप में प्रतिष्ठित करती है। यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति और साहित्यिक उपलब्धि है।



मैं शिव

 मैं शिव


मैं शिव
निर्मल जल कण
मैं शिव
शीतल हिम कण
मैं शिव
प्रकंपन सरसर
मैं शिव
अनल प्रखर
मैं शिव
प्रस्तर गिरवर
मैं शिव
अवघड़ अंधड़
मैं शिव
दानी हर हर
मैं शिव
निश्चल अविचल
मैं शिव
योगी-योगेश्वर
मैं शिव
विषधर शशिधर
मैं शिव
विकराल काल
मैं शिव
कालों का काल
मैं शिव
गरल  विनाशक
मैं शिव
अन्तस का शासक
मैं शिव
रजकण का वाशी
मैं शिव
कैलास निवासी
मैं शिव
जन जन का भोले
मैं शिव
आ मिल मुझ सा हो ले  ၊
उमेश , १५.०१.२० , १२.२७ रात्रि  जबलपुर - इन्दौर यात्रा ओव्हर नाइट एक्स

मंगलवार, 14 जनवरी 2020

चाहतें दुःखों का हैं डेरा

चाहतें दुःखों का हैं डेरा

चाह, मिलेगी खुशी, दुःखी हो गया हूं
चाह, देने को खुशी , दुःख दे है बैठी
चाहतो बीच खुशी, कब कहां है  टिकी 
वहां तो रहा बस ,  दुःखों का ही डेरा ၊

चाहतें न पालो, चाहतें हैं फरेबी ,
घुमाती रहेंगी, भंवर जाल जैसी,
चाह को जिन्दगी में, सुकूनी न मानो,
सुकूं में वही, जिसने इनसे मुह फेरा ၊

उमेश, इंदौर १४.०१.२०२० रात्रि ११.१५

शनिवार, 4 जनवरी 2020

ऐ, "छोटी तुम"

तेरी यादों के साये से
क्यूं, कैसे आजाद करूं 
तू ही कह दे, अय छोटी मेरी
तुझे न कैसे याद करूं ၊

जब भी उठता आंखे मलते
सुबह सबेरे रात बिता
बिखरे बालों में हाथ फिरा तू
देती अपना प्यार जता ၊

चेहरा धोऊं केश भिगो जब
टकटकी लगाये तकती तू
अपने गालों को सटा के उनसे
खड़ी वहां हो जाती तू ၊

जैसे जैसे तैयार मैं होता
सुबह सैर को जाने को
तुम भी संग संग साथ ही होती
तैयार , साथ निभाने को ၊

पग बाहर ज्यूं रखता हूं मैं
इक स्वर स्वागत करता है
"गुड मार्निंग जान" उद्‌घोष
मधु सम कानों में भरता है ၊

अब एकाकी चांद गगन में
तीनों तारों से बिछड़ गया
सब रीते हैं, चुके खड़े हैं 
अर्थ ही उनका बिगड़ गया ၊

सुबह की ठंडक कानो में भरती
हाथों के पंजे सुन्न पड़े
कौन कहे अब बांधो मफलर
नहीं तो कैप उतार रहे ၊

सूनी राहें , एकाकी डग हैं
खो गया मनोरम सैर सबेरा
तुम रूठे, जग कण रूठा है
खुशियों ने त्यागा अब ये डेरा ၊

सुबह भी होती साम भी होती
रातें भी हैं आती जाती
पर सांसों में महक तुम्हारी
तन्हा मुझको हैं तड़पाती ၊

नहीं मै कहता, तुम खुश होगी
दर्द तुम्हे भी बेहद होगा
प्रेम व्यथा का, जख्म ही ऐसा
हर अंग तेरा भी घायल होगा ၊

मेरे हित चिन्तन में तुमने
अवरोध स्वयं ही वरण किया
खुद की , मेरी प्रेम डोर को।
लक्ष्मण रेखा बना दिया ၊

तुम खुश रहना, मुझे जान खुश
बस यही मेरी अभिलाषा है
तुम सांसे हो, मेरे तन की
नित, बनी रहोगी , ये आशा है ၊

उमेश ,दि० ०५.०१.२०२०, जबलपुर से इन्दौर यात्रा ओव्हर नाइट एक्स. मक्सी जंक्सन


सोमवार, 2 दिसंबर 2019

हे अर्धान्श

हे अर्धान्श

वेदना हुई हर बार
मानव समाज को,
 हे नर अर्धान्श 
नारी ,
जब जब तुझ पर
नर-पशु ने
अमानुशी प्रहार किया
कायिक या मानसिक ၊
ना सोच, है पाषाण
मानव समाज ၊

स्पन्दन जो प्राण में ,
तुझसे ही पाया ,
चेतना सुचि ज्ञान
तूने ही तो
है, बोध कराया ,
लाखों योनियों में
भटके सभी
 ये तेरी योनि है
जिसने,दुर्लभ मानव 
तन दिलाया ၊
जो न होता स्तन तेरा
हे मातृ शक्ति 
पोषित न होती 
इस धरा पर प्राण शक्ति ၊

जन्म पाया
शक्ति पाई
ज्ञान पाया
इस धरा पर 
अवतरण का
अभिमान पाया ၊
क्या क्या न दिया तूने ,
हैं ऋणी सब,
नारी बिना नर कल्पना ?
अकल्पनीय है ၊

इस अर्थ युग में
है प्रश्न मेरा भी
यक्ष सा
जो रहा है
अब तलक
दुर्भिक्ष की भूख सा,
जो व्यथित 
तैरता व्योम में
धुनता
अपनी ही गुरुता को
कि , क्या यह समाज 
अब मानव का है ?
या, हिंसक पशुदानवों का ?

पाठशाला ,गोद माँ की
जबसे दूषित हुई 
अर्थ, धूरी बनी ,
स्नेह, दोयम बना
संस्कारों की थाती 
छूट पीछे गई ,
लालसा जो जगी
माया नगरी की चमकती,
धनागार की ।

तू भी भटकती जा रही
सुचि पथ छोड़ कर
अर्थ खातिर अपने वसन-
असन सब छोड़ कर 
क्या नही चिन्तन की बेला
आ गई
आत्म मंथन की है शायद
यह ही घड़ी ၊၊

तुझको सिखाने नर कोई 
यदि आयेगा.
प्रथम गुरु के सामने 
क्या कहीं टिक पायेगा ၊
इसलिये 
अब तुझ पर ही भार है
खुद को ही दे सीख
यही अब सार है ၊

तुने दिये नर नारियों में 
श्रेष्ठ हैं
जग कल्याणियों की
बस गुरू तू श्रेष्ठ है ,
तू ही बना सकती
पुरुष को राम है
तू ही बना सकती
हर प्राण को
निष्काम है ၊

मुद्रा नही, जीवन है ये
जी ले जरा ,
भौतिक नही, अध्यात्म से भी
मिल ले जरा,
है,राक्षसी मुद्रा, पकड़ से
बच जरा,
ध्येय जीवन, न कि मुद्रा,
समझ जरा ၊

शान्तिमय ,आनन्दमय
आरोग्यदायी प्राण है
भौतिक-जगत-सुख
बस दुखों की खान है ၊
बुद्धि चतुर , उलझा रखे
मायाजाल में ၊
क्यूं उलझती जा रही
इस जंजाल में ၊

प्राण की सुन,
अन्तस उतर अब फिर तनिक
बन चुकी 
जितना भी बनना था वणिक,
धात्री तू इस धरा की
जान तू ,
मानवों की, मान तू ,
अभिमान तू ၊
पशु बन रहे मानवो को 
संधान ले ,
फिर धरा को
स्वर्ग से ऊंचा मान दे ၊

सभ्यता-संस्कृति की ,
आधार तू ,
मानवी सागर में
जीवन की , 
है, पतवार तू ၊
आंचल तेरा,गोदी तेरी
यदि खो गई
इस धरा से, मानव निशानी,
फिर तो जानो, खो गई ၊

उमेश कुमार श्रीवास्तव 
दिनांक २४.०१.२०
इन्दौर से जबलपुर यात्रा
ओव्हर नाइट एक्स० 












अधूरी
प्रथम पाठशाला
सभ्य नागरिक अथवा मुद्रा राक्षस
कुटुम्ब के लिये एक व्यक्ति का
ग्राम के लिये एक कुटम्ब का