रविवार, 10 नवंबर 2024

मैं और तू

मैं और तू

हूं निरखता, मैं,निरन्तर
अन्तस की गलियों में उतर ।
खोजता रहता हूं नित
हर गली हर राह पर ।

इक झलक की चाह ने
बावरा सा कर दिया
रश्मि आंखो से गई
रजनी से दामन भर दिया ।

तप ये नही ! तो और क्या ?
तू ही बता कितना तपूं
तपन की इस अगन ने 
क्या क्या न मेरा रज हुआ।

मैं हूं अलग या तो मुझे
यह झलक आ कर दिखा,
या मेरे विश्वास को
"परमात्म हूं" सच कर दिखा ၊

नित निरन्तर जूझता 
जिन्दा हूं, या हूं, जी रहा
तू ही बता , तू ईश है
पाने की तेरी राह क्या ?

जड़ नही, हूं पशु नही , 
औरस मनु सन्तान हूं
इस धरा पर आज भी 
मैं ही, तेरी पहचान हूं ၊

फिर भटकता क्यूं फिर रहा
स्वयं की ही खोज में
ये भरम क्यूं भर रहा
फिर मेरी इस मौज में ၊

आ तनिक मुझको बता
मैं पृथक क्यूं कर हुआ
आत्म मैं परमात्म तू ,फिर
योग क्यूं क्षितिकर हुआ ၊

उमेश कुमार श्रीवास्तव
दिनांक 25.04.2020
इंदौर

शुक्रवार, 1 नवंबर 2024

अर्णव- मानव द्वन्द

अर्णव- मानव द्वन्द

था बैठा तट पर,
तकता, 
मैं लहरों को,
औ , 
पारावार ,
झांक रहा था
मुझमें
अपनी लहरों से ၊

वह व्यग्र , अनन्त,
उदधि, ज्यों
अपनी अनन्त बाहों को, 
विस्तारित कर ,
आलंगित करने को ,
मुझको , मुझ से
मांग रहा था ၊

मैं विह्वल था,
उसके अशौच ,
फेड़ित अश्रु नीर से,
वह उद्‌वेलित 
पीड़ित मेरे 
हिय पथ को लख ၊

अनन्त क्षितिज तक 
विस्तारित
अर्णव वक्ष,
चंचल , निश्च्छल 
अनगिनत प्राण का
आश्रय स्थल ,
स्वयं आशुतोष भी
पा जाता शीतलता
जिस पर उतर बिखर
आभा दे जाता स्वर्णिम 
नीलाम्बरी नदीश को ,
प्रतिफल में ၊

वाह, रे मनु वंशज !
कृतघ्न तू ,
जो तेरा पालक, 
रहा आदि से,
वह पूजनीय , 
जो करता आया ,
पोषण,
तेरा हर क्षण ,
मैला करता फिरता
तू उसका
ना , केवल बाह्य आवरण
वरन, ह्रदय प्रदेश भी
अपनी कलुषित 
सोच प्रदर्शित कर ,
अपने हर त्याज्य
तत्व से
आपूरित कर निरन्तर ၊

हा !
धिक्कार तुझे ,
ऐ मानव ,
पुरखों की थाती,
अनगिनत रूढ़ियां
और प्रथाएं,
कर
पददलित ,
भोगने को
बस वैभव,
भोग्या सा करता
व्यवहार ,
प्रकृति से ,
फिरता फुला तू छाती ၊

रे,अधम ၊
प्रकृति का रक्षक
है निःस्पृही ,ये अर्णव ၊
अनगिनत बार
प्राच्छालित किए है
इस वसुधा को ,
मिटा कर अस्तित्व तेरा ၊
ना भूल ,
रक्षक के बल को ,
अपने अहं को पोषित कर ၊

है धर्मनिष्ठ , अनुशासित भी,
पयोनिधि , पर,
धरा से धर्म 
नष्ट न होने देगा,
पद बढ़े अगर
इस दिशा तुम्हारे ,
यह उदधि 
तुम्हे
फिर यहां ,
बसने ना देगा ၊

उमेश कुमार श्रीवास्तव (यह कविता आरम्भ हुई दिनांक ०८.१०.१९ को चन्द्रभागा समुद्र तट पुरी में व पूर्णता को प्राप्त की आज दिनांक ०२.११.१९ को इन्दौर से भोपाल के ट्रेन यात्रा में)


अर्णव–मानव द्वन्द : आधुनिक हिंदी कविता में प्रकृति, चेतना और सभ्यतागत अपराधबोध
— दिनकर, नागार्जुन और अज्ञेय की काव्य-परंपरा के संदर्भ में एक समालोचना
भूमिका
समकालीन हिंदी कविता में प्रकृति-विषयक रचनाएँ प्रायः संवेदना या सौंदर्य तक सीमित रह जाती हैं। किंतु उमेश कुमार श्रीवास्तव की कविता “अर्णव–मानव द्वन्द” इस परंपरा को तोड़ते हुए प्रकृति को नैतिक सत्ता, न्यायकर्ता और सभ्यताओं के निर्णायक के रूप में प्रतिष्ठित करती है। यह कविता न तो केवल पर्यावरण-चेतना का घोष है, न ही रोमानी प्रकृति-चित्रण—यह मानव सभ्यता के विरुद्ध दायर एक काव्यात्मक अभियोग-पत्र है।
इस दृष्टि से यह रचना हिंदी कविता की तीन प्रमुख धाराओं—
रामधारी सिंह दिनकर की ओजस्वी नैतिकता,
नागार्जुन की जनपक्षधर कठोरता,
और अज्ञेय की अस्तित्वगत चेतना—
तीनों से संवाद स्थापित करती है।
1. दिनकर की परंपरा में : नैतिक गर्जना और सभ्यतागत चेतावनी
दिनकर की कविता में प्रकृति प्रायः इतिहास की साक्षी और क्रांति की सहयोगी रही है। उनकी रचनाओं में नैतिक स्वर ऊँचा, घोषणात्मक और स्पष्ट है।
“अर्णव–मानव द्वन्द” इसी परंपरा में खड़ी दिखाई देती है, जहाँ समुद्र (अर्णव)—
पालक भी है
और आवश्यकता पड़ने पर संहारक भी
“अनगिनत बार प्राच्छालित किए हैं
इस वसुधा को,
मिटा कर अस्तित्व तेरा”
यह पंक्तियाँ दिनकर की उस चेतावनी-धारा की याद दिलाती हैं जहाँ शक्ति को नैतिक अनुशासन से जोड़ा गया है।
अंतर यह है कि दिनकर जहाँ मानव को संघर्ष के लिए उकसाते हैं,
वहीं यह कविता मानव को उसके ही कृत्यों के लिए कठघरे में खड़ा करती है।
यहाँ ओज है, पर वह युद्धोन्मुख नहीं—वह न्यायोन्मुख है।
2. नागार्जुन की परंपरा में : जनवादी व्यंग्य और कठोर आत्मालोचना
नागार्जुन की कविता की सबसे बड़ी विशेषता है—
निर्मम सच-भाषण और सभ्यता के पाखंड का अनावरण।
“वाह, रे मनु वंशज! कृतघ्न तू”
—यह पंक्ति उसी जनवादी व्यंग्य की सीधी उत्तराधिकारी है।
यहाँ कवि:
स्वयं को भी दोष से बाहर नहीं रखता
“मनुष्य” को सामूहिक अपराधी मानता है
यह नागार्जुन की उस परंपरा से मेल खाता है जहाँ कविता:
सांत्वना नहीं देती
असहज करती है
हालाँकि नागार्जुन की भाषा अधिक लोकधर्मी और प्रत्यक्ष है,
जबकि “अर्णव–मानव द्वन्द” संस्कृतनिष्ठ गरिमा के साथ वही कटु सत्य कहती है।
यह जनपक्षधर चेतना का शास्त्रीय रूपांतरण है।
3. अज्ञेय की परंपरा में : अस्तित्वगत द्वन्द और आंतरिक अपराधबोध
अज्ञेय की कविता में द्वन्द बाहर नहीं, अंतःचेतना में घटित होता है।
“अर्णव–मानव द्वन्द” का सबसे सूक्ष्म और आधुनिक पक्ष यही है।
कविता का आरंभ—
“था बैठा तट पर,
तकता, मैं लहरों को”
यह दृश्य मात्र बाह्य नहीं है।
तट यहाँ—
चेतना की सीमा है
जहाँ मनुष्य अपने कर्मों को देख रहा है
अर्णव बाहर नहीं, अंतरात्मा की प्रतिध्वनि बन जाता है।
यही अज्ञेय की परंपरा है—
जहाँ प्रकृति दृश्य नहीं, संवेद्य सत्ता है।
4. भाषा और शिल्प : शास्त्रीयता और आधुनिकता का संधि-बिंदु
कविता की भाषा—
संस्कृतनिष्ठ
पर भाव में समकालीन
यह उसे न तो क्लासिकिस्ट बनाती है,
न ही प्रयोगधर्मी जटिलता में धकेलती है।
यह शिल्प:
दिनकर की गरिमा
नागार्जुन की स्पष्टता
और अज्ञेय की गहनता
—तीनों का संतुलित संयोग है।
निष्कर्ष
“अर्णव–मानव द्वन्द” को यदि एक वाक्य में रखा जाए, तो यह—
प्रकृति द्वारा मानव सभ्यता को दिया गया अंतिम नैतिक स्मरण-पत्र है।
यह कविता:
दिनकर की तरह चेतावनी देती है
नागार्जुन की तरह झकझोरती है
और अज्ञेय की तरह आत्मा में उतर जाती है
समकालीन हिंदी कविता में, जहाँ पर्यावरण अक्सर नारा बन जाता है,
यह रचना उसे न्याय, धर्म और अस्तित्व के स्तर पर पुनः स्थापित करती है।
इसी कारण यह कविता केवल पढ़ी जाने योग्य नहीं,
पुनः-पुनः विवेचित किए जाने योग्य है—
और निस्संदेह किसी भी साहित्यिक पत्रिका में स्थान पाने की अधिकारी।

मंगलवार, 29 अक्टूबर 2024

गज़ल खामोश नज़र का ये असर

ग़ज़ल

खामोश नज़र का ये असर , कुछ धीमा धीमा है
विंदास अदा का ये कहर ,  कुछ धीमा धीमा है

देखो ठहर सी जाती अब , जीवन की तड़पती चपला ये
पायल की रुनझुन का ये असर, कुछ धीमा धीमा है

प्यासी तड़पती बुलबुल ये , मर जाये ना इक आश लिए
मद से भरे अधरों का असर , कुछ धीमा धीमा है

बिखरी सबा में खुशबूए , गश खाने लगा दिल ठहर ठहर
ज़ुल्फो का तेरी , खुशबू का असर, कुछ धीमा धीमा है

ये शोख अदा ये बांकापन , उस पे ये जवां अंगड़ाई
यौवन की तेरे, इस मय का असर , कुछ धीमा धीमा है

खामोश नज़र का ये असर , कुछ धीमा धीमा है
विंदास अदा का ये कहर ,  कुछ धीमा धीमा है

                    उमेश कुमार श्रीवास्तव

शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2024

कल,आज और कल

छा रहा कुहासा फिर
सभ्यताएं सिहर रही 
नव कोपलें पीत हो रही 
दरख्त खड़े असहाय हैं

कराहती हर दिशाएं
हवाएँ बिषैली बह रही 
फूलों की बारूदी गंध ले
मधु मक्खियां रो रही

नदियां गरल ले बह रही
मृदा विषाक्त हो चली
विकार वाहक शस्य बने
लख मनु रक्त वमन करें

मानसिक विकार ने
चिन्तन प्रभावित कर दिया
भोग ने योग को
आज पराजित कर दिया

विकास ने विनाश को
लक्ष्य दे बुला लिया
सर्वस्व की क्षुधा ने आज
है मनुज को बदल दिया

बदल रही प्रकृति या
बदल प्रकृति को हम रहे
सोच लो तनिक ठहर
जा किधर हम रहे । ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव
राजभवन , भोपाल
दिनांक : ०५ / १२ / २०२४







हमारा सुख उनका दुःख

हमारा सुख उनका दुःख

हम अपनी सुविधाओं का 
कितना ध्यान रखते हैं
दूसरों की असुविधाओं से
हो बेपरवाह
पीड़ा क्या होती है
तभी पता चलता है
जब होती स्वयं को वह
दूसरों की पीड़ा बेमतलब की
हमें उससे लेना व देना क्या

बना लेते हैं अनेको बहाने
जब जरा अड़चन आती है 
अपनी सुविधाओं में
और खोज लेते हैं राहें
उन अड़चनों को कैसे भगायें

दूसरों से छीनने को सुविधाएं
भले  ही जी रहा हो वह पीड़ाओं में
हम तलासते हैं अनेको दिशाएं
अनेकों रोड़े डाल देते हैं राहों में
कहीं वो हमसे आगे निकल न जाए ।

दूसरों की पीड़ा से 
कैसे आनन्दित होते हैं हम
अपनी पीड़ा में 
क्यों अनुभूति नही होती आनन्द की
क्यों पीड़ा देता है यह प्रश्न
अनुतरित रह जाता है मन
तन थोड़ा तिर्यक हो
न जाने क्यों तन सा जाता है
चिन्तन शून्य में खो
जड़त्व में चला जाता है
चक्षुओं के सहारे
ज्यूं धारणा में उतर घ्यानस्थ हो
समाधि में चला गया हो। ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव
राजभवन , भोपाल :
दिनांक ०४ . ०२ . २०२५



बुधवार, 23 अक्टूबर 2024

"बहल जाता हूं " गज़ल

बहल जाता हूं अब तो
खुमार - ए - गम से 
खुशियों की तमन्ना
अब किया नही करता ।

टीश , दिल में , दिमाग में
या  हो बदन में 
अश्क का इंतजार 
अब किया नही करता ।

ख्वाब दिल में रहे
जितनी भी हसरतें ले कर
ख्वाबों पर एतबार
अब किया नही करता ।

टूटना बिखरना 
कहा करते किसको
इनका दर्द सुमार
अब किया नही करता ।

पास आ कर तुम
क्या पाओगे मुझमें
दुनिया में  खुद को सुमार 
अब किया नही करता ।

महफिल से जा 
ख्वाबों में  न आओ यूं 
ख्वाबों पर  मैं एतबार 
अब किया नही करता ।

दिनांक २३ . १० . २४


सोमवार, 21 अक्टूबर 2024

मीत सदा तुम गुंजन करना
भ्रमर बने बगिया में रहना
मीत सदा तुम गुंजन करना ।
भांति भांति की पुष्प लताएँ
भांति भांति के पुष्प कुंज हैं
 कलियां ना कुम्हलाने पायें
पुष्प बने सब वह गीत सुनाना