बुधवार, 11 दिसंबर 2013

दिलजले शेर

दिलजले शेर १
मुझे बदगुमानी थी कि ,देगी वो बोसा
जालिम के लब खुले तो, निकली गालियाँ.
२
सुबह शिकवा थी उनको , शाम हमसे शिकायत
ना जाने अब क्या चाहती है जालिम .
३
इक बोसा लिया था मैंने इन अदाओं का
अब तो कम्बख़्त दामन छोड़ती ही नहीं.
४
थोड़ी जो पी थी हमने नज़रों से तेरी सनम
अब तलक हमको, अपना ख्याल आया नहीं.
५
तेरी ये अदा ही काफ़ी ,जीने के लिए
बस यूँ ही लब-वो-रुखसार पर तब्बस्सुम खिलने दो.
६

बदल दो आज तदबीर तस्वीर बदल जाएगी
हमने तो तक़दीर से तस्वीर बदलते देखा है


                                                      
                                                             ......उमेश कुमार श्रीवास्तव

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें