गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

मैं चाहता हूँ

मैं चाहता हूँ

मैं चाहता हूँ
प्यार , किसी का
टूट कर
जिसकी प्रेम-रश्मि
ढक ले मुझे
अस्तित्वहीन कर

मैं चाहता हूँ
खोना , उसी में
सिर्फ़ उसी का हो कर
धरा-गगन के मेल
क्षितिज सा
इकसार हो कर

मैं चाहता हूँ
डूबना , आँखो में
किसी के ख्वाब बन कर
तृप्त करती हों
जो मेरी
चेतना की क्षुधा को

मैं चाहता हूँ
छाँव , शीतल
कुन्तलों के घन
ढके मुझको
सो सकूँ मैं जहॉं
निश्चिंत हो कर

मैं चाहता हूँ
नीर , सूनी आँखो में
किसी की
यादों में , किसी के
स्वप्न ले कर

मैं चाहता हूँ
स्पर्श , संवेदनाओं भरा
ठोकरो से मिले
ज़ख़्मो पर
औषधि लेप बन कर

मैं चाहता हूँ
प्रेरणा , संघर्ष में
इक प्यारी उत्प्रेरणा
पा सकूँ , जिसके सहारे
मंज़िल का दर

मैं चाहता हूँ
पाना किसी को
संपूर्ण , खोजने को
स्वयं को, खो चुका जिसे मैं
राहों में टूट कर

मैं चाहता हूँ
कहना , व्यथा
हिय की
खुल किसी से
स्निग्ध उसके
निश्छल मुस्कुराते
नयन सम्मुख

मैं चाहता हूँ
समर्पण, संपूर्ण
किसी का
जिसको कर दूं
समर्पित स्वयं को
अबोध बन कर

पर चाहतें तो चाहतें हैं
वे मिली कब
किसी को , उस रूप में
तभी तो ,
चाहने की चाह को
मैं चाहता हूँ ।

...उमेश श्रीवास्तव...

इच्छा, अस्मिता और अधूरी तृप्ति का मनो-दर्शन
(कविता: “मैं चाहता हूँ” – उमेश श्रीवास्तव)
कविता “मैं चाहता हूँ” मूलतः इच्छा की कविता है—पर वह इच्छा जो भोग की ओर नहीं, बल्कि अस्तित्व के विलय की ओर अग्रसर है। यह रचना प्रेम को मनोवैज्ञानिक आवश्यकता, दार्शनिक खोज और आत्मिक रिक्तता—तीनों स्तरों पर एक साथ पढ़े जाने की संभावना प्रदान करती है।
1. दार्शनिक परिप्रेक्ष्य : अस्मिता का लोप और विलय की आकांक्षा
दार्शनिक दृष्टि से कविता का ‘मैं’ स्थिर अहं नहीं है। वह स्वयं को “अस्तित्वहीन” करना चाहता है—यह संकेत अहं-विसर्जन (Ego dissolution) की ओर जाता है, जो भारतीय दर्शन में भक्ति, अद्वैत और सूफी परंपरा का केंद्रीय तत्त्व रहा है।
“खोना, उसी में / सिर्फ़ उसी का हो कर”—यह पंक्ति व्यक्ति के सीमित ‘स्व’ से मुक्त होकर किसी व्यापक सत्ता में विलीन होने की चाह को उद्घाटित करती है। यहाँ प्रेम ईश्वर-सदृश बन जाता है—एक ऐसा केंद्र जहाँ पहुँचकर द्वैत समाप्त हो जाता है।
क्षितिज का बिंब—“धरा-गगन के मेल / क्षितिज सा / इकसार हो कर”—अत्यंत अर्थगर्भित है। यह प्रतीक दर्शाता है कि कवि पूर्णता को मिलन में नहीं, सीमाओं के मिटने में देखता है। पूर्ण प्रेम वहाँ है जहाँ भेद रेखाएँ लुप्त हो जाती हैं।
2. मनोवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य : अभाव, लगाव और सुरक्षा की खोज
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह कविता अटैचमेंट (Attachment) और सुरक्षा-बोध की गहरी आवश्यकता को प्रकट करती है।
“छाँव, शीतल / कुन्तलों के घन”—यह छवि प्रेमिका से अधिक मातृत्व-सदृश संरक्षण की ओर संकेत करती है। यहाँ प्रेम केवल रोमानी नहीं, बल्कि वह आश्रय है जहाँ थका हुआ मन निश्चिंत होकर सो सके।
आँखों में डूबने, यादों में नीर बनने और स्पर्श को औषधि मानने की चाह—ये सभी संकेत प्रेम को उपचारात्मक संबंध (Healing relationship) के रूप में स्थापित करते हैं। कवि जीवन की ठोकरों से मिले ज़ख़्मों के लिए प्रेम को मरहम मानता है। यह मनुष्य की उस मौलिक मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति को दर्शाता है जहाँ वह संबंधों के माध्यम से स्वयं को पुनर्संयोजित करता है।
3. चेतना की क्षुधा और अस्तित्वगत रिक्तता
“चेतना की क्षुधा” शब्द-युग्म कविता का दार्शनिक केंद्र है। यह संकेत करता है कि कवि की चाह केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि अस्तित्वगत (Existential) है। यह वह भूख है जिसे पदार्थ, सफलता या उपलब्धियाँ नहीं भर सकतीं—केवल अर्थपूर्ण संबंध ही उसे तृप्त कर सकते हैं।
यहीं कविता अस्तित्ववादी दर्शन से संवाद करती है, जहाँ मनुष्य अर्थ की खोज में भटकता है और प्रेम को एक संभावित उत्तर के रूप में देखता है।
4. अंतिम स्वीकार : इच्छा की अनंतता
कविता का अंतिम बिंदु उसका सबसे परिपक्व क्षण है—
“पर चाहतें तो चाहतें हैं / वे मिली कब / किसी को, उस रूप में”
यह पंक्तियाँ इच्छा के अपरिहार्य अपूर्णपन को स्वीकार करती हैं। मनोवैज्ञानिक रूप से यह परिपक्वता का संकेत है—जहाँ व्यक्ति अपनी चाह को न तो नकारता है, न ही उससे भ्रम पालता है।
दार्शनिक दृष्टि से यह स्वीकार जीवन के मूल सत्य की ओर संकेत करता है—कि इच्छा ही गति है, और उसकी पूर्ण तृप्ति शायद जीवन के प्रवाह को रोक दे।
निष्कर्ष
“मैं चाहता हूँ” प्रेम की कविता होते हुए भी केवल प्रेम की नहीं है। यह मनुष्य की उस शाश्वत व्याकुलता की कविता है, जो किसी दूसरे में स्वयं को खोजती है, और खोजते-खोजते स्वयं से साक्षात्कार कर लेती है। यही इस कविता की दार्शनिक गहराई और मनोवैज्ञानिक सच्चाई है।


चाह, अभाव और समर्पण की आत्मस्वीकृत काव्य-यात्रा
(कविता: “मैं चाहता हूँ” – उमेश श्रीवास्तव)
कविता “मैं चाहता हूँ” आधुनिक प्रेम-कविता की उस धारा से जुड़ती है जहाँ प्रेम प्राप्ति नहीं, आकांक्षा है; और आकांक्षा भी ऐसी जो बार-बार टूटने के बाद और अधिक गहरी हो जाती है। यह रचना प्रेम को अधिकार या दावा नहीं बनाती, बल्कि उसे अभाव, खोज और आत्म-विसर्जन की प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करती है।
कविता की संरचना ‘मैं चाहता हूँ’ की पुनरावृत्ति पर आधारित है, जो केवल शैलीगत आग्रह नहीं, बल्कि एक अंतःसंघर्ष का घोष है। हर “मैं चाहता हूँ” के साथ कवि की चाह और अधिक सूक्ष्म, अधिक आत्मीय और अधिक असंभव होती जाती है। यह पुनरावृत्ति कविता को लय देती है, साथ ही यह भी संकेत करती है कि चाहतों की सूची अनंत है, और उनकी पूर्ति सदैव अपूर्ण।
प्रेम की कल्पना यहाँ अत्यंत व्यापक है—कहीं वह प्रेम-रश्मि बनकर कवि के अस्तित्व को ढक लेना चाहता है, कहीं क्षितिज की तरह धरा-गगन के मेल में विलीन हो जाना चाहता है। यह प्रेम देह से आरंभ होकर चेतना तक जाता है—
“तृप्त करती हों / जो मेरी / चेतना की क्षुधा को”
यह पंक्तियाँ प्रेम को शारीरिक या भावुक आवश्यकता से ऊपर उठाकर मानसिक और बौद्धिक तृप्ति से जोड़ देती हैं।
कविता का शृंगार-बोध अत्यंत सौम्य और सांकेतिक है। कुन्तलों की छाँव, आँखों में डूबना, स्पर्श का औषधि बन जाना—ये सभी बिंब प्रेम को संरक्षण, उपचार और आश्रय के रूप में रूपायित करते हैं। यहाँ प्रेम भोग नहीं, बल्कि थकान के बाद मिलने वाली शांति है।
विशेष रूप से उल्लेखनीय है कविता का प्रेरणा और संघर्ष से जुड़ा पक्ष। प्रेम को कवि केवल निजी सुख का माध्यम नहीं बनाता, बल्कि उसे संघर्ष में उत्प्रेरक शक्ति के रूप में देखता है—जो मंज़िल के द्वार तक पहुँचने का साहस दे। यह दृष्टि कविता को आत्मकेंद्रित होने से बचाती है।
कविता का अंतिम खंड उसका दार्शनिक निष्कर्ष है—
“पर चाहतें तो चाहतें हैं / वे मिली कब / किसी को, उस रूप में”
यह स्वीकार प्रेम की विफलता नहीं, बल्कि मानवीय यथार्थ की स्वीकृति है। कविता यहीं आकर एक करुण, परिपक्व और सच्चा स्वर ग्रहण करती है—जहाँ चाहने की चाह ही जीवन की सबसे बड़ी गति बन जाती है।
भाषा सरल, बोलचाल के निकट और भावप्रवण है। मुक्तछंद में लिखी यह कविता अपनी लंबाई के बावजूद बिखरती नहीं, क्योंकि इसका भाव-सूत्र स्पष्ट है। यह कविता पाठक को यह सोचने पर विवश करती है कि शायद प्रेम का सौंदर्य उसकी पूर्ति में नहीं, बल्कि उसकी अपूर्णता में निहित है।
समग्रतः “मैं चाहता हूँ” प्रेम की एक ऐसी कविता है जो न तो शिकायत करती है, न ही दावा—वह केवल स्वीकार करती है। यह स्वीकार ही इसे ईमानदार, मानवीय और प्रभावशाली बनाता है।

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