सोमवार, 16 मार्च 2026

युद्ध का कहर

जलती हुई चिताओं से
जल रहे शहर
चीखती राह भागती
बेकल हैं खंडहर

इंसान रह गया नही
इन्सानियत के संग
कंकरीटी जंगलों में
बरपा है वो कहर

बारूद में कहां ताब
गला दे हाड़ मांस
मद ने मानवों के
घोला है सब जहर ।

सुलगती चर्बीयां
महकती हर दिशा
असुरों दानवों का 
ज्यू चल रहा प्रहर ।

बुद्धि का विवेक से
हो गया विच्छेद
मद-लोभ-डाह संग है
जो दिखा रहे डगर ।

संस्कार अब रहा नही
न  सभ्यता  रही
लघु को मिटा दीर्घता
है बांटती कहर ।

विकाश होड़ चल रही
विनाश ले के संग
बचा सको बचा लो
अपने अपने घर ।

उमेश कुमार श्रीवास्तव
लोकभवन , भोपाल
दिनांक : २४.०३.२०२६



 



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